घर पर मातम छाया हो तो आप कैसे कोई त्योहार मना सकते हैं. कई लोग तो परिवार में किसी सदस्य की दिवाली के दिन मृत्यु हो जाए तो सालों तक यह पर्व नहीं मनाते हैं.
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By : DB News Update | Edited By : सुप्रिया
Diwali: दिवाली का पर्व हर साल कार्तिक अमावस्या (Kartik Amavasya) के दिन मनाया जाता है. यह हिंदू धर्म (Hindu Dharm) का खास पर्व है, जिसे युगों-युगों से मनाया जाता है. दीवाली दीप, प्रकाश और खुशियों का त्योहार है. लेकिन यह जान लेना चाहिए कि किन परिस्थितियों में आपको दिवाली का पर्व नहीं मनाना चाहिए. हलांकि शास्त्र में ऐसा कहीं प्रमाण नहीं मिलता है कि परिजन के चले जाने के पश्चात पूजा बंद कर दी जाए.
क्या वह त्योहार जीवनभर नहीं मनाना चाहिए?
घर के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जिस पर्व के दिन मृत्यु हुई हो, वह पर्व फिर कभी नहीं मनाया जाता. कई लोग इसे पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं, बिना यह जाने कि इसका आधार क्या है. ऐसे सवालों का जवाब देते हुए वृन्दावन के तपस्वी संत प्रेमानंद जी महाराज अपने अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा कि यह धारणा बिल्कुल गलत है. उनका कहना है कि धर्मग्रंथों में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि मृत्यु के कारण किसी पर्व को हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए. यह केवल समाज में बनी एक सोच है, जो धीरे-धीरे नियम की तरह मान ली गई.
धर्म शास्त्रों में जन्म से लेकर मृत्यु तक के नियम
कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या परिवार में मृत्यु होने के बाद दिवाली का पर्व मनाया जा सकता है या नहीं. तो आपको बता दें कि हमारे धर्म शास्त्रों में जन्म से लेकर मृत्यु तक के नियम बताए गए हैं और विभिन्न परिस्थिति के अनुसार में हमें इन्हीं नियमों का पालन करना चाहिए. इन नियमों का पालन करने से घर-परिवार समस्याओं से मुक्त रहता है.
मृत्यु हो तो क्या दिवाली मना सकते हैं?
धार्मिक दृष्टिकोण से दिवाली के दिन परिवार में मृत्यु हो जाए तो उस दिन त्योहार नहीं मनाया जाता है. क्योंकि इस समय पूजा-पाठ जैसे काम वर्जित होते हैं. क्योंकि इस दौरान सूतक की अवधि होती है जोकि 10 दिन से लेकर एक महीने की होती है. सूतक का पालन करते हुए परिवार को त्योहार नहीं मनाना चाहिए और मृतक की आत्मा की शांति के लिए परिवार को एक साथ प्रार्थना करनी चाहिए.
त्योहार को खोटा माना जाता है
वहीं दिवाली के दिन मृत्यु होने पर कई परिवार सालों तक इस त्योहार को नहीं मनाते हैं. क्योंकि मान्यता है कि अगर किसी पर्व में घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए तो उस त्योहार को खोटा माना जाता है.
नवजात का जन्म या नववधू के आगमन पर मना सकते हैं त्योहार
आम मान्यता के अनुसार जिस दिन या जिस साल दिवाली पर परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हुई तो उन्हें दिवाली नहीं मनानी चाहिए. लेकिन कहा जाता है कि उसी दिन अगर परिवार में किसी नवजात का जन्म हो जाए या नववधू का आगमन हो तो फिर से त्योहार मनाया जा सकता है.
शोक अवधि के नियम और मान्यताएं
जब किसी परिवार में मृत्यु होने पर सूतक-पातक और 13 दिनों का शोक होता है, जिसमें उत्सव, सजावट और आतिशबाजी नहीं की जाती है. परंपरा के अनुसार, दिवंगत आत्मा की शांति और सम्मान में पहले साल घर पर दिवाली का त्योहार नहीं मनाया जाता है. अगले साल बरसी के पश्चात ही त्योहार फिर से मनाना शुरू किया जाता है. यदि उसी दिन (जिस दिन मृत्यु हुई हो) परिवार में किसी नवजात शिशु का जन्म हो जाए या नववधू का आगमन हो जाए, तो त्योहार को पुनः मनाया जा सकता है. शास्त्रीय जानकारों के अनुसार, घर के मुख्य उत्सव या पटाखे आदि भले न जलाएं, लेकिन नियम और क्रम न टूटने के लिए किसी पंडित या पड़ोसी की मदद से सूक्ष्म रूप से लक्ष्मी पूजन कर सकते हैं.
शास्त्र में किसी व्यक्ति के स्वर्गवास हो जाने पर पूजा नहीं करने का विधान नहीं बताया गया है. अमावस्या की रात्रि देवी की पूजा करने का नियम है.
शास्त्रों में क्या कहा गया है?
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज और वृन्दावन के संत प्रेमानंद जी महाराज धर्म शास्त्री की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि शास्त्रों में मृत्यु के बाद शोक की अवधि बताई गई है. आम तौर पर 11 दिनों तक शोक मनाने की परंपरा है. इस दौरान उत्सव, विवाह या बड़े आयोजन नहीं किए जाते, लेकिन जैसे ही यह अवधि पूरी होती है, जीवन फिर से सामान्य हो जाता है. उनका कहना है कि अगर इस सोच को मान लिया जाए कि मृत्यु के कारण त्योहार हमेशा के लिए बंद हो जाएं, तो फिर दुनिया में कोई भी पर्व नहीं मनाया जा सकेगा. रोज हजारों लोगों की मृत्यु होती है, लेकिन इससे प्रकृति का चक्र नहीं रुकता और न ही धर्म का मार्ग. इसलिए अमावस्या की रात्रि देवी की पूजा करने का विधान है.
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