जगत के नाथ जगन्नाथ भगवान, भाई बलभद्र और सुभद्रा देवी का रथ भी यात्रा में हुआ शामिल. 2026 में भी रथ यात्रा के दौरान हुई भगदड़, एक की मौत.
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Written By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Puri Jagannath Rath Yatra 2026: ओडिशा के पुरी में आज गुरुवार 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू हो गई है. पहले दिन नंदीघोष के आगे बढ़ने के कुछ देर बाद ही रथयात्रा का विराम हो गया है. इसके बाद यात्रा कल सुबह गुंडीचा मंदिर के लिए रवाना होगी. इस बीच देवी सुभद्र का रथ दर्पदलन या देवदलन भी आगे बढ़ गए हैं. इसी बीच जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान भगदड़ की खबर भी आ रही है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई है. शाम 5 बजे पहांडी रस्म के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए अचानक लोग रथों के पास जाने लगे. यात्रा रूट पर मौजूद वॉलेंटियर लोगों को पीछे हटा रहे थे. तभी भीड़ में धक्का-मुक्की होने लगी और भगदड़ मच गई. लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे. जब भगदड़ मची उस वक्त पुरी में तेज बारिश हो रही थी. इसके बावजूद 10 लाख से ज्यादा श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ जी का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए यात्रा रूट पर मौजूद थे. भीड़ ज्यादा होने की वजह से कई श्रद्धालुओं को सांस लेने में तकलीफ भी हुई, जिन्हें हॉस्पिटल पहुंचाया गया.
कल 3 किमी का सफर करेंगे भगवान जगन्नाथ
पुरी में शाम करीब 7.30 बजे भगवान जगन्नाथ का रथ आगे बढ़ सका. कुछ ही मीटर चलने के बाद पहले दिन की यात्रा को रोक दिया गया. यह यात्रा कल 17 जुलाई को सुबह दोबारा शुरू होगी और भगवान जगन्नाथ स्वामी 3 किमी का सफर करेंगे और गुंडीचा मंदिर तक जाएंगे. वहीं रथयात्रा के लिए भगवान बलभद्र के रथ तालध्वज पर घोड़े बांध दिए गए हैं. इस रथ की ऊंचाई लगभग 45 फीट है, इसमें 14 पहिए लगे हैं. रथ का रंग लाल और हरा है. इनके सारथी का नाम मातलि है. भगवान बलभद्र के रथ को काले घोड़े आगे बढ़ा रहे हैं, इनका नाम तीव्र, घोर, दीर्घश्रम और स्वर्णनाभ है. देवी सुभद्रा के रथ को लाल घोड़े खींच रहे हैं, इन घोड़ों का नाम रोचिका, मोचिका, जीता और अपराजिता है. जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को शंख, बलाहक, श्वेत और हरिदाश्व घोड़े रथ को आगे बढ़ा रहे हैं.
‘रथ प्रतिष्ठा’ रस्म के साथ शुरू यात्रा
पुरी जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की आधिकारिक समय-सारणी के अनुसार 9:00 बजे से तीनों महा-रथों (नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन) की पवित्र ‘रथ प्रतिष्ठा’ (पवित्रीकरण और पूजा) की रस्म हुई. मंदिर के पुजारी और वैदिक विद्वान मंत्रोच्चार के साथ रथों की शुद्धिकरण किया. जिसके बाद रथ पूरी तरह यात्रा के लिए तैयार हुआ. उसके बाद सबसे मुख्य और भावुक रस्म ‘पहंडी’ आरंभ हुआ. महाप्रभु जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को गर्भगृह से भारी सुरक्षा और घंट-घड़ियों के नाद के बीच बाहर लाए गए.
भगवान जगन्नाथ की यात्रा में शामिल होने से बैकुंठ धाम की होती है प्राप्ति
स्कंद पुराण के उत्कल खंड (पुरुषोत्तम माहात्म्य) में पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) और भगवान जगन्नाथ के दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि रथ यात्रा के दौरान भगवान के दर्शन करने, उनके रथ के साथ चलने और श्रद्धाभाव से उनका स्मरण करने वालों को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है. मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है.
9 दिनों तक चलेगा भगवान का उत्सव
भगवान जगन्नाथ स्वामी का उत्सव 9 दिनों तक चलता है. इस महापर्व में आस्था, सेवा, परंपरा और उत्साह का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो विश्व के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक पटल पर देखने को मिलता है. इन 9 दिनों में हर दिन अलग-अलग परंपरा निभाई जाती है जैसे हेरा पंचमी, संध्या दर्शन, बहुदा यात्रा, सुना बेषा, अधर पाना, नीलाद्री बीजे आदि. यह यात्रा भगवान और भक्त के बीच प्रेम, समानता, सेवा और लोककल्याण की भावना का प्रतीक मानी जाती है.
महाप्रभु का लगता है 6 बार भोग
महाप्रभु जगन्नाथ को 24 घंटे के भीतर कुल 6 बार भोग लगाया जाता है, सुबह 08:30 बजे (गोपाल वल्लभ भोग)- सुबह का हल्का नाश्ता (कद्दूकस नारियल, खोया, ताजे फल). सुबह 10:00 बजे (सकाल धूप)- मालपुआ (अमूलू) और विभिन्न पारंपरिक पीठा. दोपहर 11:00 से 01:00 बजे (भोग मंडप भोग)- भारी मात्रा में तैयार चावल, डालमा और महुरा. दोपहर 01:00 से 02:00 बजे (मध्याह्न धूप)- मुख्य दोपहर का शाही भोजन (कनिका और खट्टा). शाम 07:00 से 08:00 बजे (संध्या धूप)-सायंकालीन आरती के बाद भात, दाल और मीठे पीठे. रात 11:00 बजे (बड़ा सिंगार भोग)- शयन से पहले का भोजन (मीठा पखाल यानी पानी वाले चावल और कढ़ी) प्रसाद का भोग लगता है.
छेरा पहरा’ का सांस्कृतिक महत्व
‘छेरा पहरा’ जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे अनूठी और भव्य शाही रस्म है. इस अनुष्ठान के दौरान पुरी के गजपति महाराज स्वयं एक सेवक की तरह सोने की झाड़ू से तीनों रथों के चबूतरे को साफ करते हैं और उन पर सुगंधित जल छिड़कते हैं. यह रस्म भारतीय संस्कृति में समानता और सेवा भावना का सर्वोच्च प्रतीक है. यह संदेश देती है कि भगवान जगन्नाथ के दरबार में कोई राजा या रंक नहीं है; महाप्रभु के सामने संसार का सबसे शक्तिशाली शासक भी महज़ एक आम सेवक है.
ये है ‘अबाढ़ा महाप्रसाद’ का रहस्य
पुरी जगन्नाथ मंदिर की रसोई में पकने वाला भोजन तब तक केवल ‘अन्न’ कहलाता है, जब तक उसे मां विमला (शक्तिपीठ) को अर्पित कर भगवान जगन्नाथ का तुलसी दल नहीं चढ़ा दिया जाता. भोग लगने के बाद यह अलौकिक ‘अबाढ़ा महाप्रसाद’ बन जाता है. ‘अबाढ़ा’ का अर्थ है जिसे कोई बांध न सके, अर्थात जहां जाति, रंग या वर्ग का कोई भेद न हो. यहां एक ही पात्र से हर वर्ग के लोग साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं.

