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हाथरस हादसे के बाद एक बार फिर उठी ‘अंध श्रद्धा कानून’ की मांग

DB News
Last updated: 29/10/2025 10:56 AM
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जानिये किन राज्यों में अंधविश्वास को लेकर क्या है कानून

BY -Dbnewsupdate| Edited By- Supriya

Contents
जानिये किन राज्यों में अंधविश्वास को लेकर क्या है कानून क्या है अंधविश्वास:काला जादू क्या है:भारत में इससे संबंधित कानून:राज्य-विशिष्ट कानून:बिहार:महाराष्ट्र:कर्नाटक:केरल:अंधविश्वास विरोधी अधिनियम की आवश्यकता:आगे की राहस्रोत: द हिंदू

BHole Baba: भोले बाबा उर्फ नारायण साकार हरि ने हाथरस में भक्तों से प्रवचन के दौरान कहा था कि मेरे चरणों की रज लेकर जाना. मत्थे पर धूल लगाना तो सभी समस्या और बीमारी खत्म हो जाएगी. कुछ ऐसे ही अंध विश्वास ने 123 लोग काल के गाल में समा गए. इससे पहले भी दो महिलाओं को केरल में कर्मकांडी मानव बलि के तहत नृशंस हत्या कर दी गई थी, जिसको लेकर देश भर में बहस छिड़ गई थी. इन हत्याओं के बाद अंधविश्वास, काला जादू और जादू-टोना की व्यापकता पर लगाम लगाने की बात शुरू हो गई थी. हाथरस हादसा होने के बाद एक बार फिर अंध श्रद्धा कानून की मांग उठने लगी है.

 क्या है अंधविश्वास:

यह अज्ञान अथवा भय से संबंधित एक विश्वास है और अलौकिक के प्रति जुनूनी श्रद्धा इसकी विशेषता है। ‘Superstition ‘ शब्द लैटिन शब्द ‘सुपरस्टिटियो’ से लिया गया है, जो ईश्वर के अत्यधिक भय को इंगित करता है। अंधविश्वास देश, धर्म, संस्कृति, समुदाय, क्षेत्र, जाति या वर्ग-विशिष्ट नहीं होता हैं, इसका स्तर व्यापक है और यह दुनिया के हर कोने में पाया जाता है।

काला जादू क्या है:

काला जादू, जिसे जादू-टोना के रूप में भी जाना जाता है, दुष्ट और स्वार्थी उद्देश्यों के लिये अलौकिक शक्ति का उपयोग है तथा किसी को शारीरिक या मानसिक या आर्थिक नुकसांन पहुँचाने के लिये दुर्भावनापूर्ण कार्य करना है। यह कार्य पीड़ित के बाल, कपड़े, फोटो आदि का उपयोग करके किया जा सकता है।

भारत में इससे संबंधित कानून:

भारत में जादू टोना और अंधविश्वास से संबंधित अपराधों के लिये कोई समर्पित केंद्रीय कानून नहीं है।वर्ष 2016 में लोकसभा में डायन-शिकार निवारण विधेयक (Prevention of Witch-Hunting Bill) लाया गया था लेकिन यह पारित नहीं हुआ था।

मसौदा प्रावधानों में किसी महिला पर डायन का आरोप लगाने या महिला के खिलाफ आपराधिक बल का उपयोग करने या जादू-टोना करने के बहाने यातना देने या अपमान करने के लिये दंड का प्रावधान किया गया।

आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा 302 (हत्या की सज़ा) के तहत मानव बलि को शामिल किया गया है (लेकिन हत्या होने के बाद ही)। इसी तरह धारा 295A ऐसी प्रथाओं को हतोत्साहित करती है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A (h) भारतीय नागरिकों के लिये वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और सुधार की भावना को विकसित करना एक मौलिक कर्त्तव्य बनाता है।

ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज़ एक्ट, 1954 के तहत अन्य प्रावधानों का भी उद्देश्य भारत में प्रचलित विभिन्न अंधविश्वासी गतिविधियों में कमी लाना है।

राज्य-विशिष्ट कानून:

बिहार:

बिहार पहला राज्य था जिसने जादू-टोना रोकने, एक महिला को डायन के रूप में चिह्नित करने और अत्याचार, अपमान तथा महिलाओं की हत्या को रोकने हेतु कानून बनाया था।

द प्रिवेंशन ऑफ विच (डायन) प्रैक्टिस एक्ट अक्तूबर 1999 में प्रभाव में आया।

महाराष्ट्र:

वर्ष 2013 में महाराष्ट्र मानव बलि और अन्य अमानवीय कृत्य की रोकथाम एवं उन्मूलन अधिनियम पारित किया ताकि राज्य में अमानवीय प्रथाओं तथा काला जादू आदि को प्रतिबंधित किया जा सके।

इस कानून का एक खंड विशेष रूप से ‘godman’ (स्वयं को इश्वर के समकक्ष मानने वाले) द्वारा किये गए दावों से संबंधित है जो दावा करते हैं कि उनके पास अलौकिक शक्तियाँ हैं।

कर्नाटक:

कर्नाटक ने वर्ष 2017 में अंधविश्वास विरोधी कानून को प्रभाव में लाने का कार्य किया, जिसे अमानवीय प्रथाओं और काला जादू रोकथाम एवं उन्मूलन अधिनियम के रूप में जाना जाता है।

यह अधिनियम धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी “अमानवीय” प्रथाओं का व्यापक रूप से विरोध करता है।

केरल:

केरल में काला जादू और अन्य अंधविश्वासों से निपटने के लिये कोई व्यापक अधिनियम नहीं है।

अंधविश्वास विरोधी अधिनियम की आवश्यकता:

इस तरह की प्रथाओं को अबाध रूप से जारी रखने की अनुमति देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत क्रमशः किसी व्यक्ति की समानता के मौलिक अधिकार और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

इस तरह के कृत्य विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय विधानों के कई प्रावधानों का भी उल्लंघन करते हैं, जिनमें भारत एक हस्ताक्षरकर्त्ता है, जैसे ‘मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948’, ‘नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता, 1966’ और ”महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अभिसमय, 1979।

भारत के केवल आठ राज्यों में अब तक डायन-शिकार निवारण विधेयक कानून हैं।इनमें बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, असम, महाराष्ट्र और कर्नाटक शामिल हैं।

अंधविश्वासों से निपटने के उपायों के अभाव में अवैज्ञानिक और तर्कहीन प्रथाओं जैसे उपचार के तरीके पर विश्वास, एवं चिकित्सा प्रक्रियाओं के बारे में गलत जानकारी भी बढ़ सकती है, जो सार्वजनिक व्यवस्था एवं नागरिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर हानिकारक प्रभाव डाल सकती है।

आगे की राह

यह याद रखना उचित है कि इस सामाजिक मुद्दे से निपटने के लिये कानून लाने का मतलब केवल आधी लड़ाई जीतना होगा।

सूचना अभियानों के माध्यम से इस तरह की प्रथाओं से जुड़े मिथकों को दूर करने के लिये समुदाय/धार्मिक विद्वानों को शामिल करके जनता के बीच जागरूकता बढ़ाकर सुधार किये जाने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू

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