महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने से पहले राजनीतिक बयानबाजी के बीच हमलावर हुए नेता. उद्धव ठाकरे ने कहा कि आज से मैं गृह मंत्री अमित शाह को अब्दाली ही बोलूंगा. अगर आप मुझे नकली संतान बोलोगे तो मैं तुम्हे अब्दाली बोलूंगा.
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By : डीबी न्यूज अपडेट| Edited By- सुप्रिया
Uddhav Thackeray Attack On Amit Shah:महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने गृह मंत्री अमित शाह पर हमला किया है और उन्होंने कहा है कि वो अहमद शाह अब्दाली के राजनीतिक वंशज हैं.
महाराष्ट्र के पुणे में शनिवार (03 अगस्त) को एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज से मैं अमित शाह को अब्दाली ही बोलूंगा. अगर आप मुझे नकली संतान बोलोगे तो मैं तुम्हे अब्दाली बोलूंगा.
नितिश और चन्द्रबाबू को लेकर हिन्दुत्व वादी मुद्दे पर सवाल पूछा
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख ने आगे कहा, “नीतीश कुमार, चंद्र बाबू नायडू हिंदुत्व वादी व्यक्ति हैं क्या? अमित शाह बताएं उनका हिंदुत्व कैसा है? अब्दाली का वंशज पुणे में आकर बोल के गया. अमित शाह को संघ का हिंदुत्व मान्य है क्या? बीजेपी ने सत्ता जिहाद शुरू किया है.
सत्ता जिहाद का मतलब सरकार बनाने के लिए इंसान चुराया जाता है, उसे सत्ता जिहाद कहते हैं. छत्रपति शिवाजी महाराज ने हमे दूसरों का घर जलना नहीं सिखाया है. शंकराचार्य ने कहा था कि विश्वासघात करने वाले हिन्दू नहीं. तुमने विश्वासघात किया है.”
देवेंद्र फडणवीस को भी लिया निशाने पर
महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर प्रहार करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा, “मैं किसी बग को चुनौती नहीं देता आपके पास इसके लिए क्षमता नहीं है. या तो आप रहेंगे, या मैं रहूंगा. कुछ लोगों को लगा कि मैं उन्हें चुनौती दे रहा हूं. मैं किसी बग को चुनौती नहीं देता. मैं एक सुसंस्कृत महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता हूं, जबकि आप महाराष्ट्र और पार्टी को लूटने वालों का प्रतिनिधित्व करते हैं. बग को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए उन्हें अंगूठे से कुचल दिया जाना चाहिए.”
‘फडणवीस में चुनौती देने की क्षमता नहीं’
ठाकरे ने फडणवीस के दावों को खारिज करते हुए अपना तीखा हमला जारी रखा. उन्होंने कहा, “आपने कहा कि मेरे साथ खिलवाड़ मत करो. आपके पास इतनी क्षमता नहीं है कि हम आपके साथ खिलवाड़ कर सकें.” ठाकरे ने कहा, “जो लोग विनाश करते हैं, वे सत्ता में नहीं रह सकते. इसलिए मैं कहता हूं कि या तो आप रहेंगे या मैं रहूंगा.”
अब्दाली अफगानिस्तान का हीरो
नादिरशाह की सेना में अहमद शाह अब्दाली की भर्ती एक सिपाही के तौर पर हुई थी. अपनी युद्ध कला कौशल के दम पर वह बहुत कम समय में ही हाई कमान की नजरों में आ गया. नादिरशाह ने खुश होकर उसे सेना का मुख्य नायक बना दिया. मुगलों को घुटनों पर लाने वाले नादिरशाह की साल 1748 में जब मौत हो गई, तो सभी लोगों ने अब्दाली को अफगानिस्तान का शासक चुना.
अहमद शाह की काबिलियत देखकर एक सूफी संत ने उसे दुर-ए-दुर्रान खिताब से नवाजा था, जिसका मतलब होता है मोतियों का मोती. इसी के बाद उसके कबीले को दुर्रानी और उसे अहमद शाह दुर्रानी कहा जाने लगा. भारतीय इतिहासकार गंडा सिंह अहमद शाह दुर्रानी: आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के निर्माता में लिखते हैं कि अहमद शाह सिर से लेकर पैर का विशुद्ध अफगान था, जिसने अपनी जिंदगी मुल्क को बेहतर बनाने में लगा दी थी.
अहमद शाह ने गद्दी संभालने के बाद अफगान कबीलों के बीच आपसी रंजिशों को दूर किया और उनको एकजुट करने का काम किया. इस तरह उसने आधुनिक अफगान देश की नींव रखी. मुल्क को बेहतर बनाने के उसके योगदान के कारण आज भी अफगान के लोगों के लिए वो किसी भगवान से कम नहीं है. वहां के लोग उसे अहमद शाह बाबा और अहमद शाह महान भी बुलाते हैं.
अफगान सम्राट का मराठों से क्या कनेक्शन?
अहमद शाह अब्दाली के विशाल साम्राज्य का दायरा पश्चिम में ईरान से लेकर पूरब में हिंदुस्तान के सरहिंद तक था. उस दौर में हिन्दुस्तान पर मुगल साम्राज्य की पकड़ कमजोर हो चुकी थी. वहीं, मराठा साम्राज्य लगातार युद्ध जीतकर बेहद महत्वाकांक्षी हो रहा था. उनके विस्तार से अहमद शाह अब्दाली को अपनी सल्तनत के लिए खतरा महसूस हो रहा था.
एक तरफ मराठा और दूसरी तरफ अब्दाली, दोनों ही अपनी बादशाहत का दायरा बढ़ाने में जुटे थे और ज्यादा से ज्यादा इलाके को अपनी सल्तनत का हिस्सा बनाना चाहते थे. इसी दौरान दोनों शक्तियों के बीच जनवरी 1761 में निर्णायक युद्ध लड़ा गया. दिल्ली के पास पानीपत के मैदान में हुई लड़ाई, एक सेनापति और बादशाह के तौर पर अहमद शाह अब्दाली की जिंदगी की सबसे बड़ी जंग थी.
पानीपत की तीसरी लड़ाई का क्या नतीज रहा?
पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठा क्षत्रपों और अफगान सेना के बीच हुई थी. अफगान सेना की कमान अहमद शाह अब्दाली-दुर्रानी के हाथों में थी. वहीं, सदाशिवराव भाऊ मराठा सेना के सेनानायक थे. हालांकि इस जंग में अफगानों की जीत हुई लेकिन दोनों ही ख़ेमों के हजारों लोग जंग में मारे गए. बताया जाता है कि जंग में इतना खून बहा कि वहां की मिट्टी पूरी तरह लाल हो गई थी.
यह हार इतिहास में मराठों की सबसे बुरी हार थी. पानीपत की लड़ाई में मराठों को बुरी तरह से हराने के बाद अहमद शाह अब्दाली चाहता तो हिंदुस्तान में ही रुककर दिल्ली से पूरे देश पर राज कर सकता था. लेकिन उसे अपने मुल्क से काफी लगाव था. उसने कंधार वापस जाना बेहतर समझा ताकि अपनी सल्तनत की सरहदों की हिफाजत कर सके.
भले ही अहमद शाह अब्दाली वापस चला गया हो, लेकिन मराठों को कमजोर करने की वजह से एक नई शक्ति को जन्म हुआ. पानीपत की तीसरी लड़ाई ने भारत में अग्रेजों को अपना दायरा बढ़ाने का रास्ता आसान कर दिया.
