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आध्यात्मिक धर्म स्थलों पर गुरुपूर्णिमा महोत्सव की धूम

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Last updated: 03/04/2026 10:24 PM
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जबलपुर के प्रसिद्ध मठ-मंदिरों में शिष्य मंडल द्वारा की जाएगी पूजा-अर्चना, ये हैं शहर के प्रसिद्ध धर्म गुरु, गीताधाम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अवसर पर मनाया गया श्रीकृष्ण जन्मोत्सव

Source : DB News Update  

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जबलपुर के प्रसिद्ध मठ-मंदिरों में शिष्य मंडल द्वारा की जाएगी पूजा-अर्चना, ये हैं शहर के प्रसिद्ध धर्म गुरु, गीताधाम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अवसर पर मनाया गया श्रीकृष्ण जन्मोत्सवये हैं जबलपुर के प्रसिद्ध धर्म स्थल और उसके धर्म गुरुगीताधाम-नरसिंह मंदिरगुरुपूजन का समयकालीधाम भटौलीसाकेतधाम गौरीघाटबंगलामुखी मंदिर, मढ़ातालगुरु का महत्वगुरुपूर्णिमा मनाने की परंपरागुरु–शिष्य परंपरा का सम्मानआज के समय में कैसे मनाते हैं?

By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी

Importance of Guru : मध्य प्रदेश जबलपुर के प्रसिद्ध धर्म स्थलों पर धूम-धाम से गुरुपूर्णिमा महोत्सव मनाया जाएगा. यहां के मठ-मंदिरों में आकर्षक साज-सज्जा की गई है और इन्हीं मंदिरों के धर्माचार्यों का गुरुपूजन किया जाएगा. जबलपुर के मठ-मंदिरों से जुड़े भक्तों का तांता लगा हुआ है. दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु-भक्त यहां पहुंचे हैं. अनेक मंदिरों में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भी हुआ है, जिसमें श्रद्धालु-भक्तजनों ने हिस्सा लिया है.

ये हैं जबलपुर के प्रसिद्ध धर्म स्थल और उसके धर्म गुरु

गीताधाम-नरसिंह मंदिर


जबलपुर का प्रसिद्ध धर्म स्थलों में से नरसिंह मंदिर शास्त्री ब्रिज गोरखपुर और गौरीघाट का गीताधाम आश्रम प्रसिद्ध हैं. इस धर्म स्थल से बड़ी संख्या में देश-विदेश के भक्त जुड़े हुए हैं और यहां कई दिनों से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर रहे हैं. इस धर्म स्थल के श्रीमहंत रामरंगी द्वाराचार्य जगद्गुरु डॉ. स्वामी नरसिंहदेवाचार्य जी महाराज हैं, जिनका पूजन अर्चन सुबह से प्रारंभ हो जाएगा, जो देर रात्रि तक चलेगा.

गुरुपूजन का समय

श्रीनरसिंह मंदिर शास्त्री ब्रिज में सुबह साकेतवासी महामण्डलेश्वर स्वामी रामचन्द्रदास जी महाराज और साकेतवासी जगद्गुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज का पादुका पूजन किया जाएगा. तत्पश्चात सुबह 10 बजे से 12 बजे तक नरसिंह मंदिर में जगद्गुरु डॉ. स्वामीनरसिंहदेवाचार्य जी महाराज रहेंगे. उसके बाद गीताधाम गौरीघाट में गुरुपूजन प्रारंभ होगा. जो देर रात्रि तक चलता रहेगा.

कालीधाम भटौली

नर्मदा तट कालीघाट में स्थित कालीधाम आश्रम जबलपुर का प्रसिद्ध स्थल है, जिसके महंत दण्डी स्वामी कालिकानंद जी महाराज हैं, उनके उत्तराधिकारी महामण्डलेश्चर स्वामी राधे चैतन्य महाराज हैं. इस मंदिर से जुड़े भक्त सुबह से गुरुपूजन आश्रम कालीधाम में करेंगें.

साकेतधाम गौरीघाट

गौरीघाट के निकट नवनिर्मित साकेतधाम की स्थापना हुई है, जिसके महंत स्वामी गिरीशानंद जी महाराज हैं. इस मंदिर से जुड़े भक्तों द्वारा गुरुपूजन सुबह से प्रारंभ हो जाएगा.

बंगलामुखी मंदिर, मढ़ाताल

शहर के मध्य मढ़ाताल में जगद्गुरु शंकराचार्य साकेतवासी स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज द्वारा स्थापित बंगलामुखी मंदिर है, जिसके पुजारी स्वामी चैतन्यानंद जी महाराज हैं. उनके द्वारा गोलोकवासी स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज का पादुकापूजन किया जाएगा और जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी महाराज व जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज का पादुका पूजन मंदिर प्रांगण में किया जाएगा.

गुरु का महत्व

प्राचीन कालीन सभ्यता से लेकर आधुनिक तौर पर व्यक्ति और समाज के निर्माण में गुरुओं की अहम भूमिका रही है. संत कबीर दास ने भी अपने दोहे के माध्यम से गुरु की भूमिका और महत्व को दर्शाया है, जोकि इस प्रकार है-

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु अपने, गोविंद दियो बताए।।

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।

गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय॥

कबीर हरि के रूठते, गुरु के शरण जाय।
कहे कबीर गुरु रूठते, हरि नहीं होत सहाय।।

गुरुपूर्णिमा मनाने की परंपरा

गुरुपूर्णिमा मनाने की परंपरा भारत की प्राचीन गुरु–शिष्य परंपरा से जुड़ी हुई है. इसका इतिहास धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से बहुत गहरा है. ऐसी मान्यता है कि गुरुपूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था. उन्होंने वेदों का विभाजन किया और महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की. इसलिए इस दिन को “व्यास पूर्णिमा” भी कहा जाता है और उन्हें आदिगुरु (पहले गुरु) के रूप में सम्मान दिया जाता है.

गुरु–शिष्य परंपरा का सम्मान

प्राचीन भारत में शिक्षा गुरु के आश्रम (गुरुकुल) में दी जाती थी. शिष्य अपने गुरु को ज्ञान देने के लिए अत्यंत सम्मान देते थे. गुरुपूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति आभार व्यक्त करते थे—यही परंपरा आज तक चल रही है. वहीं बौद्ध धर्म में गौतम बुद्ध ने अपने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला उपदेश इसी दिन सारनाथ में दिया था. इसे “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है, इसलिए बौद्ध धर्म में भी यह दिन विशेष है. जैन परंपरा के अनुसार, भगवान महावीर ने इस दिन अपने प्रथम शिष्य को दीक्षा दी थी, जिससे गुरु-शिष्य संबंध की शुरुआत मानी जाती है.

आज के समय में कैसे मनाते हैं?

धर्मिक लोग उपदेश और धर्म का मार्ग बताने वाले अपने गुरु का पूजन करते हैं, शिक्षक या मेंटर का सम्मान करते हैं. पूजा, ध्यान और सत्संग करते हैं. कुछ लोग आध्यात्मिक साधना या सेवा कार्य भी करते हैं.

गुरुपूर्णिमा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि ज्ञान, मार्गदर्शन और कृतज्ञता का प्रतीक है. यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में गुरु का स्थान कितना महत्वपूर्ण है—क्योंकि वही हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं.

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