सावन के महीने में झूला झूलने की परंपरा न सिर्फ धार्मिक महत्व रखती है बल्कि पति-पत्नी के प्रेम और पारिवारिक सामंजस्य को भी मजबूत बनाती है.
Source : DB News Update
By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Sawan ka Jhula : हिन्दू धर्म में सावन का महीना पवित्रता का प्रतीक है. सावन के महीने में न केवल वर्षा ऋतु के आगमन के आगाज को दर्शाता है, बल्कि यह भक्ति, आध्यात्मिक शक्ति और उत्सव मनाने के महीनें के रूप में भी जाना जाता है. श्रावण मास से ही हिंदुओं के सभी तीज-त्योहार शुरू हो जाते हैं और चारों तरफ भक्ति का माहौल निर्मित हो जाता है. सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है. इस पूरे महीने भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भक्तजन पूजा-अर्चना करने में मग्न रहते हैं और व्रत-कथा कराते हैं. सावन (श्रावण) का महीना प्रकृति के उत्सव, प्रेम और भक्ति का महीना माना जाता है, जिसमें झूला झूलना एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान है. इस दिन भक्तों को भी भगवान के प्रति श्रद्धा का भाव रखने के उद्देश्य से घर पर झूला महोत्सव मनाना चाहिए. जिससे भगवान श्रीकृष्ण और भोलेनाथ की कृपा प्राप्त हो सके.
सौन्दर्यता का प्रतीक है सावन
सावन का महीना एक ओर जहां भक्ति और उत्सव के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर यह महीना अपनी हरियाली, ठंडी हवाओं और झीलों में खिलते कमल के फूलों की महक से सुगंधित हो जाता है. इस महीने में प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम स्तर पर होता है. सावन के महीने में कुंवारी कन्याओं और सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने हाथों में मेहंदी लगाने ओर पेड़ों पर झूले डालने की भी परंपरा है. इस महीने विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार करती है.
भगवान शिव नें माता पार्वती को जुलाया था झूला
पौराणिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. सावन के महीने में ही शिव जी ने पार्वती जी को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था. भगवान भोलेनाथ ने माता पार्वती को झूला-झुलाया था. व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सावन के महीने में जब चारों ओर हरियाली होती है, उस समय हर व्यक्ति का मन अनायास ही प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो जाता है. इस प्रसन्न चित्त में अगर भगवान को याद किया जाए तो बिना प्रयास के ही ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है. इस पुनर्मिलन की खुशी में माता पार्वती ने अपनी सखियों के साथ मिलकर बागों में झूला झूला था. इसी कारण सावन में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए झूला झूलती हैं. कई शिव मंदिरों में इस दौरान शिव-पार्वती की मूर्तियों को झूले पर बैठाया जाता है.
राधा-रानी से जुड़ा है झूला-झूलने की परंपरा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह भी कहा जाता है सावन के महीने में भगवान कृष्ण ने राधा रानी को झूला-झुलाया था. ब्रज और वृंदावन में सावन के महीने में ‘झूलन उत्सव’ बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. माना जाता है कि द्वापर युग में सावन के सुहावने मौसम में भगवान श्रीकृष्ण, राधा रानी और अन्य गोपियों के साथ कदंब के पेड़ पर झूला डालकर झूलते थे और रास रचाते थे.
इसके बाद से लोगों ने सावन में झूला-झूलना प्रारंभ कर दिया. आपको बता दें कि सावन में झूला-झूलने से परिवार के सदस्यों में एकता बनी रहती है. पति-पत्नी के बीच प्यार बढ़ता है. वहीं झूला झूलने से दिमाग को भी शांति मिलती है. सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया (हरियाली तीज) से लेकर पूर्णिमा (रक्षाबंधन) तक सभी प्रमुख कृष्ण मंदिरों विशेषकर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी और राधा रानी को सोने-चांदी के भव्य झूलों में बैठाकर झुलाया जाता है.
झूला-झूलने के फायदे
- सावन माह में ये परंपरा पति-पत्नी के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ाने का प्रतीक मानी जाती है.
- जो पति अपनी पत्नी को सावन के महीने में झूला झुलाते हैं, उनका वैवाहिक जीवन प्यार से भर जाता है.
- मंदिर और घर पर अपने इष्ट देव को झूला-झुलाने के लिए झूला लगाए जाते हैं. मंदिर में विराजमान देवी-देवताओं को झूले में झुलाया जाता है.
Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
