सावन में अधिकतर घरों में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा होती है, क्योंकि इसका फल दोगुना मिलता है. हालांकि इसके विशेष नियम है वो भी जान लें.
Source : DB News Update
By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Sawan Parthiv Shivling Puja: सनातन धर्म में शिवपूजन का विशेष महत्व बताया गया है. शास्त्रों में शिव की महिमा का और उनके चमत्कार के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है. जैसा कि शिवपुराण में वर्णित है कि पार्थिव शिवलिंग की पूजा प्राचीन काल से ही प्रचलित है. सावन के महीनें में घर या मंदिर में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा और रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व है. मान्यता है कि इसके प्रभाव से घर में खुशहाली आती है साथ ही धन, सुख, समृद्धि का आगमन होता है. सावन में पार्थिव शिवलिंग की पूजा के कुछ नियम हैं, इनका पालन न करने वाले पुण्य की जगह पाप के भागी बनते हैं.
किसने की सबसे पहला पार्थिव शिवलिंग पूजा ?
कलयुग की शुरुआत में पार्थिव शिवलिंग का पूजन कूष्माण्ड ऋषि के पुत्र मंडप ने प्रारम्भ किया था. ये भी माना जाता है कि भगवान राम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले रावण पर विजय प्राप्ति के लिए पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा की थी.
पार्थिव शिवलिंग बनाने के नियम
- ये शिवलिंग नदी, तालाब या घर में स्वच्छ गमले की मिट्टी से बनाते हैं. इसके अलावा किसी मिट्टी का उपयोग न करें.
- पिंड निर्माण से पहले मिट्टी को अच्छे पानी से धो लें.
- मिट्टी, गाय का गोबर, गुड़ , मक्खन और भस्म मिलाकर पार्थिव शिवलिंग बनाएं.
- इसके निर्णाण में इस बात का ध्यान रखें कि ये 12 अंगुल यानी अंगूठे से ऊंचा नहीं होना चाहिए.
- इस मिट्टी का पिंड बनाते समय कई लोग उसमें घी भी मिलाते हैं जो शुभ माना गया है. शिवलिंग बनाते समय ‘ऊँ नमो हराय’ मंत्र का जाप करें.
- ध्यान रहे कि पार्थिव शिवलिंग पर चढ़ाया भोग ग्रहण नहीं किया जाता है. ये भोग शिव के गणों का होता है. इसे आप गाय को खिला सकते हैं.
मिट्टी का चयन और निर्माण नियम
पवित्र मिट्टी: मिट्टी किसी पवित्र नदी, तालाब, बेलपत्र के वृक्ष की जड़ या साफ-सुथरे स्थान की होनी चाहिए। इसमें गंगाजल मिलाकर गूंथें.
दिशा: शिवलिंग का निर्माण करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए.
अंगूठे के बराबर आकार: पार्थिव शिवलिंग का आकार अंगूठे के आकार से बड़ा नहीं होना चाहिए (अधिकतम 12 अंगुल से छोटा).
तत्काल पूजन: इसे बनाकर अधिक समय तक नहीं रखना चाहिए, निर्माण के तुरंत बाद ही पूजन करना उत्तम माना जाता है.
पूजन विधि और नियम
दिशा और पीठ: पूजन के समय उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें। जलधारी (जलाधारी) का रुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए.
अभिषेक: शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें.
पसंदीदा सामग्रियां: भगवान शिव को बेलपत्र, भांग, धतूरा, शमी के पत्ते, सफेद फूल और भस्म अर्पित करें. ध्यान रखें कि बेलपत्र का चिकना हिस्सा शिवलिंग की तरफ हो और पत्ता कटा-फटा न हो.
वर्जित वस्तुएं: पार्थिव शिवलिंग पर रोली (कुमकुम), हल्दी, केतकी का फूल और तुलसी पत्र कभी न चढ़ाएं। केवल चंदन का लेप करें.
विसर्जन के नियम
पार्थिव शिवलिंग की पूजा का नियम है कि इसका विसर्जन उसी दिन सूर्यास्त से पहले अनिवार्य रूप से कर दिया जाए.
इसे किसी बहती नदी, तालाब या बेलपत्र के पेड़ की जड़ में स्वच्छ जल डालकर विसर्जित कर दें.
विसर्जन से पहले आरती अवश्य करें और पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा याचना करें.
पार्थिव शिवलिंग पूजा विधि
- सावन में पार्थिव शिवलिंग पूजा के लिए प्रदोष काल का समय शुभ होता है.
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह रखकर शिवलिंग बनाना चाहिए.
- शिवलिंग बनाने के बाद गणेश जी, विष्णु भगवान, नवग्रह और माता पार्वती आदि का आह्वान करना चाहिए
- ऊं नम: शिवाय मंत्र जाप करते हुए शिवलिंग पर जल और पंचृामत अर्पित करें.
- गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाएं. शिव चालीसा का पाठ करें
- आरती और पुष्पांजलि के बाद भगवान से उनके स्थान पर जाने का निवेदन करना चाहिए.
- इस प्रकार पूजा के बाद शिवलिंग का आदरपूर्वक जल में विसर्जित कर देना चाहिए.
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