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Madhya Pradesh

MP के 6 बड़े शहर ‘रेबीज फ्री सिटी’ नहीं बन पाए

DB News
Last updated: 21/03/2026 10:39 PM
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6 Min Read
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मध्य प्रदेश के जबलपुर, इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन और सतना शहर शामिल किए गए थे,  15-15 करोड़ रुपये का फंड भी मिलना था.

By : DB News Update  | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Contents
मध्य प्रदेश के जबलपुर, इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन और सतना शहर शामिल किए गए थे,  15-15 करोड़ रुपये का फंड भी मिलना था.अप्रूव हो चुका भोपाल का प्लान2030 तक बनाना है रेबीज फ्री शहरतीन चरणों में होना है कामहर माह 2270 लोगों को काटते हैं डॉग60 हजार से ज्यादा हैं स्ट्रीट डॉगहोना चाहिए 8, अभी है सिर्फ एक एबीसी सेंटर

stray dogs : केंद्र सरकार ने दो साल पहले देश के 100 शहरों से ‘रेबीज फ्री सिटी’ बनाने का एक्शन प्लान मांगा था. इसमें जबलपुर समेत प्रदेश के 6 शहर भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन और सतना को शामिल किया गया था. हर शहर को इसके लिए 15-15 करोड़ रुपए दिए जाने थे, लेकिन जबलपुर ने रिपोर्ट देने में इतनी देरी कर दी कि अन्य शहरों का पैसा भी रुक गया. यहां के अधिकारियों ने महीनों बाद पिछले माह प्लान भेजा है, जबकि भोपाल का प्लान 11 माह पहले ही केंद्र सरकर तक पहुंच चुका है. नगरीय प्रशासन विभाग ने 3 माह पहले अल्टीमेटम भी दिया था, इसके बावजूद अधिकारियों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. स्थिति यह है कि जब तक जबलपुर समेत प्रदेश के सभी 6 शहरों के प्रस्ताव को केंद्र से हरी झंडी नहीं मिल जाएगी तब तक राशि जारी नहीं की जाएगी. केंद्र ने स्पष्ट कर दिया है कि सभी शहरों को फंड एक साथ ही जारी किया जाएगा.

अप्रूव हो चुका भोपाल का प्लान

पता चला है Rabies Free City मामले में भी राजधानी के अधिकारियों ने बाजी मार ली है. वहां के निगम अधिकारियों ने कई महीने पहले ही प्लान बनाकर केंद्र सरकार को भेज दिया था. भोपाल का प्लान अप्रूव भी हो चुका है, लेकिन जबलपुर समेत प्रदेश के अन्य शहरों का प्लान न मिलने के कारण भोपाल को भी राशि नहीं मिल पाई है। केंद्र सरकार की मंशा प्रदेश के सभी शहरों को एक साथ फंड जारी करने की है.

2030 तक बनाना है रेबीज फ्री शहर

केंद्र ने देश के 100 शहरों को चुना है, जिन्हें 2030 तक रेबीज फ्री बनाना है. इन सभी शहरों को केंद्र की ओर से 15-15 करोड़ का फंड दिया जाना है, ताकि इस दिशा में काम हो सके. अधिकारियों की लेटलतीफी के कारण अभी तक प्लान ही अप्रूव नहीं हो पाया है, जबकि 2025 बीतने की कगार पर पहुंच चुका है और इस प्लान पर काम कब से शुरू हो पाएगा, यह कहना भी संभव नहीं है.

तीन चरणों में होना है काम

  • पहले चरण में वृहद स्तर पर एंटी रेबीज वैक्सीनेशन अभियान चलाना.
  • दूसरा ज्यादा से ज्यादा डॉग की नसबंदी करवाना.
  • तीसरा लोगों को रेबीज के संबंध में जागरूक करना.
  • इसके तहत शहरों में जरूरत के मुताबिक एबीसी (एनीमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर की संख्या बढ़ाई जाएगी.
  • 70 फीसदी से ज्यादा डॉग्स को रेबीज के इंजेक्शन लगाना है.

हर माह 2270 लोगों को काटते हैं डॉग

नेशनल हेल्थ मिशन की रिपोर्ट के अनुसार जबलपुर में हर महीने 2270 डॉग बाइट्स की घटनाएं होती हैं. 2024 में 13619 लोगों को श्वानों ने काटा था. डॉग बाइट्स की ये घटनाएं साल दर साल बढ़ती ही जा रही हैं. रेबीज के कारण कई लोगों की मौत भी हो चुकी है. बावजूद इसके नगर निगम ने रेबीज फ्री सिटी बनाने का प्लान तैयार करने में इतनी देरी कर दी कि फंड जारी नहीं हो पा रहा है.

60 हजार से ज्यादा हैं स्ट्रीट डॉग

जबलपुर में स्ट्रीट डॉग की संख्या 60 हजार से ज्यादा है, जबकि शहर में एक ही सेल्टर हाउस है. इसी वजह से एक महीने में 550 से ज्यादा डॉग की नसबंदी नहीं हो पा रही है और उनका आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. हर साल 15 हजार मादा कम से कम 30 हजार पपीज को जन्म देती हैं, जबकि नगर निगम 5 से 6 हजार का टीकाकरण ही कर पाता है. निगम प्रशासन द्वारा सेल्टर हाउस की संख्या भी नहीं बढ़ाई जा रही है.

होना चाहिए 8, अभी है सिर्फ एक एबीसी सेंटर

केंद्र ने एबीसी (एनीमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर के लिए जो गाइडलाइन तय की है, उसके अनुसार हर दस वार्ड में एक एबीसी सेंटर होना चाहिए. शहर में कुल 79 वार्ड हैं. इस हिसाब से 8 एबीसी सेंटर होने चाहिए, लेकिन अभी नगर निगम के पास एक ही है. इस वजह से ही डॉग्स की नसबंदी का काम गति नहीं पकड़ पा रहा है. शहर में बड़ी तेजी के साथ आवारा कुत्ते बढ़ते जा रहे हैं. इन पर लगाम लगाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. नगर निगम के पास भी ऐसे कोई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे गली के कुत्तों पर लगाम लगाई जा सके.

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