अखंड सौभाग्य के लिए सुहागिनों ने हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं. इसके बाद अब 28 अक्टूबर को करवा चौथ पर्व मनाया जाएगा.
Source : DB News Update
By : डीबी न्यूज अपडेट | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Karwa Chauth 2026 Kab Hai: हिंदू धर्म में पत्नी द्वारा पति के लिए रखे जाने वाले व्रत-उपवासों के पीछे दृढ़ संकल्प और विश्वास है. जैसे सावित्री ने अपनी तपस्या और विश्वास से मृत पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लेकर आ गई, तो वहीं माता पार्वती ने कठोर तपस्या करके पति के रूप में शिव को प्राप्त कर लिया. इसलिए ऐसी परंपरा और मान्यता सदियों से चली आ रही हैं कि, पत्नी के व्रत रखने से पति की रक्षा होती है और दांपत्य जीवन में खुशियां रहती हैं.
पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए विवाहत महिलाएं वट सावित्री, हरियाली तीज, कजरी तीज जैसे कई तरह के व्रत रखती हैं. इन व्रतों के माध्यम से महिलाएं भगवान से पति की लंबी आयु का वरदान मांगती हैं और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं. अब अक्टूबर में करवा चौथ का व्रत रखा जाएया.
अखंड सौभाग्य के लिए कब रखा जाएगा करवा चौथ व्रत
सुहागिन स्त्रियों द्वारा करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. इस साल करवा चौथ का व्रत बुधवार 28 अक्टूबर को रखा जाएगा. इस दिन सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखने का महत्व है.
करवा चौथ पर चंद्रोदय का समय
चंद्रोदय का समय – 28 अक्टूबर को ही उदया तिथि और चंद्रोदय के समय चतुर्थी होने के कारण देश भर में करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा.
करवा चौथ पर महिलाओं को क्या करना चाहिए
- करवा चौथ के दिन महिलाओं को अच्छी तरह सजना-सवंरना चाहिए और सभी सुहाग की हर वस्तु पहनकर तैयार होना चाहिए.
- पूजा में करवा माता को भी सुहाग से जुड़ी चीजें जैसे-चुनरी, बिंदी, चूड़ी, सिंदूर,आलता आदि अर्पित करनी चाहिए.
- करवा चौथ की पूजा में करवा चौथ की कथा जरूर सुनें.
- करवा चौथ के दिन चंद्रमा दर्शन और पूजन भी जरूर करें.
- चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद चांद को छलनी से देखकर उसी छलनी से पति का मुख देखना चाहिए.
- करवा चौथ का व्रत पति के हाथ से पानी पीकर और मीठा खाकर खोलें.
करवा चौथ की पौराणिक कथा
कथा आती है कि प्राचीन काल में एक नगर में एक धार्मिक साहूकार रहता था. उसके सात बेटे और एक इकलौती बेटी थी, जिसका नाम वीरवती था. सात भाई अपनी बहन से अगाध प्रेम करते थे और उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी का ध्यान रखते थे. वीरवती का विवाह एक राजा से हुआ था. विवाह के बाद, वीरवती अपने मायके आई हुई थी. उस वर्ष उसने अपनी भाभियों के साथ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा. वीरवती स्वभाव से बेहद कोमल थी. पूरे दिन बिना अन्न और जल के रहने के कारण, शाम होते-होते उसका शरीर भूख और प्यास से व्याकुल हो गया और वह निढाल होकर गिर पड़ी. अपनी लाडली बहन की यह हालत सात भाइयों से देखी नहीं गई. वे चाहते थे कि वीरवती जल्दी से भोजन कर ले, लेकिन वीरवती ने साफ मना कर दिया कि वह चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना पानी की एक बूंद भी नहीं पिएगी. चूंकि चांद निकलने में अभी काफी समय था, इसलिए भाइयों ने अपनी बहन की जान बचाने के लिए एक गुप्त योजना बनाई. भाइयों ने नगर से बाहर जाकर एक ऊंचे वट के वृक्ष (बरगद के पेड़) पर एक जलता हुआ दीपक रख दिया और उसके आगे एक छलनी लगा दी. दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आसमान में चतुर्थी का चांद उग आया हो. इसके बाद, भाइयों ने घर आकर वीरवती से कहा, “बहन! देखो, आकाश में चंद्रमा निकल आया है. तुम जल्दी से अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लो.” वीरवती ने अपनी भाभियों से भी साथ चलने को कहा, लेकिन भाभियों को भाइयों की इस चाल का पता था. उन्होंने कहा, “ननद जी, अभी असली चांद नहीं निकला है, यह तो तुम्हारे भाइयों ने तुम्हारे लिए नकली रोशनी की है. तुम थोड़ा रुक जाओ.”लेकिन भूख से व्याकुल वीरवती ने भाभियों की बात नहीं मानी. उसने पेड़ पर चमकते उस नकली दीपक को ही चंद्रमा समझकर अर्घ्य दे दिया और व्रत तोड़कर भोजन करने बैठ गई. जैसे ही उसने भोजन का पहला कौर (निवाला) मुंह में डाला, उसे छींक आ गई. दूसरा कौर डाला, तो उसमें बाल निकला. और जैसे ही उसने तीसरा कौर मुंह में डाला, तभी उसके ससुराल से संदेश आया कि उसके पति (राजा) अत्यंत बीमार हैं और मृत्यु के करीब हैं. यह दुखद समाचार सुनते ही वीरवती रोती-बिलखती हुई तुरंत अपने ससुराल की ओर दौड़ी. रास्ते में उसकी मुलाकात माता पार्वती और भगवान शिव से हुई. वीरवती ने माता पार्वती के पैर पकड़ लिए और अपने पति के जीवन की भीख मांगने लगी. माता पार्वती ने उसे करुणा भाव से देखा और कहा, “पुत्री! तुमने अनजाने में ही सही, लेकिन छल से निकले नकली चांद को अर्घ्य देकर अपना व्रत तोड़ा है, जिसके कारण तुम्हारे पति की यह दशा हुई है.”वीरवती को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने माता से क्षमा याचना की. तब माता पार्वती ने द्रवित होकर उसे आशीर्वाद दिया और कहा, “तुम्हारे पति के प्राण बच जाएंगे, लेकिन इसके लिए तुम्हें पूरे एक वर्ष तक हर महीने आने वाली चतुर्थी का व्रत पूरी निष्ठा से करना होगा और अगले वर्ष आने वाले करवा चौथ का व्रत पूरे नियमों के साथ निर्जला रखना होगा. तुम्हारे ऐसा करने से तुम्हारा पति पुनः पूर्णतः स्वस्थ हो जाएगा.”माता पार्वती के कहे अनुसार, वीरवती ने पूरे नियम और सच्ची श्रद्धा के साथ व्रत का पालन किया. उसके इस कड़े तप और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव और माता पार्वती ने उसके पति को दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य का वरदान दिया. वीरवती का सुहाग पुनः लौट आया.
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