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DB News Update | Divya Bhumi News > Blog > Religion > समुद्र मंथन से निकला अमृत कलश कैसे बना कुंभ का कारण? जानें…
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समुद्र मंथन से निकला अमृत कलश कैसे बना कुंभ का कारण? जानें…

DB News
Last updated: 30/09/2026 11:16 AM
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13 जनवरी 2025 से प्रयागराज में महाकुंभ शुरू हो रहा है. मान्यता है कि कुंभ मेले के आयोजन का संबंध समुद्र मंथन से जुड़ा है.

Source : DB News Update

Contents
13 जनवरी 2025 से प्रयागराज में महाकुंभ शुरू हो रहा है. मान्यता है कि कुंभ मेले के आयोजन का संबंध समुद्र मंथन से जुड़ा है.क्यों लगता है कुंभ मेलाअमृत कलश के निकलने के बाद देवताओं और दावनों के बीच विवाद12 दिन तक अनवरत चला युध्यभगवान ने देव और दानवों को  कराया अमृत पानचन्द्र-सूर्य आदि ने की थी रक्षाअर्धकुंभ, कुंभ- पूर्णकुंभ और महाकुंभ स्नान करने का विधानसूर्य के मकर राशि में होने पर होता है महाकुंभभगवान राम और कृष्ण का संदर्भ

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Kumbh Mela 2025: कुंभ मेला चार पवित्र स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है. 13 जनवरी 2025 से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ लगने वाला है, जिसका समापन 26 फरवरी 2025 को होगा. इस दौरान साधु-संत और लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचकर त्रिवेणी संगम पर आस्था की डुबकी लगाते हैं और आत्म शुद्धि प्राप्त करते हैं.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुंभ मेले की शुरुआत कैसे हुई और आखिर क्यों इन्हीं चार स्थानों पर आयोजित होता है कुंभ मेला. धार्मिक मान्यता और कथाओं के अनुसार कुंभ का संबंध समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश से जुड़ा है. आइये जानते हैं आखिर कैसे समुद्र मंथन से निकला अमृत कलश बना कुंभ का कारण.

क्यों लगता है कुंभ मेला

कुंभ मेले के आयोजन को लेकर कई मान्यताएं और इतिहास है. लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ी है. कहा जाता है कि देवताओं और दानवों ने मिलकर जब समुद्र को मथा तब इससे 14 बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति हुई, जिसमें अमृत कलश भी एक है. दरअसल अमृत कलश के लिए ही समुद्र मंथन किया गया था. सबसे आखिर में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर बाहर निकले.

अमृत कलश के निकलने के बाद देवताओं और दावनों के बीच विवाद

अमृत कलश के निकलने के बाद देवताओं और दावनों के बीच विवाद हो गया. इस बीच दानवों से बचाने के लिए इंद्र के पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर भागने लगे. दानवों ने भी जयंत का पीछा किया. जब जयंत अमृत कलश लेकर भाग रहे थे तब कलश से अमृत की कुछ बूंदे पृथ्वी के चार स्थानों पर गिर गई. ये चार स्थान प्रयागराज, उज्जैन, हरिद्वार और नासिक थे. इसलिए इन जगहों को धरती का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है. मान्यता है कि कुंभ के आयोजन के दौरान इन नदियों का जल अमृत के समान हो जाता है.

12 दिन तक अनवरत चला युध्य

बताया जाता है कि अमृत पान को लेकर देव-दैत्यों में 12 दिन तक अनवरत युद्ध चला, उसी समय भगवान् श्रीहरि परमसुंदरी का रूप धारणकर, हाथों में अमृतकलश लेकर प्रकट हुए, यह उनका मोहिनी अवतार कहलाया. भगवान के रूपलावण्य की माधुरी को देखकर, देव और दानव सभी विमोहित हो गए. देवताओं के 12 दिन मनुष्यों के 12 वर्ष के तुल्य होते हैं. वस्तुतः कुंभ भी 12 होते हैं, जिनमें चार पृथ्वी पर और आठ देवलोक में होते हैं.

भगवान ने देव और दानवों को  कराया अमृत पान

भगवान ने देव और दानवों को दो अलग-अलग पंक्तियों में बैठाकर, सर्वप्रथम देवताओं को अमृत पान कराने लगे, इसी मध्य राहु नाम का असुर छद्म रूप से देवभेष धारण करके, देवताओं के बीच जाकर बैठ गया, जिसे सूर्य-चंद्र ने संकेत से भगवान को बताया और भगवान ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया, किंतु अमृत पान कर लेने कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई, बल्कि वह दो भागों में विभक्त हो गया. यही आगे चलकर राहु और केतु कहलाए.

चन्द्र-सूर्य आदि ने की थी रक्षा

जिस समय देवराज इन्द्र पुत्र अमृत कलश को लेकर आकाशीय मार्ग से देवलोक जा रहे थे, उस समय चन्द्र-सूर्यादि उसकी रक्षा की थी, तत्समयानुसार ही वर्तमान राशियों पर चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में कुंभ का योग होता है.

अर्धकुंभ, कुंभ- पूर्णकुंभ और महाकुंभ स्नान करने का विधान

अर्धकुंभ केवल हरिद्वार और प्रयाग में ही लगता है, जो कि क्रमशः 6 वर्षों के बाद लगता है. जब तीर्थराज प्रयाग में कुंभ लगता है, तब उसके 6 वर्ष बाद धर्मनगरी हरिद्वार में अर्धकुंभ लगता है. इसी प्रकार जब हरिद्वार में कुंभ लगता है, तब उसके 6 वर्ष के बाद प्रयाग में अर्ध कुंभ लगता है.

सूर्य के मकर राशि में होने पर होता है महाकुंभ

जब देवगुरु बृहस्पति वृषभ राशि में और ग्रहों के राजा मकर राशि में होते हैं तो महाकुंभ का आयोजन तीर्थ प्रयागराज में किया जाता है. जब देवगुरु बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्यदेव मेष तक में होते हैं तब धर्मनगरी हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन किया जाता है. जब सूर्यदेव मेष राशि में और देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि होते हैं, तब कुंभ मेले का आयोजन उज्जैन में किया जाता है. जब देवगुरु और सूर्यदेव दोनों ही सिंह राशि में होते हैं तो महाकुंभ का आयोजन पंचवटी के नासिक में होता है. जहां देश के कोने-कोने से संत-महपुरुष आकर, शिविर बनाकर, कल्पवास करते हैं और अपनी आध्यात्मिक गति-मति की अभिवृद्धि हेतु साधना करते हैं.

भगवान राम और कृष्ण का संदर्भ

रामायण में भगवान राम के जीवन में तीर्थ यात्रा का उल्लेख मिलता है. वनवास के दौरान जब वे प्रयाग आज का प्रयागराज पहुंचे, तो उन्होंने संगम में स्नान किया और भरद्वाज मुनि के आश्रम में विश्राम किया. हालांकि, यह कुंभ मेला नहीं था. इसे एक साधारण तीर्थ स्नान कहा जा सकता है. वहीं भगवान कृष्ण का जीवन महाभारत और अन्य ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है, लेकिन कुंभ मेले से जुड़ी कोई घटना या उल्लेख नहीं मिलता. हालांकि, उन्होंने धर्म और तीर्थ यात्रा का महत्व जरूर बताया है, लेकिन उनके समय में कुंभ मेले जैसा कोई आयोजन नहीं होता था.

 

 

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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