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DB News Update | Divya Bhumi News > Blog > Religion > शिव नवरात्रि पर भगवान महाकाल अलग-अलग स्वरूप में बनेंगे दूल्हा? जानिए धार्मिक महत्व
Religion

शिव नवरात्रि पर भगवान महाकाल अलग-अलग स्वरूप में बनेंगे दूल्हा? जानिए धार्मिक महत्व

DB News
Last updated: 18/04/2026 11:59 AM
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6 Min Read
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महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी से शिव नवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है. जानें क्या है परंपरा?

Source : DB News Update

Contents
महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी से शिव नवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है. जानें क्या है परंपरा?मणिपुर चक्र पर विराजित हैं महाकालमहाशिवरात्रि के बाद दिन में होती है भस्म आरतीअलग-अलग रूपों में तिथि के अनुसार श्रंगारग्वालियर के पंचांग की मान्यताकिस दिन किन रूपों में होता है शृंगारचंद्र दर्शन की दूज पर पंच मुखारविंद दर्शन

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Mahakal shivratri: मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के दरबार में शिव नवरात्रि पर्व मनाने की परंपरा है. महाशिवरात्रि के 9 दिन पहले से पर्व की शुरुआत होती है और भगवान महाकाल को अलग-अलग स्वरूप में दूल्हा बनाया जाता है. शिवनवरात्र के नौ दिन भगवान महाकाल का तिथि अनुसार शृंगार होता है. ऐसे में तिथि वृद्धि के कारण बढ़ी हुई तिथि पर भगवान का किस रूप में शृंगार करें, इसके लिए शुक्रवार को पुजारी पुरोहित की बैठक में निर्णय लिया जाता है. इसके पीछे खास धार्मिक वजह है.

मणिपुर चक्र पर विराजित हैं महाकाल

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी से शिव नवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है. महाकालेश्वर मंदिर प्रबंधन के अनुसार कालों के काल भगवान महाकाल के दरबार में ही केवल महाशिवरात्रि पर्व बनाकर भगवान को अलग-अलग स्वरूप में दूल्हा बनाया जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कालों के कल भगवान महाकाल मणिपुर चक्र पर विराजित है.

प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में शिव नवरात्रि के दौरान 9 दिनों तक भगवान चंद्र मौलेश्वर, मन महेश, शिव तांडव, उमा महेश आदि स्वरूप में प्रजा को दर्शन देते हैं. जब भगवान निराकार रूप से साकार रूप धारण कर सका रूप में आते हैं तो बड़ी संख्या में शिव भक्त भगवान का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं.

महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी बताते हैं कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों में तीसरे नंबर पर विराजित भगवान महाकालेश्वर के दरबार में ही शिव नवरात्रि मनाई जाती है. दूसरे ज्योतिर्लिंगों में केवल महाशिवरात्रि का पर वही मनाया जाता है.

महाशिवरात्रि के बाद दिन में होती है भस्म आरती

विश्व भर के करोड़ों शिव भक्तों के आकर्षण का केंद्र मानी जाने वाली भस्म आरती महाशिवरात्रि के अगले दिन दोपहर के समय होती है. महाकालेश्वर मंदिर में वर्ष भर में एक बार भगवान महाकाल की दिन में 12:00 बजे भस्म आरती की जाती है, शेष सभी दिनों में भस्म आरती ब्रह्म मुहूर्त में होती है. शिव नवरात्रि के साथ महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व की शुरुआत हो जाती है.

अलग-अलग रूपों में तिथि के अनुसार श्रंगार

शिवनवरात्रि के नौ दिनों में भगवान महाकाल का अलग-अलग रूपों में तिथि अनुसार शृंगार भी इसी अद्भुत परंपरा का हिस्सा है. इसी विशिष्ट पूजन परंपरा के कारण शिवनवरात्र में तिथि वृद्धि होने के कारण बढ़ी हुई तिथि पर भगवान का शृंगार करने को लेकर असमंजस की स्थित निर्मित हो रही है. शुक्रवार को पुजारी बैठक कर इस पर निर्णय लेंगे कि किस दिन भगवान का किस रूप में शृंगार किया जाए।

ग्वालियर के पंचांग की मान्यता

महाकाल के पुजारियों की मानें तो महाकाल मंदिर की पूजन परंपरा में तिथि का निर्धारण ग्वालियर के पंचांग अनुसार की जाती है. ऐसी के अनुसार तय होगा कि नवरात्र में कौन सी तिथि बढ़ी है. उसी के अनुसार मुखारविंद का निर्धारण होगा.

ऐसा भी कहा जा सकता है कि पहले दिन भगवान को नवीन वस्त्र व आभूषण धारण कराकर जो चंदन शृंगार किया जाता है, उसी शृंगार को शुरुआती दो दिन निरंतर रखते हुए अगले दिन से निर्धारित क्रम अनुसार अन्य मुखारविंद का शृंगार किया जाए. मंदिर के सभी प्रमुख सोलह पुजारी बैठक कर इसका निर्णय लेते हैं.

किस दिन किन रूपों में होता है शृंगार

मंदिर की परंपरा अनुसार फाल्गुन कृष्ण पंचमी पर शिवनवरात्र के पहले दिन भगवान को महाकाल को हल्दी लगाकर दूल्हा बनाया जाता है. इसके बाद नवीन वस्त्र व सोने चांदी के आभूषण धारण कराकर चंदन शृंगार किया जाता है. षष्ठी पर शेषनाग, सप्तमी पर घटाटोप, अष्टमी पर छबीना, नवमी पर होलकर, दशमी पर मनमहेश, एकादशी पर उमा महेश, द्वादशी पर शिव तांडव, महाशिवरात्रि के दिन (सुबह से रात तक कोई मुखारविंद धारण नहीं कराया जाता) सतत जलधारा तथा चतुर्दशी पर सप्तधान शृंगार होता है.

चंद्र दर्शन की दूज पर पंच मुखारविंद दर्शन

महाकाल मंदिर की पूजन परंपरा अनुसार महाशिवरात्रि के तीन दिन बाद फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया जिसे चंद्र दर्शन की दूज कहा जाता है, इस दिन भगवान का पंच मुखारविंद शृंगार किया जाता है. अर्थात इस दिन भगवान महाकाल भक्तों को एक साथ पांच रूपों में दर्शन देते हैं. शिवनवरात्र के नौ दिन, जो भक्त भगवान के दर्शन नहीं कर पाते हैं, वे दूज के दिन भगवान के एक साथ पांच रूपों के दर्शन कर सकते हैं.

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