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सफला एकादशी क्या सच में सारे काम सफल बनाती है ? जानें…

DB News
Last updated: 20/12/2024 11:24 AM
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7 Min Read
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सफला एकादशी का व्रत समस्त कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना गया है. सफला एकादशी का महत्व और कथा क्या है, इसके फल से कौन सा पुण्य प्राप्त होता है.

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Contents
सफला एकादशी का व्रत समस्त कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना गया है. सफला एकादशी का महत्व और कथा क्या है, इसके फल से कौन सा पुण्य प्राप्त होता है.सफला एकादशी कथा

Saphala Ekadashi 2024: इस साल सफला एकादशी का व्रत 26 दिसंबर 2024, गुरुवार को है. गुरुवार और एकादशी दोनों ही श्रीहरि को बेहद प्रिय है. ऐसे में इस साल की आखिरी एकादशी बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, कहते हैं सफला एकादशी व्रत समस्त कार्यों को सफल करता है. आइए जानते हैं जबलपुर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा से सफला एकादशी की कथा और उसके महत्व के बारे में…

सफला एकादशी कथा

प्राचीन समय में चम्पावती नगरी में महिष्मान नामक एक राजा था, उसके चार पुत्र थे. उसका सबसे बड़ा लुम्पक नाम का पुत्र महापापी और दुष्ट था. वह हमेशा, पर-स्त्री गमन में तथा वेश्याओं के यहां जाकर अपने पिता का धन व्यय किया करता था. देवता, ब्राह्मण, वैष्णव आदि सुपात्रों की निंदा करके वह अति प्रसन्न होता था.

सारी प्रजा उसके कुकर्मों से बहुत दुःखी थी, परंतु युवराज होने के कारण सब चुपचाप उसके अत्याचारों को सहन करने को विवश थे और किसी में भी इतना साहस नहीं था कि कोई राजा से उसकी शिकायत करता, परंतु बुराई अधिक समय तक पर्दे में नहीं रहती. एक दिन राजा महिष्मान को लुम्पक के कुकर्मों का पता चल ही गया,

तब राजा अत्यधिक क्रोधित हुआ और उसने लुम्पक को अपने राज्य से निकाल दिया. पिता द्वारा त्यागते ही लुम्पक को और सभी ने भी त्याग दिया. अब वह सोचने लगा कि मैं क्या करूं? कहां जाऊं? अंत में उसने रात्रि को पिता के राज्य में चोरी करने की ठानी.

वह दिन में राज्य से बाहर रहने लगा और रात्रि को अपने पिता की नगरी में जाकर चोरी तथा अन्य बुरे कर्म करने लगा. रात में वह जाकर नगर के निवासियों को मारता तथा कष्ट देता. वन में वह निर्दोष पशु-पक्षियों को मारकर उनका भक्षण किया करता था. किसी-किसी रात जब वह नगर में चोरी आदि करते पकड़ा भी जाता तो राजा के डर से पहरेदार उसे छोड़ देते थे.

कहते हैं कि कभी-कभी अनजाने में भी प्राणी ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है. ऐसा ही कुछ लुम्पक के साथ भी हुआ. जिस वन में वह रहता था, वह वन भगवान को भी बहुत प्रिय था. उस वन में एक प्राचीन पीपल का वृक्ष था तथा उस वन को सभी लोग देवताओं का क्रीड़ा-स्थल मानते थे. वन में उसी पीपल के वृक्ष के नीचे महापापी लुम्पक रहता था.

कुछ दिन बाद पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वस्त्रहीन होने के कारण लुम्पक तेज ठंड से मूर्च्छित हो गया. ठंड के कारण वह रात को सो न सका और उसके हाथ-पैर अकड़ गए. वह रात बड़ी कठिनता से बीती किंतु सूर्य के उदय होने पर भी उसकी मूर्च्छा नहीं टूटी. वह ज्यों-का-त्यों पड़ा रहा. सफला एकादशी की दोपहर तक वह पापी मुर्च्छित ही पड़ा रहा.

जब सूर्य के तपने से उसे कुछ गर्मी मिली, तब दोपहर में कहीं उसे होश आया और वह अपने स्थान से उठकर किसी प्रकार चलते हुए वन में भोजन की खोज में फिरने लगा. उस दिन वह शिकार करने में असमर्थ था, इसलिए पृथ्वी पर गिरे हुए फलों को लेकर पीपल के वृक्ष के नीचे गया. भूखा होने के बाद भी वह उन फलों को न खा सका, क्योंकि कहां तो वह नित्य जीवों को मारकर उनका मांस खाता था और कहां फल. उसे फल खाना तनिक भी अच्छा नहीं लगा, अतः उसने उन फलों को पीपल की जड़ के पास रख दिया और दुःखी होकर बोला – ‘हे ईश्वर! यह फल आपको ही अर्पण हैं.

इन फलों से आप ही तृप्त हों. ऐसा कहकर वह रोने लगा और रात को उसे नींद नहीं आई. वह सारी रात रोता रह. इस प्रकार उस पापी से अनजाने में ही एकादशी का उपवास हो गया उस महापापी के इस उपवास तथा रात्रि जागरण से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न हुए और उसके सभी पाप नष्ट हो गए. सुबह होते ही एक दिव्य रथ अनेक सुंदर वस्तुओं से सजा हुआ आया और उसके सामने खड़ा हो गया. उसी समय आकाशवाणी हुई – ‘हे युवराज! भगवान नारायण के प्रभाव से तेरे सभी पाप नष्ट हो गए हैं, अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर.’

जब यह आकाशवाणी लुम्पक ने सुनी तो वह अत्यंत प्रसन्न होते हुए बोला – ‘हे प्रभु! आपकी जय हो!’ ऐसा कहकर उसने सुंदर वस्त्र धारण किए और फिर अपने पिता के पास गया. पिता के पास पहुंचकर उसने सारी कथा पिता को सुनाई. पुत्र के मुख से सारा वृत्तांत सुनने के बाद पिता ने अपना सारा राज्य तत्क्षण ही पुत्र को सौंप दिया और स्वयं वन में चला गया. अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा. उसकी स्त्री, पुत्र आदि भी श्री विष्णु के परम भक्त बन गए.

वृद्धावस्था आने पर वह अपने पुत्र को राज्य सौंपकर भगवान का भजन करने के लिए वन में चला गया और अंत में परम पद को प्राप्त हुए. हे पार्थ! जो मनुष्य श्रद्धा व भक्तिपूर्वक इस सफला एकादशी का उपवास करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में मुक्ति प्राप्त होती है. हे अर्जुन! जो मनुष्य इस सफला एकादशी के माहात्म्य को नहीं समझते, उन्हें पूंछ और सींगों से विहीन पशु ही समझना चाहिए. सफला एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने अथवा श्रवण करने से प्राणी को राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है.”

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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