एमपी के छिंदवाड़ा-पांढुर्ना में 200 साल पुरानी गोटमार परंपरा, दो गांवों के बीच जाम नदी पर गाड़ दिया जाता है झंडा, फिर शुरू होता है पथराव
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By : प्रिंस अवस्थी
MP Gotmar Mela 2025: एमपी छिंदवाड़ा जिले के अंतर्गत पांढुर्ना और सावर गांव के बीच जाम नदी पर गोटमार मेले का उत्सव मनाया गया. जिसमें, दोनों ओर से लोग एक दूसरे पर पत्थर बरसाए. जिसमें करीब 800 लोग घायल हुए और 72 गंभीर बताए जा रहे हैं. जिसमें से कुछ की हालत नाजुक है. यह सब कुछ एक उत्सव के रूप में होता है. यह अनोखा उत्सव मध्य प्रदेश के पांढुर्ना जिले में हर साल मनाया जाता है, शनिवार (23 अगस्त) को वार्षिक गोटमार उत्सव मनाया गया, इस दौरान कई लोग घायल हो गए.
इलाज कराने के बाद फिर मैदान में नजर आते हैं खिलाड़ी
परंपरा के नाम पर पत्थर बरसाने का जुनून ऐसा है कि घायल होने के बाद प्रशासन द्वारा घायलों का अस्पताल में इलाज करवाता जाता है. उसके बाद फिर घायल तैयार होकर मेला स्थल पहुंच जाते हैं और पत्थर बरसाने लगते हैं. ऐसी मान्यता है कि जितने ज्यादा पत्थर बरसेंगे और जिसे चोट लग गई उस पर माता की कृपा हो गई. इसे वे प्रसाद मानते हैं. दिन भर चलने वाली इस परंपरा के लिए नगर पालिका खुद यहां पर पत्थरों के ढेर लगवाती है. डॉक्टरों की व्यवस्था होती है, प्रशासन मुस्तैद होता है.
क्या है गोटमार उत्सव?
पांढुर्ना और सावरगांव के बीच लगभग 200 साल से चली आ रही यह परंपरा एक अनोखे तरीके से पथराव किए जाने की परंपरा है. मेले की शुरुआत देवी चंडिका की पूजा से होती है, जिसके बाद दोनों गांवों के लोग जाम नदी के किनारों पर आमने-सामने खड़े होकर पत्थर फेंकते हैं.
मान्यता है कि एक युवक ने सावरगांव की लड़की का अपहरण किया था और उसे बचाने के लिए दोनों गांवों में संघर्ष हुआ. उत्सव के दौरान नदी के बीच लगे पेड़ पर झंडा छीनने की होड़ लगती है, जबकि दोनों ओर से पत्थरबाजी की जाती है.
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इस साल पुलिस ने उत्सव की निगरानी ड्रोन कैमरों से की. गुलेल, हथियार और शराब के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई थी. 500 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 10 एम्बुलेंस मौके पर तैनात की गईं. कई मेडिकल टीम भी पूरे समय सक्रिय रहीं.
झंडे पर कब्जे को लेकर होता है मुकाबला
गोटमार मेले की परंपरा में दोनों पक्षों के बीच झंडे पर कब्जे को लेकर मुकाबला होता है. नदी के बीच लगे झंडे को हासिल करने के लिए खिलाड़ी पत्थर चलाते हैं. वर्षों पुरानी इस परंपरा के कारण हर साल बड़ी संख्या में लोग घायल होते रहे हैं और कई बार मौतें भी हो चुकी हैं. गोटमार मेले में घायलों के इलाज के लिए मेला क्षेत्र में 7 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए हैं. स्वास्थ्य विभाग ने 44 डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई है, जबकि 22 एंबुलेंस भी तैनात की गई हैं. घायलों को जरूरत के मुताबिक प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल भेजा जा रहा है.
परंपरा के नाम पर बरसते हैं मौत के पत्थर
दरअसल, पांढुर्णा और सावरगांव के बीच जाम नदी पर पोला पर्व के दूसरे दिन आयोजित होने वाले इस मेले में हजारों लोग शामिल होते हैं. मां चंडिका के पूजन और दर्शन के बाद खिलाड़ी गोटमार में हिस्सा लेते हैं. वर्ष 1955 से 2025 तक गोटमार में पत्थरबाजी के दौरान 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं. प्रशासन हर साल इस परंपरा को रोकने और पत्थरबाजी की जगह सुरक्षित तरीके अपनाने की कोशिश करता है, लेकिन परंपरा के नाम पर होने वाला यह आयोजन पूरी तरह बंद नहीं हो पाया. कभी रबर बॉल से गोटमार कराने का प्रयास भी हुआ, लेकिन कुछ ही देर में रबर बॉल गायब हुए और पत्थरों की बरसात फिर शुरू हो गई.
मेले की शुरुआत के पीछे वजह क्या?
इस मेले की शुरुआत को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं. एक कहानी में भोसला राजाओं के सैनिकों के युद्धाभ्यास को इसकी शुरुआत से जोड़ा जाता है, जबकि दूसरी लोकप्रिय मान्यता पांढुर्णा के युवक और सावरगांव की युवती की प्रेम कहानी से जुड़ी है. कहा जाता है कि प्रेमी युगल को रोकने के दौरान दोनों पक्षों में पत्थरबाजी हुई और इसी घटना के बाद गोटमार की परंपरा शुरू हुई. हालांकि बुजुर्गों का कहना है कि समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदल गया है. गोफन, अवैध शराब और बढ़ती आक्रामकता ने मेले को पहले से ज्यादा खतरनाक बना दिया है.

