भारत की संन्यास परंपरा का इतिहास जानने की उत्सुकता हर किसी को है, लेकिन साधु बनने की डगर कितनी कठिन और रोमांच से भरी है. नागा साधुओं की तपस्या और उनकी दिनचर्या को जानने के लिए हर कोई उत्सुक.
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By : DB News Update | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Simhastha Mela Ujjain 2028 : बिना लिबास के राख से लिपटा बदन, माथे पर चमकता तिलक, हाथों में त्रिशूल, आंखों में हरदम गुस्सा और जुबां पर हर दम ‘हर हर महादेव’ का नारा लगाते हुए चलता साधुओं का झुंड नागाओं की पहचान है. जो हमेशा कुंभ मेला में ही देखने को मिलते हैं. ये साधु हजारों की भीड़ के साथ स्नान करने निकलते हैं. नागा भलें ही आपकों अलग-अलग दिखाई पड़ते हों. लेकिन इनका रहन-सहन और दृढ़ विश्वास एक जैसा देखने को मिलेगा. लेकिन क्या आपको पता है कि नग्न रहने वाले साधु कितनी कठिन तपस्या के बाद बनते है? क्योंकि नागा साधु बनना इतना आसान नहीं होता है, कहा जाता है कि इन्हें 12 साल की कठिन तपस्या करनी पड़ती है. उसके बाद ही एक आम इंसान नागा साधु बन पाता है.
कैसे तपस्वी साधुओं के लिए नागा शब्द
असल में ‘नागा’ शब्द की उत्पत्ति के बारे में कुछ विद्वानों की मान्यता है कि यह शब्द संस्कृत के ‘नागा’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ‘पहाड़’ से है. पहाड़ पर रहने वाले लोग ‘पहाड़ी’ या ‘नागा’ कहलाते हैं. पहाड़ में एकांत तपस्या व साधना करने वाले साधु-संत नागा कहलाते हैं.
ऐसी है नागा साधु बनने की प्रक्रिया
पहला चरण-
- नागा साधु बनने वाले व्यक्ति का लेखा-जोखा रखने के लिए उस आदमी का पूरा ब्यौरे लिया जाता है, यानि उसका नाम, तारीख वगैरह लिखी जाती है.
- नागा साधु का सिर मुंडवा दिया जाता है. फिर मंत्र गुरु के साथ शिष्य पवित्र अग्नि के पास त्रिकोण बनाकर बैठते हैं. ईश्वर को पुष्प और जल अर्पित करते है.
- चार गुरुओं द्वारा भस्म, लंगोटी, जनेऊ और रूद्राक्ष की माला दी जाती है.
- इसके बाद नागा साधु बनने के इत्छुक व्यक्ति के सिर पर जो चोटी बची होती है उसे भी हटा दिया जाता है.
- उसे गद्दी में बैठाते हैं और उसके बाद उसका नया नामकरण किया जाता है.
दूसरा चरण-
- महापुरूष से संन्यासी बनने की प्रक्रिया अब दूसरे चरण में प्रारंभ होती है. विराज हवन नाम का यज्ञ कुंभ मेले के दौरान होता है.
- महापुरुष को घर, परिवार के पास संसारिक सुख लेने के लिए उसे वापिस लौटने का आखिरी मौका दिया जाता है.
- महापुरूष को कपड़े उतारकर कुछ कदम उत्तर दिशा की ओर चलने के लिए कहा जाता है और फिर वापिस बुला लिया जाता है. दरअसल, ये हिमालय की यात्रा को दर्शाने वाला कदम है.
- महापुरूष वापस अखाड़े में लौटता है. जिसके बाद चार चिताओं की आड़ में यज्ञ शुरू होता है. अब वो दुनिया के लिए मर चुका है.
तीसरा चरण
- नागा अखाड़े के बीचों बीच एक लंबा खंभा कीर्ति स्तंभ स्थापित होता है.
- संन्यासी चार महंतों के साथ इस स्तंभ के सामने पहुंचते हैं और एक आचार्य जल का लोटा लिए कीर्ति स्तंभ के सामने आते हैं.
- संन्यासी के ऊपर जल डालते हैं, उसके बाद आचार्य पूरी ताकत से उसका 3 बार लिंग खींचते हैं. इस संस्कार को टांग तोड़ कहते हैं.
- मान्यता है कि टांग तोड़ में सन्यासी के लिंग के नीचे का मेम्ब्रेन तोड़ दिया जाता है जिससे उसका लिंग कभी भी उत्तेजित अवस्था में नहीं आता. इससे उसके अंदर की काम की इच्छा ही मर जाती है वह वासना और काम के किसी भी किस्म से मुक्त हो जाता है.
नागा साधु की परंपरा अत्यंत कठिन
साधु बनने की प्रक्रिया में व्यक्ति को अपने परिवार, संपत्ति, और सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त होना पड़ता है. यह एक प्रकार का आध्यात्मिक त्याग है.
नागा साधु बनने के लिए गुरु से दीक्षा लेनी पड़ती है. दीक्षा के दौरान व्यक्ति को कुछ विशेष प्रकार की विधियों और मंत्रों का ज्ञान दिया जाता है.
अंगतोड़ के बाद साधु को कठिन तपस्या करनी होती है. इसमें कठिन योग, ध्यान, और साधना शामिल होती है, जिससे व्यक्ति अपनी आत्मा को शुद्ध और शक्तिशाली बनाता है.
नागा साधु बनने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है. यह उनकी साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
नागा साधु बनने के बाद साधु अपने शरीर पर कोई वस्त्र नहीं धारण करते. संपूर्ण नग्नता का पालन करते हैं. यह सांसारिक बंधनों और भौतिक वस्त्रों से मुक्त होने का प्रतीक है.
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