आज 11 अक्टूबर को मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी, जो सुख-समृद्धि का संकेत है. अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:49 से 12:37 बजे तक घटस्थापना करना शुभ रहेगा.
Source : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा
Written By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Shardiya Navratri 2026: शक्ति की अराधना का महापर्व आज रविवार 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रहे हैं. मां देवी दुर्गा की उपासना, भक्ति, पूजा-पाठ का महापर्व शारदीय नवरात्रि प्रारंभ होन जा रही है. इस वर्ष माता रानी का आगमन गज (हाथी) की सवारी पर हो रहा है, जो देश-दुनिया में धन-धान्य, वर्षा और समृद्धि का प्रबल संकेत माना जा रहा है. इस महापर्व पर भूमि, भवन, वाहन क्रय करने के योग बन रहे हैं. आइए जानते हैं किन ग्रहों के दुर्लभ महासंयोग से आपके घर में मां लक्ष्मी का आगमन होने जा रहा है…
कब बन रहा ग्रहों का दुर्लभ महासंयोग?
प्रथम दुर्लभ योग: नवरात्रि के के प्रारंभ में ही पहले दिन सूर्योदय के समय हस्त नक्षत्र और शुक्ल योग का प्रभाव रहेगा.
दूसरा योग: गुरु और चंद्रमा के केंद्र संबंध से दुर्लभ गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है.
तीसरा योग: शनि देव मीन राशि में विराजमान हैं, जो ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत फलदायी हैं.
शुभ मुहूर्त शृंखला: इस दौरान अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग बन रहा है. इस श्रंखला योग में भूमि, भवन, वाहन क्रय करना और नए कार्य शुरू करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है.
हाथी पर सवार होकर आ रहीं माता रानी
शास्त्रीय विधान के अनुसार, नवरात्रि की शुरुआत के दिन (वार) के आधार पर मां दुर्गा का वाहन तय होता है. इस बार नवरात्रि का आरंभ रविवार के दिन से हो रहा है, इसलिए देवी का वाहन हाथी होगा. देवी भागवत पुराण के अनुसार, जब माता रानी हाथी पर सवार होकर आती हैं तो प्रचुर वर्षा के योग बनते हैं. खेती अच्छी होती है, अन्न-धन के भंडार भरते हैं और देश में आर्थिक व बौद्धिक संपन्नता आती है.
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि का आरंभ 10 अक्टूबर को रात 09:19 बजे से होकर 11 अक्टूबर को रात 09:30 बजे समाप्त होगा. उदयातिथि के अनुसार घटस्थापना यानि कलश स्थापना आज 11 अक्टूबर को है.
मां शैलपुत्री की पूजा आज
नवरात्रि के प्रथम दिन की शुरुआत मां शैलपुत्री से होगी. उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री और नवदुर्गा का पहला स्वरूप माना गया है. आज पहले दिन घटस्थापना के साथ देवी मां शैलपुत्री की पूजा प्रारंभ होगी.
अलग-अलग समय पर बदलेंगे नक्षत्र और राशि
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार चंद्रमा सुबह 10:04 बजे कन्या से तुला राशि में प्रवेश करेगा. इसके बाद भी चित्रा नक्षत्र रात तक रहेगा. यानी चंद्र राशि बदलने और नक्षत्र बदलने का समय एक नहीं है.
रात में तीन बदलाव होंगे
- – रात 9:05 बजे: वैधृति समाप्त, विष्कम्भ योग शुरू.
- – रात 9:30 बजे: प्रतिपदा समाप्त, द्वितीया तिथि शुरू.
- – रात 10:32 बजे: चित्रा समाप्त, स्वाति नक्षत्र शुरू.
इन बदलावों के कारण सुबह और रात का पंचांग अलग-अलग होगा. पूजा प्रारंभ करने के लिए जानकार पुरोहित से निर्धारित मुहूर्त की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें. हलांकि शास्त्रों में चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के शुरुआती दो चरणों को छोड़कर कलश स्थापना का विधान है-
लाभ-अमृत चौघड़िया: प्रातः 10:04 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: प्रातः 11:49 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक
द्विस्वभाव (धनु) लग्न: प्रातः 11:32 बजे से दोपहर 01:36 बजे तक
शारदीय नवरात्रि 2026: पूजन तिथियां
11 अक्टूबर: मां शैलपुत्री पूजा, घटस्थापना
12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी पूजा
13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा पूजा
14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा पूजा
15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता पूजा
16 अक्टूबर: मां कात्यायनी पूजा
17 अक्टूबर: मां कालरात्रि पूजा
18 अक्टूबर: मां महागौरी पूजा
19 अक्टूबर: मां सिद्धिदात्री पूजा
20 अक्टूबर: दुर्गा विसर्जन एवं विजयादशमी (दशहरा)
कलश स्थापना विधि और आवश्यक सामग्री
आवश्यक पूजन सामग्री
मिट्टी का चौड़ा पात्र, साफ मिट्टी, जौ, तांबे या मिट्टी का कलश, गंगाजल, कलावा (मौली), रोली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, आम या अशोक के 5 पत्ते, नारियल, लाल चुनरी, फल-फूल, धूप-दीप और श्रृंगार सामग्री.
मां दुर्गा की सरल पूजन विधि
- प्रतिपदा के दिन प्रातः स्नानादि के बाद पूजा स्थल को साफ-स्वच्छ कर लें.
- भगवान श्री गणेश का स्मरण कर अखंड दीप प्रज्वलित करें.
- मिट्टी के पात्र में मिट्टी बिछाकर उसमें जौ बोएं.
- तांबे के कलश पर स्वास्तिक बनाएं और कंठ पर मौली बांधें.
- कलश में जल, गंगाजल, सिक्का, सुपारी, दूब और अक्षत डालें.
- कलश के मुख पर 5 आम या अशोक के पत्ते लगाएं.
- एक जटाधारी नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर मौली बांधें और उसे कलश के ऊपर स्थापित करें.
- अब इस पूरे कलश को जौ वाले पात्र के मध्य स्थापित कर नवरात्रि व्रत का संकल्प लें.
परंपरा और विधि का रखें ख्याल
जिन घरों में पहली बार नवरात्रि की पूजा होने जा रही है अपनी पारिवारिक परंपरा और विधि के अनुसार पूजन करें. आज ही अगले दिनों की व्यवस्था भी तय कर लें. सुबह पूजा कौन करेगा, शाम की आरती कब होगी और बाहर रहने पर घर की पूजा कौन संभालेगा, इन बातों को पहले तय करने से रोज की जल्दबाजी कम होगी.
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