हिंदू शास्त्रों में दुल्हन का दूल्हे के बाईं ओर बैठना शुभ माना जाता है. शादी के बाद भी हर शुभ काम में पत्नी पति के बाईं ओर बैठकर ही रस्में निभाती है. जानिए इसका कारण.
Source : DB News Update
By : पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Hindu Vivah Rituals: हिंदू धर्म के वैवाहिक कार्यक्रम में अक्सर देखने को मिलता है कि दुल्हन को दूल्हे के बाईं ओर बैठाया जाता है. इसके पीछे प्रमुख कारण क्या है? यह जानने का कभी प्रयास नहीं किया गया. यदि आप भी इस प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं तो आइए हम बताते हैं कि आखिर दुल्हन वामांगी क्यों होती है? यह मान्यता न केवल शास्त्रोक्त है, बल्कि स्नेह-प्रेम का प्रतीक भी है. एक ओर शास्त्रों में जहां दुल्हन का दूल्हे के बाईं ओर बैठना शुभ माना गया है और शादी के बाद भी हर शुभ काम में पत्नी पति के बाईं ओर बैठकर ही रस्में निभाने की परंपरा है. वहीं पत्नी-पति के जीवन में प्यार, सम्मान और शुभता के लिए लाभकारी है.
शादी में रस्मों का कितना महत्व
हिंदू धर्म की शादी में हर रस्म का अपना खास महत्व होता है. हल्दी, मेहंदी, बारात और सात फेरों जैसी रस्में कई दिनों तक निभाई जाती हैं. इन्हीं में एक खास परंपरा भी जुड़ी हुई है, जिसमें दूल्हे के बाईं तरफ दुल्हन को बैठाया जाता है. यह सिर्फ शादी के दिन ही नहीं, बल्कि बाद में हर शुभ काम करने के दौरान बैठाने की प्रथा है.
पत्नी को ‘वामांगी’ क्यों कहा जाता है?
शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि पत्नी ‘वामांगी’ होती है, इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण बतलाया गया है. क्योंकि पति के बाएं हिस्से की अधिकारी पत्नी को माना गया है. मान्यता है कि स्त्री का जन्म भगवान शिव के बाएं अंग से हुआ था. उनका यह प्रतीक शिव के अर्धनारीश्वर रूप में देखा जाता है, जहाँ आधा शरीर शिव का और आधा शक्ति का है. इसलिए दुल्हन को पति के बाईं ओर स्थान दिया गया है.
कई अनुष्ठान पीढ़ियों से निभाए जा रहे
दुल्हन की मांग में सिक्के भरने की परंपरा से लेकर विदाई के समय चावल उछालने तक, अनेक अनुष्ठान पीढ़ियों से निभाए जा रहे हैं. इनमें से कुछ परंपराएं धार्मिक और वैदिक शास्त्रों में भी अनिवार्य मानी गई हैं. इनमें एक महत्वपूर्ण परंपरा विवाह के दौरान दुल्हन का दूल्हे के बाईं ओर बैठना है.
बाईं ओर बैठने का महत्व
पारंपरिक मान्यता के अनुसार, यदि विवाह पूजन या हवन के दौरान दुल्हन दूल्हे के बाईं ओर बैठती है, तो विवाह को पूर्ण और शुभ माना जाता है. हिंदू शास्त्रों में पत्नी को वामांगिनी कहा गया है, जिसका अर्थ है पति के बाएं अंग के निकट स्थित. यह प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाता है कि दुल्हन हमेशा दूल्हे के हृदय के समीप रहेगी. इस परंपरा का पालन करने से दंपती के बीच प्रेम, विश्वास और सौहार्द बना रहता है.
देवी-देवताओं से जुड़ी परंपरा
धार्मिक दृष्टिकोण से भी यह परंपरा महत्वपूर्ण है. शास्त्रों में कहा गया है कि माता लक्ष्मी हमेशा भगवान विष्णु के बाईं ओर बैठती हैं. इसी तरह, देवी का जन्म भगवान शिव के बाएं अंग से हुआ था, जिसे अर्धनारीश्वर के रूप में देखा जाता है. इसमें शिव और शक्ति एक ही देह के दो हिस्सों के रूप में प्रकट होते हैं. यही कारण है कि विवाह संस्कार में वधू को वर के बाईं ओर बैठाना शुभ माना जाता है.
हृदय से जुड़ी है मान्यता
ऐसी मान्यता है कि पुरुष का हृदय शरीर के बाईं ओर होता है. इसीलिए दुल्हन को पति के बाईं ओर बैठाया जाता है, ताकि यह माना जाए कि वह हमेशा पति के दिल में रहती है. इस मान्यता के अनुसार पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार और अपनापन बना रहता है.
बाईं दिशा को प्रेम का प्रतीक माना गया है
हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि बाईं दिशा और बायां हाथ प्यार, कोमलता और समझ का प्रतीक है. इसलिए दुल्हन को बाईं ओर बैठाना इस बात का संकेत है कि शादी के बाद पति-पत्नी के बीच प्यार और मेलजोल बना रहे.
पति-पत्नी के रिश्ते का प्रतीक
इन सब मान्यताओं को मिलाकर देखा जाए तो दुल्हन का बाईं ओर बैठना सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि रिश्ते की गहराई को दर्शाता है. यह परंपरा से यह पता चलता है कि पत्नी पति के जीवन में प्यार, सम्मान और शुभता लाती है, और यही साथ पूरे वैवाहिक जीवन में बना रहता है.
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