रीवा जिले में राजा मार्तण्ड सिंह जंगल सफारी को शामिल कराने की कवायद पर संग्राम, भाजपा-कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों ने डिप्टी सीएम पर साधा निशाना
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By : प्रिंस अवस्थी
White Tiger Safari : 1951 में रीवा के राजा मार्तण्ड सिंह ने जंगल में सफेद रंग के बाघ को देखा, जिसकी नीली आंखें थीं, उससे राजा मोहित हो गए. उसकी उम्र कम थी. उन्होंने सीधी के बरगड़ी के जंगल से इसे पकड़ा. उसे गोविंदगढ़ के किले में आश्रय दिया गया. राजा ने उसका नाम मोहन रखा. समय ने ऐसी करवट बदला कि रीवा वाइट टाइगर की पहचान खो दिया. 2016 में गोविंदगढ़ इलाके में मुकुंदपुर स्थित व्हाइट टाइगर सफारी का निर्माण हुआ और इसका नाम महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव व्हाइट टाइगर सफारी रख दिया गया. यह क्षेत्र सतना संसदीय क्षेत्र के मैहर जिला में आता है. लेकिन अभी हाल ही में मध्यप्रदेश प्रशासनिक इकाई पुनर्गठन आयोग ने अमरपाटन तहसील के ग्राम आनंदगढ़, आमिन, धोबहट, मुकुन्दपुर, परसिया एवं पपरा को मैहर जिले से पृथक करने का पत्राचार किया है और इन 5 गांवों को रीवा जिले में सम्मिलित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. ऐसा होने पर मैहर जिले की पहचान मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी भी रीवा जिले में समाहित हो जाएगी. इस पत्राचार का जमकर विरोध शुरू हो गया है. सांसद गणेश सिंह, अमरपाटन के विधायक राजेंद्र कुमार सिंह, पूर्व विधायक रामखेलावन पटेल और मैहर के पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी ने इस पर सख्त आपत्ति जताई है.
ये है पूरा मामला
मध्यप्रदेश प्रशासनिक इकाई पुनर्गठन आयोग को विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी मुख्यमंत्री कार्यालय से एक पत्र 27 जनवरी 2025 को मिला. उसमें ग्राम पंचायत आनंदगढ़, आमिन, धोबहट, मुकुंदपुर, परसिया एवं पपरा को मैहर जिले से पृथक कर रीवा में सम्मिलित करने सरपंचों द्वारा दिया गया आवेदन शामिल है. इसे आधार बनाते हुए आयोग के सचिव अक्षय कुमार सिंह ने कलेक्टर रीवा और मैहर को पत्र लिख इस प्रस्ताव पर अभिमत प्रस्तुत करने को कहा है. आयोग सचिव ने एक और पत्र सिर्फ मैहर कलेक्टर को दिया है, जिसमें मुकुंदपुर ग्राम पंचायत को परिसीमन की दशा में जिला रीवा में सम्मिलित न करने और मैहर जिले में ही रखे जाने का ग्राम सभा का प्रस्ताव होता है. इस पर कलेक्टर मैहर से अभिमत मांगा जाता है. जानकारों का कहना है कि अगर मैहर कलेक्टर द्वारा अभिमत नकारात्मक दिया जाता और कलेक्टर रीवा द्वारा सकारात्मक अभिमत दिया जाता है तो आयोग के समक्ष अपने विवेक से निर्णय करने का अधिकार होगा.
1969 हो गया था मोहन का निधन
वाइट टाइगर सफारी में उल्लेख मिलता है कि सफेद बाघ मोहन की तीन रानियां (बाघिन) थीं. धीरे-धीरे उनका कुनबा बढ़ता गया. संख्या बढ़कर 34 हो गई. इनमें से 21 शावक सफेद थे. 1969 को मोहन का निधन हो गया. मोहन को पूरे सम्मान के साथ गोविंदगढ़ किले के बगीचे में दफनाया गया, जहां खेलकर वह बड़ा हुआ था. मोहन की याद में उसी स्थान पर समाधि बनाई गई. इतिहासकारों के मुताबिक, किले में मोहन की खिदमत ठीक वैसे ही होती थी, जैसे किसी राजा की होती थी. सभी उसे मोहन सिंह कहकर पुकारते थे. वह रविवार को खाना नहीं खाता था, भले ही उसे राजा मार्तण्ड सिंह जूदेव ही क्यों न खिलाएं. रविवार को मोहन केवल दूध पीता था. जानकार बताते हैं कि मोहन फुटबॉल खेलने का बड़ा शौकीन था.
इतिहासकारों की मानें तो डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ने सफेद बाघ की घर वापसी के लिए जोर लगाया और साल 2016 में एक बार फिर विंध्या नाम की सफेद बाघिन की विंध्य की धरती पर वापसी हुई.
सफेद बाघ की एक झलक पाने पर्यटक करते हैं घंटों इंतजार
रीवा, सतना और मैहर में पर्यटकों की भारी भीड़ देखने को मिलती है. रीवा संभाग का व्हाइट टाइगर सफारी बारिश के दिनों में हरी-भरी वादियों से ढका रहता है, जिसकी खूबसूरती देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक मुकुंदपुर टाइगर सफारी करने आते हैं. मानसून की बारिश में सफेद बाघ की एक झलक पाने के पर्यटक घंटों इंतजार करते हैं.
मैहर जिले में है मुकुंदपुर
रीवा के राजा महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव के नाम से व्हाइट टाइगर सफारी का नाम रखा गया है, जहां दूर-दूर से पर्यटक सफेद बाघ का दीदार करने के लिए आते हैं. रीवा जिला मुख्यालय से दूर मैहर जिले के अंतर्गत मुकुंदपुर आता है. हलांकि रीवा से तमरा गांव होकर सड़क मार्ग से 15 किमी दूरी तय करने के बाद मुकुंदपुर पहुंचा जा सकता है. चोरहटा और निपनिया मार्ग से भी मुकुंदपुर के लिए भी सड़क है.
घूमने के लिए मात्र 20 रुपये की एंट्री फीस
मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी में कई वन्य प्राणियों के दीदार होते हैं. साथ में जंगल घूमने में भी भरपूर मजा मिलता है. व्हाइट टाइगर सफारी में घूमने के लिए मात्र 20 रुपये की एंट्री फीस है. यदि आप पैदल नहीं बल्कि बैटरी वाली गाड़ी से जंगल सफारी का आनंद लेना चाहते हैं, तो उसके लिए 50 रुपये देने होते हैं.
दुर्लभ सफेद बाघ देखने के लिए लगते हैं 120 रुपये
सफेद बाघ दुर्लभ है. इसका दीदार करने के लिए जंगल में काफी अंदर तक जाना पड़ता है. इसके लिए जू प्रबंधन द्वारा बसें चलाई जाती हैं. जंगल के अंदर बस से घूमने के लिए 120 रुपये देने पड़ते हैं. बताया जाता है कि सफेद बाघ को 1951 में रीवा के राजा मार्तण्ड सिंह ने जंगल में देखा था, जिसकी नीली आंखें थीं, तो वह इस पर मोहित हो गए. उसकी उम्र कम थी. उन्होंने सीधी के बरगड़ी के जंगल से इसे पकड़ा. उसे गोविंदगढ़ के किले में रखा गया. राजा ने उसका नाम मोहन रखा.
