हिंदू धर्म में जब कभी भी किसी की मृत्यु होती है, तो उसका दाह संस्कार हमेशा सूर्यास्त से पहले ही किया जाता है. लेकिन सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने की मनाही क्यों होती है?
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By : डीबी न्यूज अपडेट | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Antim Sanskar: हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक सारे नियम, धर्म और समय निश्चित किए गए हैं. इसके लिए धर्म शास्त्रों में विशेष अवसर पर सुनने और उन नियमों को मानने का कारण बताया गया है. जैसे किसी व्यक्ति के मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण सुनने का विशेष महत्व बताया गया है. परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद गरुण पुराण की कथा परिजनों को सुनाई जाती है. हमारे व्यक्तिगत जीवन में कई लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें हम काफी प्रेम करते हैं. लेकिन जैसे ही उनकी मृत्यु होती है, हमें काफी दु:ख पहुंचता है, बावजूद इसके हम उनका अंतिम संस्कार करते हैं.
गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार को लेकर कई तरह की बातों का जिक्र किया गया है. जिसका पालन करना बेहद जरूरी होता है. गरुड़ पुराण के मुताबिक हिंदू धर्म में कभी भी सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्रिया को नहीं किया जाता है. आइए जानते हैं इसके पीछे की वजह क्या है?
रात के समय क्यों नहीं होता अंतिम संस्कार?
सनातन धर्म से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम संस्कार कभी भी रात के समय नहीं किया जाता है. दरअसल हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक के 16 संस्कारों का जिक्र किया गया है. जहां शव को विधि विधान से जलाया जाता है. माना जाता है कि, सूर्यास्त के बाद स्वर्ग के दरवाजे बंद हो जाते हैं और नर्क के द्वार खुल जाते हैं. ऐसे में मृत आत्मा को नर्क जाना पड़ सकता है.
धार्मिक और आध्यात्मिक कारण (Scriptural Reasons)
सूर्य देव की साक्ष्यता
हिंदू धर्म में सूर्य को जीवन, चेतना और आत्मा का कारक माना गया है. ऐसी मान्यता है कि जीव की आत्मा सूर्य से ही प्रकट होती है और अंत में उसी में विलीन होती है. इसलिए, सूर्य की उपस्थिति (दिन के उजाले) में ही दाह संस्कार करना शास्त्रसम्मत है.
स्वर्ग और नर्क के द्वार की मान्यता
रुड़ पुराण के अनुसार, सूर्यास्त के बाद स्वर्ग के द्वार बंद हो जाते हैं और नर्क के द्वार खुल जाते हैं. माना जाता है कि रात में अंतिम संस्कार करने से जीवात्मा को परलोक के मार्ग में भारी कष्ट उठाने पड़ते हैं और उसे मोक्ष नहीं मिलता है.
अगले जन्म में अंग दोष का भय
शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि यदि किसी का अंतिम संस्कार रात के अंधेरे में किया जाए, तो उस आत्मा को अगले जन्म में शारीरिक या मानसिक दोष (विकलांगता) का सामना करना पड़ सकता है.
आसुरी शक्तियों का प्रभाव
रात के समय नकारात्मक और आसुरी शक्तियां (पिशाच, आदि) अधिक सक्रिय हो जाती हैं. माना जाता है कि ये शक्तियां मृत आत्मा के मार्ग में बाधा डाल सकती हैं.
व्यावहारिक और सामाजिक कारण (Practical Reasons)
प्रकाश की कमी
रात के समय में आज की तरह बिजली की व्यवस्था नहीं थी. रात के अंधेरे में श्मशान घाट पर चिता को सही ढंग से सजाना और शव का पूर्ण रूप से भस्म होना सुनिश्चित करना बहुत कठिन होता था. शास्त्रों में अधजला शव छोड़ना घोर पाप माना गया है.
जंगली जानवरों का खतरा
श्मशान घाट अक्सर बस्तियों से दूर सुनसान इलाकों या जंगलों के पास होते थे. रात के समय वहां जाने पर जंगली जानवरों या हिंसक जीवों का खतरा हमेशा बना रहता था.
सम्बन्धियों का एकत्रित होना
किसी की अंतिम विदाई में पूरे समाज और रिश्तेदारों का शामिल होना जरूरी माना जाता है. पुराने समय में रात के वक्त लोगों को संदेश भेजना और उनका एक जगह इकट्ठा होना मुमकिन नहीं होता था.
मुखाग्रि देने का अधिकार स्त्री को क्यों नहीं?
- मान्यता ये भी है कि जबतक शव का अंतिम संस्कार न हो जाए आत्मा शव के आसपास ही भटकती रहती है. इसके अलावा रात के समय अंतिम संस्कार करने से अगले जन्म में व्यक्ति के अंग में किसी भी तरह का दोष हो सकता है.
- देर शाम या रात होने पर सूर्योदय के बाद ही व्यक्ति का अंतिम संस्कार किया जाता है.
- गरुड़ पुराण के मुताबिक किसी स्त्री को मुखाग्नि देने का अधिकार नहीं होता है. किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसको मुखाग्नि उसका बेटा, भतीजा, पति या पिता ही दे सकता है.
- स्त्रियों को मुखाग्नि देने का अधिकार इसलिए नहीं है, क्योंकि स्त्री पराया धन होती है और वंशवृद्धि के जिम्मा पुत्र पर ही होता है, इसलिए स्त्री मुखाग्नि नहीं दे सकती है.
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