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सूर्य को अर्घ्य देने देने के लिए नदी-तालाब के तट पर लगी भीड़

DB News
Last updated: 06/04/2026 11:38 AM
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छठ पूजा का आज चौथा और अंतिम दिन हैं. व्रती महिलाओं ने सुबह सूर्य उगने से पहले जलाशय स्थल पर पहुंची और अर्घ्य देकर इस कठिन व्रत को संपन्न किया.

By : DB News Update  | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Contents
छठ पूजा का आज चौथा और अंतिम दिन हैं. व्रती महिलाओं ने सुबह सूर्य उगने से पहले जलाशय स्थल पर पहुंची और अर्घ्य देकर इस कठिन व्रत को संपन्न किया.भारी उत्साह से मना छठ पर्व36 घंटे निर्जला व्रत रहीं महिलाएंनर्मदा के घाटों में देखी गई भीड़संध्या अर्घ्य का महत्वसंध्या अर्घ्य की विधिछठ पूजा का समापन ऊषा अर्घ्य के साथ

Chhath 2025: छठ पर्व के मौके पर देश के अनेक हिस्सों में भारी उत्साह देखने को मिला. सूर्य को अर्घ्य देने के लिए जलाशय  के पास परिवार के साथ लोगों  की भीड़ देखने को मिली, जबलपुर के नर्मदा तट पर देर रात से ही व्रती महिलाएं पहुंच गईं थीं, पूरे परिवार के साथ इस कठिन व्रत का समापन जलाशय के अंदर पूजन के बाद संपन्न किया. महिलाएं रातभर पानी में खड़े रहे उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का इंतजार करते हुए नज़र आईं.

भारी उत्साह से मना छठ पर्व

बिहार, यूपी, दिल्ली, लखनऊ, एमपी जबलपुर सहित देश के अनेक हिस्सों में बच्चे, बड़े बुजुर्ग सभी में छठ पर्व को लेकर भारी उत्साह देखने को मिला, इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे.

36 घंटे निर्जला व्रत रहीं महिलाएं

व्रती महिलाओं ने छठ पूजा के अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को उषा अर्घ्य दिया. सूरज को अर्घ्य देने के साथ ही महिलाओं के 36 घंटे का निर्जला उपवास भी खत्म हो गया. महिलाओं ने छठ पूजा के आखिरी दिन उगते सूर्य को ‘उषा अर्घ्य’ देकर अपने परिवार की सुख समृद्धि, संतान की दीर्घायु और जीवन में ऊर्जा की कामना की.

नर्मदा के घाटों में देखी गई भीड़

जहां छठ पर्व को बड़ी धूमधाम के साथ मनाया गया है. महिलाएं पारंपरिक अंदाज में सूर्य को अर्घ्य देती दिखाई दीं. वहीं नर्मदा के गौरीघाट जबलपुर में भी देर रात से जबरजस्त भीड़ देखने को मिली. कई लोगों ने आकर्षक रंगोली बनाकर छठ पर्व पर शुभकामनाएं दीं.

संध्या अर्घ्य का महत्व

  • कृतज्ञता का प्रतीक: यह अर्घ्य सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है, जो पूरे दिन ऊर्जा, प्रकाश और जीवन प्रदान करते हैं.
  • स्वीकार और आशा: डूबते सूर्य को अर्घ्य देना जीवन के हर उतार-चढ़ाव (समाप्ति या पतन) को सम्मान देने और यह स्वीकार करने का प्रतीक है कि हर रात के बाद एक नई सुबह (आशा और नया जीवन) आती है.
  • देवी प्रत्यूषा की पूजा: इस दिन सूर्य देव के साथ उनकी पत्नी देवी प्रत्यूषा (सांध्यकाल की अधिष्ठात्री देवी) की भी पूजा की जाती है। माना जाता है कि डूबते सूर्य को अर्घ्य देने से सूर्य पूजा की पूर्णता प्राप्त होती है.

संध्या अर्घ्य की विधि

  • यह दिन कठोर अनुशासन, पवित्रता और सामूहिक भक्ति का होता है.
  • निर्जला व्रत: छठव्रती दूसरे दिन खरना के प्रसाद ग्रहण करने के बाद से लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू करती हैं, जो तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के बाद भी रात भर चलता है.
  • घाट पर पहुँचना: व्रती और उनका परिवार बाँस की टोकरी (सूप/दउरा) में अर्घ्य सामग्री सजाकर किसी नदी, तालाब या जलाशय के किनारे बने घाट पर पहुँचते हैं। पूरा घाट भक्तिमय छठ गीतों और रोशनी से जगमगा उठता है.
  • अर्घ्य सामग्री: सूप में मुख्य रूप से ठेकुआ (पारंपरिक पकवान), चावल के लड्डू (कसार), गन्ना, शकरकंदी, विभिन्न प्रकार के फल और अन्य नैवेद्य (प्रसाद) होते हैं.
  • अर्घ्य देना: जैसे ही सूर्य डूबना शुरू करते हैं, व्रती पानी में कमर तक खड़ी होकर, हाथ में जल और दूध से भरा तांबे का लोटा (या कलश) लेकर, सूर्य देव की ओर मुख करके अर्घ्य देती हैं। इस दौरान छठ मैया और सूर्य देव की पूजा की जाती है.

छठ पूजा का समापन ऊषा अर्घ्य के साथ

तीसरे दिन का संध्या अर्घ्य पूरा करने के बाद, व्रती घर लौटकर अगली सुबह की तैयारी करती हैं. पर्व का समापन चौथे और अंतिम दिन होता है, जिसे ऊषा अर्घ्य या भोर का अर्घ्य कहा जाता है. चौथा दिन व्रती एक बार फिर सूर्योदय से पहले उसी घाट पर पहुँचती हैं. उगते सूर्य को अर्घ्य: सूर्योदय के समय, व्रती पानी में खड़े होकर, पुनः सूप और प्रसाद से भरे अर्घ्य को उगते हुए सूर्य को अर्पित करती हैं. उगते सूर्य को अर्घ्य देना नवजीवन, आशा और ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है. यह छठ पर्व का संदेश है कि हर अंधकार के बाद रोशनी लौटती है. ऊषा अर्घ्य देने के बाद, व्रती प्रसाद ग्रहण करके अपने 36 घंटे के कठोर निर्जला व्रत का पारण (समापन) करती हैं. इसके बाद प्रसाद सभी में वितरित किया जाता है.

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