ज्योतिष शास्त्र में गरीबी और इससे जुड़ी परेशानियों के लिए कौन-सा ग्रह जिम्मेदार होता है. साथ ही जानें इससे बचने के लिए किन उपाय को करना चाहिए.
Source : DB News Update
By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By- सुप्रिया
Rahu-Ketu: राहु-केतु दोनों ही छाया ग्रह है. इनका नाम सुनकर अक्सर लोग भयभीत हो जाते हैं. क्योंकि कुंडली में राहु-केतु के दुष्प्रभाव की वजह से मनुष्य परेशानियों और समस्याओं से घिर जाता है. क्योंकि जीवन में गरीबी, दरिद्रता, आर्थिक तंगी और इससे जुड़ी परेशानियों के लिए मुख्य रूप से राहु, केतु, शनि और कमजोर गुरु (बृहस्पति) जिम्मेदार माने जाते हैं. जब कुंडली में इन ग्रहों की स्थिति खराब होती है, तो व्यक्ति को कड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है.
अगर किसी जातक की कुंडली में राहु और केतु का प्रभाव है तो उसे आर्थिक तंगी या गरीबी हो सकती है. कुंडली में इसके अशुभ होने पर दिक्कतें झेलनी पड़ सकती है. राहु और केतु का परिवर्तन 18 महीने यानि डेढ़ साल के बाद होता है.
रिश्ते और धन-जन हानि का खतरा
कुंडली में राहु की स्थिति खराब होने से कामकाज ठप हो जाता है, धन हानि, धन लाभ में परेशानी आने लगती है. वहीं केतु के खराब होने से करियर में विकास नहीं होता, रिश्ते और संबंध खराब होने लगते हैं. जिस वजह से मानसिक स्थिति भी खराब हो सकती है.
गुलाबी रंग का वस्त्र फायदेमंद
राहु दोष को समाप्त या कम करने के लिए नीले रंग के वस्त्र पहने. वहीं केतु के दोष को कम करने के लिए गुलाबी रंग के वस्त्र पहने, इससे राहु और केतु दोष कम हो सकता है.
पंचमुखी रुद्राक्ष भी कारगर
राहु और केतु दोष को कम करने के लिए रुद्राक्ष की माला से पंचमुखी शिवजी के सामने बैठकर ‘ऊं नम: शिवाय’ मंत्र का जाप करें.
गरीबी से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की शेषनाग के ऊपर नृत्य करते हुए मूर्ति स्थापित करें. इस मूर्ति की पूजा नित्य करें.
गरीबी और परेशानियों के लिए मुख्य जिम्मेदार ग्रह
दरिद्रता का मुख्य कारक राहु और केतु हैं. दरअसल राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है. यदि कुंडली के दूसरे (धन) या ग्यारहवें (आय) भाव में इनका नकारात्मक प्रभाव हो, तो व्यक्ति का पैसा अचानक और गलत जगहों पर बर्बाद होता है. कर्ज का जाल और शेयर बाजार या सट्टे में भारी नुकसान अक्सर राहु के कारण ही होता है.
कर्म और संघर्ष का कारक हैं शनिदेव
शनि देव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं. यदि कुंडली में शनि देव पीड़ित या नीच राशि में हों, या व्यक्ति पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का नकारात्मक प्रभाव चल रहा हो, तो व्यापार ठप हो जाता है और नौकरी में स्थिरता नहीं रहती, जिससे गरीबी बढ़ती है.
भाग्य और धन का कारक है देवगुरु बृहस्पति (गुरु)
गुरु को धन, समृद्धि और भाग्य का स्वामी माना जाता है. यदि कुंडली में गुरु कमजोर, नीच के या ‘गुरु चंडाल दोष’ (राहु के साथ) से पीड़ित हों, तो व्यक्ति की बुद्धि सही निर्णय नहीं ले पाती, और जमा पूंजी भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है.
सुख-सुविधा का कारक है शुक्र
- शुक्र ग्रह भौतिक सुख, ऐश्वर्या और विलासिता का कारक है. यदि शुक्र कमजोर हो, तो व्यक्ति के पास पैसे होते हुए भी वह दरिद्रता का जीवन जीने को मजबूर होता है.
- कुंडली के प्रभावित होने वाले मुख्य भाव
- दूसरा भाव इसे धन भाव कहते हैं. इस पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि होने से बैंक बैलेंस खत्म होता है.
- छठा भाव यह कर्ज का भाव है. इसके सक्रिय होने पर व्यक्ति कर्ज के बोझ तले दब जाता है.
- बारहवां भाव खर्च और हानि का भाव है. इस भाव में पापी ग्रहों के होने से आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया हो जाता है.
इन परेशानियों से मुक्ति के कुछ सरल ज्योतिषीय उपाय
- शनिवार के दिन सरसों के तेल का दीपक जलाएं और गरीब या जरूरतमंद लोगों को काली उड़द, काले कपड़े या चप्पल का दान करें.
- प्रतिदिन या हर शुक्रवार को मां लक्ष्मी के सामने श्री सूक्त का पाठ करें.
- प्रतिदिन सुबह पक्षियों को दाना डालें और गाय को पहली रोटी (गुड़ के साथ) खिलाएं. इससे राहु-केतु का दोष शांत होता है.
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