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DB News Update | Divya Bhumi News > Blog > Religion > गोवत्स द्वादशी आज? जानें पूजा विधि…
Religion

गोवत्स द्वादशी आज? जानें पूजा विधि…

DB News
Last updated: 02/10/2026 10:26 AM
DB News
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7 Min Read
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गाय और बछड़े के प्रति श्रद्धा और आभार का प्रतीक है गोवत्स द्वादशी. इसे दीपावली पर्व के प्रारंभ का प्रतीक भी माना जाता है और धनतेरस से एक दिन पहले मनाने की परंपरा है.

Source : DB News Update

Contents
गाय और बछड़े के प्रति श्रद्धा और आभार का प्रतीक है गोवत्स द्वादशी. इसे दीपावली पर्व के प्रारंभ का प्रतीक भी माना जाता है और धनतेरस से एक दिन पहले मनाने की परंपरा है.गोवत्स द्वादशी तिथि व मुहूर्तपूजन विधि:व्रत के नियमगोवत्स द्वादशी की कथा:गोवत्स द्वादशी का व्रत करने की विधि

By : DB News Update  | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Govatsa Dwadashi 2025: गोवत्स द्वादशी आज 17 अक्टूबर को है. महाराष्ट्र में इसे वासु बारस और गुजरात में वाघ बरस के नाम से जाना जाता है, गाय और उसके बछड़े के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है. इसे दीपावली पर्व के प्रारंभ का प्रतीक भी माना जाता है और धनतेरस से एक दिन पहले मनाने की परंपरा है. इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना से व्रत रखती हैं.

इसे बछ बारस, नंदिनी व्रत या वत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की जाती है तथा गाय के दूध से बने पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता.

गोवत्स द्वादशी तिथि व मुहूर्त

तिथि: शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

द्वादशी प्रारंभ: 17 अक्टूबर, प्रातः 11:12 बजे

द्वादशी समाप्त: 18 अक्टूबर, दोपहर 12:18 बजे

पूजन मुहूर्त (प्रदोष काल): शाम 5:49 से रात 8:20 तक

पूजन विधि:

स्नान और संकल्प: सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. संकल्प लें कि आप गौ माता और उनके बछड़े की श्रद्धा से पूजा करेंगे.

गौ पूजा: यदि वास्तविक गाय-बछड़ा उपलब्ध हों तो उन्हें स्नान कराएं और सजाएं. अन्यथा मिट्टी या चित्र रूप में उनकी पूजा करें.

श्रृंगार व अर्पण: हल्दी-कुमकुम लगाएं, फूलों की माला पहनाएं, और उन्हें हरी घास, चना या अंकुरित मूंग खिलाएं.

आरती व कथा: दीपक जलाकर गौ माता की आरती करें और फिर गोवत्स द्वादशी की कथा श्रद्धा से सुनें.

पारण: व्रत का पारण अगले दिन त्रयोदशी तिथि को गौ पूजा के बाद करें.

व्रत के नियम

  • इस दिन गेहूं, चावल और गाय के दूध से बने पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता.
  • भैंस का दूध, फल, या सादा भोजन लिया जा सकता है.
  • चाकू या किसी धारदार वस्तु का प्रयोग भी वर्जित होता है.

गोवत्स द्वादशी की कथा:

बहुत समय पहले एक गांव में एक साहूकार अपने सात बेटों और पोतों के साथ रहता था. उसने एक तालाब बनवाया था, जो वर्षों तक नहीं भरा. पंडित ने बताया कि तालाब तभी भरेगा जब साहूकार अपने बड़े बेटे या बड़े पोते की बलि देगा.

साहूकार ने अपने बड़े बेटे की पत्नी को मायके भेज दिया और पीछे से अपने पोते की बलि दे दी. तभी तेज बारिश हुई और तालाब भर गया. कुछ समय बाद बछ बारस का दिन आया और साहूकार अपने परिवार सहित तालाब पूजने गया.

घर जाते समय उसने दासी से कहा कि “गेहुंला पका लेना” वह “गेहुंला” शब्द का अर्थ न समझ सकी और गलती से बछड़े (जिसका नाम गेहुंला था) को ही पका दिया. जब साहूकार लौटकर आया तो उसने पूछा, “बछड़ा कहां है?” दासी ने कहा, “आपके कहे अनुसार पका दिया.” यह सुनकर साहूकार स्तब्ध रह गया.

शाम को जब गाय लौटी तो वह अपने बछड़े को ढूंढने लगी और मिट्टी खोदने लगी. तभी चमत्कार हुआ, मिट्टी में से बछड़ा जीवित बाहर निकल आया. साहूकार और उसका परिवार यह देखकर भाव-विभोर हो गए. उन्होंने गौ माता की पूजा की और संकल्प लिया कि अब हर वर्ष वे बछ बारस का व्रत करेंगे. कहा जाता है कि इस व्रत से संतान की रक्षा होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है. इसी कारण इस दिन गेहूं, मूंग और चाकू का प्रयोग वर्जित माना जाता है.

गोवत्स द्वादशी का व्रत करने की विधि

इस पर्व पर गीली मिट्टी से गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियां बनाकर नीचे दिए गए चित्र के अनुसार पटे पर रखी जाती है.

अगर आपके यहां गाय और बछड़ा नही है तो आप किसी दूसरे की गाय और बछड़े की पूजा कर सकते हैं. यदि गांव में भी गाय न हो तो मिट्टी के गाय बनाकर उनकी पूजा कर सकते हैं.

उन पर दही, भीगा हुआ बाजरा, आटा, घी आदि चढ़ाएं.

इनका रोली से तिलक करें और चावल-दूध चढ़ाएं.

इसके बाद मोठ, बाजरा पर रुपया रखकर बयान अपनी सास को दे दें.

इस दिन बाजरे की ठंडी रोटी खाई जाती है.

इस दिन गाय का दूध या इससे बनी दही न खाएं। साथ ही गेहूं व चावल भी न खाएं.

अपने कुंवारे लड़के की कमीज पर सांतियां बनाकर तथा उसे पहनाकर कुएं को पूजा जाता है.

इससे आपके बच्चे की जीवन की रक्षा होती है। साथ ही वो बुरी नजर से भी बचा रहता है.

जो महिलाएं व्रत करती हैं वो सुबह स्नान आदि कर निवृत्त हो जाएं.

इसके बाद गाय को उसके बछडे़ समेत स्नान करएं और नए वस्त्र ओढ़ाएं.

दोनों को फूलों की माला पहनाएं। फिर गाय-बछड़े के माथे पर चंदन का तिलक लगाएं.

फिर तांबे का एक पात्र लें। इसमें अक्षत, तिल, जल, सुगंध तथा फूलों को रख लें। इसके बाद मंत्र का उच्चारण करें.

    मंत्र- क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।

    सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:॥

    फिर गौमाता के पैरों में लगी मिट्टी को अपने माथे पर तिलक की तरह लगाएं.

    बछ बारस की कथा जरूर सुनें.

    दिनभर व्रत करें और गौमाता की आरती कर भोजन ग्रहण करें.

      Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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