मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित नरसिंह मंदिर शास्त्री ब्रिज में वैदिक परंपरा के अनुसार किया गया गोवर्धन पूजन, भगवान नृसिंह के सामने श्रीकृष्ण को परोसा गया छप्पन भोग
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By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
MP Jabalpur News : गोवर्धन पूजा के अवसर पर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में स्थित नरसिंह मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के गिरधारी स्वरूप का पूजन किया गया. इस अवसर पर जगद्गुरु डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और श्रीनृसिंह का पूजन किया और गिरधारी भगवान को छप्पन भोग का प्रसाद परोसा. तत्पश्चात सभी श्रद्धालुओं को छप्पन भोग के प्रसाद का वितरण सभी भक्तों को किया गया. बतादें कि गोवर्धन पूजन का महत्व महाभारत, श्रीमद्भागवत महापुरान और हरिवंश पुराण में मिलता है. जिसमें बतलाया गया है कि इंद्र देव को बड़े यज्ञ अनुष्ठान में दूध, दही, घी, छाछ और यहां तक की नई फसल का बहुत सा हिस्सा भी इंद्र यज्ञ में खर्च होता था. लोगों का जुड़ाव प्रकृति के प्रति कम था, तब श्रीकृष्ण ने इंद्र की इस पूजा का विरोध किया और सबको सलाह दी कि इसके स्थान पर नदी, ग्राम, गोधन, पशुधन, धरती माता, वृक्ष और इस पवित्र गोवर्धन पर्वत की पूजा करें. क्योंकि नदी का जल जीवन देता है. गोधन से ही जीवन यापन के लिए दूध-दही, घी मिलता है. पशुधन किसान के बराबर ही मेहनत करते हैं ताकि अनाज उगाया जा सके. धरती बीज उत्पादन कर अनाज देती है. वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं और गोवर्धन ब्रज क्षेत्र की सीमा बनकर सुरक्षा देता है. वर्षा होने में सहायक होता है.
क्यों करते हैं गोवर्धन पूजा?
दीपावली के एक दिन के बाद परवा यानी प्रथमा तिथि को गोवर्धन पूजा करने का विधान बतलाया गया है. पांच दिन की पर्व परंपरा में ये ऐसा पहला त्योहार है, जिसका वैदिक आधार तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसकी मान्यताएं सीधे पौराणिक कथाओं से जुड़ी हुई है. भगवान श्रीकृष्ण की कथाओं से स्पष्ट होता है कि अहंकार का मान मर्दन होना ही चाहिए. वह चाहे देव हों या फिर राक्षस. श्रीकृष्ण ने संतुलित जीवन जीने का संदेश दिया है.
एमपी सरकार भी गोवर्धन पूजन कराने पर दिया जोर
बतादें कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गोवर्धन पूजन को लेकर गौशालाओं में आयोजन किए हैं और गौ माता की पूजा करके यह संदेश देने की कोशिश की है कि गाय के प्रति सभी सद्भाव और प्रेम रखें और गौ पालन के प्रति दिलचस्पी दिखाएं.
गोवर्धन पूजा में क्या करना चाहिए?
- घर के आंगन या बाहर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक चित्र या आकृति बनाएं.
- फूल, घास और रंगों से सजाएं.
- गोवर्धन जी को दूध, दही, गंगाजल, रोली, अक्षत (चावल), फूल, धूप और दीपक अर्पित करें.
- भगवान को 56 प्रकार के भोग (छप्पन भोग) या अन्नकूट का प्रसाद अर्पित करें.
- अनाज, मिठाइयां और सात्विक पकवान शामिल होते हैं.
- पूजन के पश्चात गोवर्धन पर्वत की कम से कम 7 बार परिक्रमा (परदक्षिणा) करें.
- गाय और बछड़ों को स्नान कराएं, उन्हें रंगों व मोरपंख से सजाएं, और उन्हें हरा चारा या गौ ग्रास खिलाकर उनकी पूजा करें.
गोवर्धन पूजा के दौरान क्या न करें
इस दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा आदि का सेवन या घर में निर्माण बिल्कुल न करें. काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचें और पेड़-पौधों को न काटें और न ही तुलसी के पत्ते तोड़ें.
क्या है अन्नकूट प्रसाद?
‘अन्नकूट’ का शाब्दिक अर्थ है ‘अन्नों का समूह’ या पहाड़. इसमें विभिन्न प्रकार के व्यंजन, 56 भोग (छप्पन भोग), कढ़ी, चावल, और मौसमी अन्नकूट की सब्जी शामिल होती है. इस विशेष प्रसाद में गाजर, मटर, गोभी, पालक, मेथी, बैंगन और नए सीजन की कई हरी सब्जियों का उपयोग किया जाता है.
अन्नकूट का धार्मिक महत्व
द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने और इंद्र के अहंकार को चूर करने की घटना से यह परंपरा जुड़ी है. प्रकृति और अन्न के प्रति आभार प्रकट करने के लिए यह उत्सव मनाया जाता है. वहीं यदि वैज्ञानिक महत्व की बात करें तो बदलते मौसम में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और विभिन्न पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए मौसमी सब्जियों से बना यह भोजन बेहद गुणकारी माना गया है.
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