मकर संक्रांति पर्व 2027 में 15 जनवरी को है. यह पर्व सूर्य के मकर राशि में गोचर और उत्तरी गोलार्ध में सूर्य के यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है, जिसे उत्तरायण भी कहते हैं.
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By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Makar Sankranti 2027: मकर संक्रांति को लोग पारंपरिक उत्सव के रूप में भी मनाते हैं. इस दिन विशेष रूप से सूर्य देव की पूजा का महत्व होता है. इस दिन सूर्य धनु राशि की यात्रा समाप्त कर मकर राशि मे प्रवेश करते हैं, जोकि शनि देव की राशि है. सूर्य और शनि पिता पुत्र हैं, लेकिन फिर भी दोनों के बीच शत्रुता का संबंध है. कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य शनि देव से मिलने जाते है. मकर संक्रांति हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण पर्वों में एक है और साथ ही यह नए साल का पहला पर्व भी होता है.
इस पर्व को लोग अलग-अलग नामों से जानते हैं. बिहार और यूपी में इसे मकर संक्रांति या खिचड़ी (Khichdi) पर्व कहते हैं. पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी पर्व, तमिलनाड़ु में पोंगल तो वहीं असम में माघ बिहू या भोगाली बिहू कहा जाता है. कई बार मकर संक्रांति 14 तो कई बार 15 जनवरी को भी पड़ती है.
2027 में कब मनाया जाएगा मकर संक्रांति पर्व
मकर संक्रांति का पर्व 2027 में शुक्रवार 15 जनवरी को मनाया जाएगा. मकर संक्रांति किसी तिथि, नक्षत्र या पक्ष द्वारा निर्धारित नहीं होती, बल्कि एक खगोलीय घटना द्वारा निर्धारित होती है. वह क्षण जब सूर्य धनु नक्षत्र से मकर नक्षत्र में प्रवेश करता है. 2027 में यह प्रवेश 14 जनवरी, गुरुवार की शाम को भारत में सूर्यास्त के बाद होगा. उस दिन सूर्यास्त लगभग 5:45 बजे हो जाएगा और सूर्य का पारगमन कुछ घंटों बाद होगा. चूंकि भारत में उदया तिथि के अनुसार पर्व मनाने की परंपरा है. इस कारण मकर संक्रांति की उदया तिथि 15 जनवरी 2026 दिन शुक्रवार को पड़ेगी.
मकर संक्रांति पर स्नान-दान का महत्व
स्नान-दान के लिए भी मकर संक्रांति की तिथि को उत्तम माना जाता है. इस दिन लोग पवित्र नदी में स्नान करते हैं, सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं और फिर दान-पुण्य करते हैं. इस दिन विशेष रूप से गर्म कपड़े, कंबल, गुड़, तिल, खिचड़ी आदि का दान करना चाहिए.
क्यों मनाते हैं मकर संक्रांति
- मकर संक्रांति मनाने के पीछे धार्मिक, प्राकृतिक और खगोलीय महत्व जुड़े हैं. यह ऐसा हिंदू त्योहार है, जिसे फसल के मौसम की शुरुआत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.
- वहीं खगोलीय दृष्टि से यह शीतकालीन संक्रांति के अंत और लंबे दिनों की शुरुआत का प्रतीक होता है.
- ज्योतिष की माने तो मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य मकर राशि में गोचर करते हैं और उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की यात्रा की शुरुआत का भी प्रतीक है.
- कई जगह पर इसे पतंग महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है. लोग घर की छतों में पतंगबाजी करते हैं.
महाभारत और पुराणों में मकर संक्रांति का उल्लेख
मकर संक्रांति पर्व से पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं. पुराणों में इस पर्व का वर्णन मिलता है. महाभारत में पांडवों द्वारा मकर संक्रांति मनाने का उल्लेख मिलता है. वहीं इस पर्व का श्रेय वैदित ऋषि विश्वामित्र को भी दिया जाता है.
यह भी कहा जाता है कि, मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सगर में जा मिली थीं.
सूर्य उत्तरायण होने के प्रमुख संकेत
परंपरा के अनुसार मकर संक्रांति से उत्तरायण (सूर्य का उत्तर की ओर मार्ग) का शुभारंभ हो जाना ही उत्तरायण है और वर्ष के छह महीने के उस भाग को विशेष रूप से शुभ माना जाता है, यह समय जुलाई में कर्क संक्रांति पर समाप्त होता है. उसके बाद दक्षिणायन का प्रारंभ हो जाता है. ग्रंथों में उत्तरायण को उज्ज्वल अर्धभाग, देवयान या देवताओं का मार्ग बताया गया है. यह समय परंपरा के अनुसार संस्कारों, अध्ययन प्रारंभ करने और विकास के लिए किए जाने वाले कार्यों के लिए अनुकूल माना गया है. इसका उदाहरण महाभारत में भी मिलता है. जब भीष्म को इच्छा-मृत्यु ( अपनी इच्छा से मृत्यु) का वरदान प्राप्त था और वे युद्ध के अंत तक बाणों से बनी अपनी शय्या पर लेटे रहे और सूर्य के उत्तरायण प्रारंभ होने तक भीष्म ने प्राण नहीं त्यागे.
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