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Religion

भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद भी शुभ क्यों है चातुर्मास? जानें वजह…

DB News
Last updated: 05/07/2026 11:38 PM
DB News
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7 Min Read
चातुर्मास प्रारंभ हो रहे हैं, भगवान शिव करेंगे देखरेख
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चातुर्मास के 4 माह सावन, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक माह पर नहीं होंगे मांगलिक कार्यक्रम, 25 जुलाई से हो रहे प्रारंभ, लेकिन 12 जुलाई से ही बंद हो जाएंगे मांगलिक कार्यक्रम!

Source : DB News Update

Contents
चातुर्मास के 4 माह सावन, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक माह पर नहीं होंगे मांगलिक कार्यक्रम, 25 जुलाई से हो रहे प्रारंभ, लेकिन 12 जुलाई से ही बंद हो जाएंगे मांगलिक कार्यक्रम!12 जुलाई से बंद हो रहे हैं मांगलिक कार्यक्रमचातुर्मास में जप, तप और दान के लिए क्यों रखता है महत्व?विवाह, मुण्डन जैसे शुभ कार्यक्रमों में लग जाएगी पाबंदीक्यों नहीं होते मांगलिक कार्यक्रम?चातुर्मास में क्या करें?चातुर्मास में क्या नहीं करना चाहिए?

Written By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Chaturmas 2026: चातुर्मास के 4 माह सावन, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक माह में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसके कारण मांगलिक कार्यक्रमों में पाबंदी लग जाती है. ऐसी मान्यता है कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी तक कोई भी शुभ कार्य नहीं होते हैं. 2026 में यह शुभ तिथि 25 जुलाई दिन शुक्रवार से प्रारंभ हो रही है. इसी दिन देवशयनी एकादशी है और चातुर्मास प्रारंभ हो जाएंगे. भगवान विष्णु क्षीर सागर में 4 महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाएंगे. इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को, जिसे देवउठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, इस दिन श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा से वापस आएंगे. चातुर्मास की इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नए मकान-प्रतिष्ठान का उद्घाटन ऐसे अन्य शुभ मांगलिक कार्य नहीं होंगे. लेकिन इन्हीं दिनों भगवान की आराधना, साधना और भक्ति के लिए चातुर्मास के 4 माह शुभ माने गए हैं. इसके पीछे प्रमुख वजह क्या है? कभी जानने का प्रयास नहीं किया गया है? यदि आप भी इससे अनभिज्ञ हैं तो हम बताने जा रहे हैं. आइए जानते हैं भगवान विष्णु के योगनिद्रा के समय जप, तप, दान और धर्म करने से पुण्य फलों की प्राप्ति क्यों होती है? और मांगलिक शुभ कार्य बंद रहते हैं.

12 जुलाई से बंद हो रहे हैं मांगलिक कार्यक्रम

अब सवाल यह उठता है कि जब चातुर्मास 25 जुलाई से आरंभ हो रहा है तो फिर 12 जुलाई से मांगलिक कार्यक्रमों में पाबंदी क्यों लग रही है? इस पर भ्रम पालने की आपको बिल्कुल भी जरूरत नहीं है. क्योंकि 12 जुलाई को इस सीजन का अंतिम पंचांगीय सावा समाप्त हो रहा है, जिसके कारण मांगलिक कार्यक्रम बंद हो जाएंगे. लेकिन चातुर्मास 25 जुलाई से ही प्रारंभ होगा.

चातुर्मास में जप, तप और दान के लिए क्यों रखता है महत्व?

ऐसी मान्यता है कि, चातुर्मास के 4 महीनें भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव देखने लगते हैं. वहीं जब श्रीहरि वापस योग निद्र से देवउठनी एकादशी के दिन आते हैं, तब फिर से सृष्टि की देखभाल करने लगते हैं. ऐसे में चातुर्मास के समय भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अच्छा मौका मिल जाता है. इन दिनों आत्मसंयम, जप, तप, दान और भगवान शिव की भक्ति के लिए अच्छा समय माना गया है. इन दिनों साधु-संत, तपस्वी, साधक एक स्थान पर रहकर धर्मोपदेश, सत्संग और साधना करते हैं. श्रद्धालु भी अपनी दिनचर्या में सात्विकता अपनाते हैं तथा धार्मिक अनुष्ठानों में अधिक समय देते हैं. माना जाता है कि चातुर्मास में किए गए पुण्य कर्मों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है.

विवाह, मुण्डन जैसे शुभ कार्यक्रमों में लग जाएगी पाबंदी

ज्योतिष गणना के अनुसार, जुलाई माह में 2, 3, 4, 9, 11 और 12 जुलाई तक विवाह के शुभ मुहूर्त हैं. वहीं आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को यानी 12 जुलाई की सुबह 11 बजकर 11 मिनट से बृहस्पति ग्रह का वार्धक्य (बुढ़ापा या वृद्धावस्था) आरंभ हो जाएगा. इसलिए 12 जुलाई के बाद से मांगलिक कार्यक्रम पर रोक लग जाएगी. इसके बाद 15 जुलाई को गुरु ग्रह शाम के 7 बजकर 27 मिनट पर पश्चिम दिशा में अस्त हो जाएंगे और 12 दिसंबर तक वक्री रहेंगे. इसके बाद 9 अगस्त को पूर्व दिशा में उदय होंगे. किसी भी शुभ व मांगलिक कार्य के लिए गुरु का उदय होना बहुत जरूर होता है. देवउठनी एकादशी से पुन: शुभ व मांगलिक कार्यक्रम प्रारंभ हो जाएंगे.

क्यों नहीं होते मांगलिक कार्यक्रम?

धार्मिक मान्यता है कि जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब वे सृष्टि के पालन से संबंधित शुभ कार्यों में प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं रहते. इसलिए विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ संस्कारों के लिए इस अवधि को उपयुक्त नहीं माना जाता है. देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही पुनः शुभ और मांगलिक कार्यों का आरंभ हो जाता है. धर्माचार्यों के अनुसार चातुर्मास केवल शुभ कार्यों पर विराम का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना और ईश्वर भक्ति के लिए अच्छा समय है. इस अवधि में किए गए जप, तप, व्रत और दान से आध्यात्मिक उन्नति के साथ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है.

चातुर्मास में क्या करें?

  • एकादशी, पूर्णिमा और अन्य प्रमुख व्रतों का श्रद्धापूर्वक पालन करें.
  • सात्विक भोजन करें तथा संयमित लाइफस्टाइल अपनाएं.
  • क्रोध, अहंकार और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का प्रयास करें.
  • भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें.
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का नियमित जप करें.
  • रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत, श्रीमद् भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें.
  • गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र एवं दक्षिणा का दान दें.

चातुर्मास में क्या नहीं करना चाहिए?

  • विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत, मुंडन और अन्य मांगलिक शुभ कार्य करने से बचना चाहिए.
  • तामसिक भोजन, मद्यपान और मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए.
  • झूठ, छल, अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए.
  • पेड़-पौधों या जीव-जंतुओं को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए.
  • धार्मिक नियमों की अनदेखी न करें और व्रत-उपवास में लापरवाही ना बरतें.

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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