जन्मपत्रिका में ऐसे कई ग्रह नीच राशि में बैठे रहते हैं, जिनसे शुभ फल प्राप्त होता है.
Source : DB News Update
Authored by : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा| Edited by : सुप्रिया
Neechbhang Rajyog : किसी की जन्मपत्रिका में यदि कोई ग्रह नीच राशि का बैठा है तो कुछ ऐसी स्थितियां बनती हैं, जिसके कारण नीच ग्रह अपना अशुभ फल नहीं दे पाता है. बल्कि नीच ग्रह किसी दूसरे ग्रह के प्रभाव के कारण शुभ फल देने के लिए बाधित हो जाता है, तो ऐसी स्थिति को नीचभंग राजयोग कहा जाता है, इस पर ज्योतिषाचार्यों के लिए शोध का विषय बन गया है. सरल शब्दों में कहें तो जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में होता है, तो सामान्यतः उसे कमजोर और अशुभ फल देने वाला माना जाता है. लेकिन पंचांग और कुंडलियों में कुछ ऐसी विशेष स्थितियां बनती हैं, जिससे उस ग्रह का दोष पूरी तरह समाप्त हो जाता है और वह अशुभ फल देने के बजाय अत्यंत शुभ और राजयोग जैसा फल देने लगता है. ज्योतिष में इस स्थिति को ‘नीचभंग राजयोग’ कहा जाता है.
ज्योतिषियों ने दिया ‘नीच भंग राजयोग’ का नाम
जब राजयोग बनाने वाले ग्रह का नीच भंग होता है तो वह ग्रह अत्यधिक शुभ फल देने लगता है, इसलिए नीच की रद्दगी को ‘नीच भंग राजयोग’ का नाम ज्योतिषियों ने दिया है। नीचभंग राजयोग के बारे में यह कहा जाता है कि यह राजयोग सर्वप्रथम नीच का फल देता है। अतः अच्छा फल से पहले तिरस्कार, अवनति या अन्य किसी प्रकार का कष्ट व्यक्ति को देेता है। नीच का ग्रह नीचभंग होने पर कष्ट देने के बाद ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करता है, जिसके कारण व्यक्ति का कष्ट दूर होकर शुभ प्रभाव मिलने लगता है.
उच्च के ग्रह का साथ होना
यदि कुंडली में जो ग्रह नीच राशि में बैठा है, उसी राशि में उसका उच्च होने वाला ग्रह भी साथ आकर बैठ जाए, तो नीच का प्रभाव खत्म हो जाता है. उदाहरण बतौर यदि किसी कुंडली में सूर्य तुला राशि (नीच राशि) में बैठा हो और उसी भाव में शनि (जो तुला में उच्च का होता है) भी आकर बैठ जाए. यदि नीच ग्रह जिस भी राशि में बैठा है, उस राशि का मालिक (स्वामी) यदि कुंडली के केंद्र भाव (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण भाव (1, 5, 9) में बलवान होकर बैठा हो, तो भी नीच ग्रह का अशुभ फल रुक जाता है. वहीं नीच ग्रह जिस राशि में बैठा है, उस राशि में जो ग्रह उच्च का होता है, उसका स्वामी (मालिक) यदि केंद्र या त्रिकोण में हो, या नीच ग्रह पर दृष्टि डाल रहा हो, तो ग्रह का नीचत्व भंग हो जाता है.
लग्नेश या चन्द्रमा से केंद्र में स्थिति
यदि नीच राशि में बैठा ग्रह लग्न (पहला भाव) या चन्द्रमा से केंद्र भाव (1, 4, 7, 10वें घर) में स्थित हो, तो वह समय के साथ अपने अशुभ प्रभावों को खो देता है और व्यक्ति को जीवन में संघर्ष के बाद बड़ी सफलता दिलाता है. यदि कोई ग्रह मुख्य लग्न कुंडली (D1) में तो नीच राशि का दिखाई दे रहा है, लेकिन जब हम उसकी सूक्ष्म स्थिति यानी नवमांश कुंडली (D9 Chart) देखते हैं और वह वहाँ अपनी उच्च राशि या स्वराशि (अपनी खुद की राशि) में बैठा हो, तो उसका सारा अशुभ फल नष्ट हो जाता है. ऐसा ग्रह अंदरूनी रूप से बेहद शक्तिशाली होता है.
ग्रह से प्रभावित जातक की परिस्थितियां
सूर्य – जातक रूखा, बड़े चेहरा वाला, स्वस्थ शरीर वाला होगा, वह अपनी पत्नी से अधिक प्यार करेगा ।
चन्द्रमा – जातक नर्तक, संगीतज्ञ, अज्ञानियों की संगति में रहने वाला, अनाप-शनाप बोलने वाला, अशुभ विचार, संर्कीण मानसिकता रखने वाला, सन्देहास्पद चरित्र एवं स्वभाव वाला होगा।
मंगल – धनी, स्थिर प्रगति, जीवन में सुखी, होशियार, विज्ञान में कुशल, रात्रि में घूमने वाला, हेरा-फेरी करने में महारती, और विचित्र आचरण वाला होगा।
बुध – जातक की पत्नी आज्ञाकारी, सुन्दर, होशियार, उच्च नैतिकता वाली होगी।
बृहस्पति – जातक का जीवनसाथी सुन्दर होगा, उसे सभी स्थानों पर नीचभंग के कारण आदर और सम्मान मिलेगा, वह अनेक लोगों का पालन पोषण करेगा तथा अपने जन्मस्थान से दूर विदेश में रहेगा।
शुक्र – नीचभंग होने के कारण जातक हमेशा सुखी रहेगा, सभा में अच्छा बोलने वाला, विद्वान, राजनीति में कुशल, कीमती पत्थरों से सम्मान पाने वाला होगा।
शनि – शत्रुओं का नाश करने वाला, स्वस्थ शरीर, आकर्षक चेहरे वाला, सम्राट, स्वतंत्र विचारों वाला, पत्नी से सुखी, भाईयों वाला और अपनी जाति के लोगों से सम्मान पाने वाला होगा। ऐसा प्रसिद्ध फलित ग्रंथ मानसागरी का मत है.
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