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Religion

श्रीकृष्ण की 64 कलाएं और 16 विद्या के बारे में जानें…

DB News
Last updated: 06/09/2026 11:48 AM
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9 Min Read
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सिंहस्थ कुंभ जाने से पहले ही जानें भगवान श्रीकृष्ण  की शिक्षा-दीक्षा स्थल, मध्य प्रदेश के उज्जैन में कहां है ये दर्शनीय स्थल

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

64 Kalas of Lord Krishna: उज्जैन संदीपनी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने 64 कला सीखा था और विद्या अध्ययन किया था. जिसका उल्लेख आज भी संदीपनी आश्रम उज्जैन की कलादीर्घा में देखने को मिल रहा है. यहां श्रीकृष्ण की लीलाओं का चित्रण पर्यटन विकास निगम द्वारा करने की कोशिश की गई है. सिंहस्थ कुंभ मेला 2028 में जो भी भक्त देश-विदेश से श्रीकृष्ण की बाल लीला के बारे में जानना चाहते हैं और अपने बच्चों को श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए गुणों से परिचित कराना चाहते हैं. वे संदीपनी आश्रम में जरूर एक बार जाना चाहिए और उन्हें श्रीकृष्ण के कला और विद्या का अध्ययन कराना चाहिए. इससे आपके बच्चे में भी श्रीकृष्ण के संस्कार परिलक्षित हो सकते हैं. भगवान श्रीकृष्ण की 16 प्रकार की विद्या और 64 कला के बारे में अपनी नवयुवा पीढ़ी को अवगत कराने से युवाओं में डर, झंझावात, अवसाद और तनाव जैसी स्थिति निर्मित नहीं होगी.

Contents
सिंहस्थ कुंभ जाने से पहले ही जानें भगवान श्रीकृष्ण  की शिक्षा-दीक्षा स्थल, मध्य प्रदेश के उज्जैन में कहां है ये दर्शनीय स्थलBy : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थीये हैं भगवान श्रीकृष्ण की 64 कलाएं… 

ये हैं भगवान श्रीकृष्ण की 64 कलाएं…

गीत

गाना चार प्रकार का होता है। स्व, पद, शब्द, लय और चितत अवधान या ध्यान उसके केन्द्र में हैं।

वाद्य

घन, वतत, सुधिर, कांस्य, पुष्कर, तन्त्री (तार वाली वीणादि), वेणु (वंशी) आदि वाद्य। चमड़े के तार वाले झांझ आदि पीटकर बजने वाले वाद्य होते हैं।

नृत्य

करण, अंगहार, विभाव, भाव, अनुभाव, रस आदि के संयोग से नृत्य होता है।

आलेख्य

इन छ: अंगो से चित्र बनता है- रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्य का संयोजन, मानता और कूची की भंगिमा। इनसे मनोविनोद होता है और अन्य के प्रति या उसका अनुराग भी उत्पन्न होता है।

विशेषकच्छेद्य

विशेषक नामक तिलक ललाट पर लगाते हैं। भोगपत्र आदि पत्तों पर उसे अनेक प्रकार से काटते हैं। इसलिए वह पत्रच्छेद्य भी कहलाता है। नाक जैसी आकृति के भी पत्रच्छेद्य बनते रहे। आदर प्रकट करने के लिए विशेषक कहते हैं। क्योंकि यह विलासिनियों का अत्यन्त प्रिय होता है।

तंडुलकुसुम वलिविकार

विभिन्न रंगों के बिना टूटे चावल से सरस्वती भवन या काम भवन की मणियों से बनी फर्श पर विभिन्न भात (डिजाइन) बनाना। रंग-बिरंगे गूंथे फूलों से शिवलिंग आदि और पूजा के लिए अनेक प्रकारकी भॉतें बनाना।

पुष्पास्तरण

रंग-विरंगे फूलों को सुई आदि से क्रमवद्ध करने का अभ्यास, इसका एक और नाम पुष्पशयन भी है, जो निवास घर के पूजास्थान या मंडप आदि में होता है।

दशनवसनांगराग

कुमकुम आदि रंग लगाना अंगराम है। युवतियों को दांत आदि रंगना प्रिय रहा है। दाँत, वस्त्र और अंगों को रंगा जाता है।

मणिभूमिका कर्म

कृत्रिम फर्श को मणिभूमिका कहते हैं। गर्मी के मौसम में सोने, पीने के लिए मरकत (पन्ना) आदि रत्नों से उसे बनाना।

शयन रचना

अवसर के अनुसार समय और मौसम की अपेयानुसार रागी-विरागी या सामान्य के प्रयोजन से आहार परिणाम के वश में होकर बिछौना बिछाना।

उदकवाद्य

जल पर मृदंग या ढोल जैसा बजाना। जलतरंगादि।

उदकाघात

हाथ की पिचकारी से पानी छोड़ना या पानी से मारना, दोनों जलक्रीड़ा हैं।

चित्राश्च योगा

विभिन्न प्रकार के दुर्भाग्य में एक इन्द्रिय का सफेद (कर बूढ़ा) करगा आदि ईर्ष्या से शत्रु को लक्ष्य कर क्रिया करना है।

माल्यग्रथन

माला, सिर की मालाएं देवता पूजन के लिए साज-सिंगार गूंथने के विविध प्रकार।

शेखरकापीडयोजन

सिर की शिखस्यान पर पहनने के कारण शेखर कहलाता है। उसे गोल बनाकर पहनते हैं। रंग-बिरंगे फूलों से बनाते हैं। नागर के नागरिकों का यह प्रमुख श्रंगार है।

नेपथ्य प्रयोग

देशकाल की अपेक्षानुसार वस्त्र, माला, आभूषणादि शरीर की सजावट है।

कर्णपत्रभंग

हाथी दांत, शंख आदि द्वारा कानों की पपड़ी सजाना।

गंन्धयुक्ति

सुगन्ध-शास्त्र के अनुसार विभिन्न गंध बनाना।

भूषणयोजन

अलंकार योग दो प्रकार का होता है- एक संयोजन वाला और दूसरा बिना संयोजन का। संयोजन कण्ठी के बीच छन्द आदि में मणि, मोती, मूंगे आदि लगाना। बिना संयोजन वाले कड़ा, कुण्डल आदि बनाना। ये दोनों सजावट के अंग हैं। शरीर का आभूषण पहनना नेपथ्य का अंग है।

ऐन्द्रजाल

इंन्द्रजाल (जादूगर) शास्त्र से उत्पन्न योग है। सेना, मंदिर आदि दिखाकर भुलावे में डालने के लिए होते हैं ये।

कौचुमार

कुचुमार तंत्र के अनुसार सौन्दर्यवृद्धि के प्रयोग।

हस्तलाघव

समस्त कामों में कर्म की शीर्घता जिससे समय अधिक लगे और लोगों को चकित करने के लिए हाथ की सफाई।

विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकारक्रिया

भिन्न-भिन्न प्रकार से साग-सब्जी, रस, भोजन बनाने की कला।

पानकरस-रागासवयोजन

दांतों से काट कर खाना, खाना, चाटना, पीना, ये चार प्रकार के आहार हैं। उनमें भी पना, रस आदि सहित भोजन बनाने की विधि।

सूचीवानकर्म

सुई से सीना, नये वस्त्र सीना, फटे वस्त्र सीकर जोड़ना, बिछौने सीना आदि।

सूत्रक्रीड़ा

हाथ के सूत से गन्दिरादि विभिन्न रूप बनाना।

वीणाडमरूकवाद्यानि

वीणा, डमरू आदि वाद्यों को ऐसे बजाना कि अक्षर स्पष्ट उनसे सुनाई दें।

प्रहेलिका

पहेली कहना और उसका अर्थ बताना।

प्रतिमाला

अम्त्याक्षरी-स्पर्धा की कुशलता।

दुर्वाचकयोग

जिनका शब्द-अर्थ के अनुसार उच्चारण कठिन हो। वह दुर्वाचक योग है।

पुस्तकवाचन

रस के अनुसार गीत और स्वर में आकर्षण उत्पन्न करने और आत्मविनोद के लिए पुस्तकों का वाचन।

नाटकाख्यायिकादर्शन

काव्य, नाटक, आख्याथिकादि गद्य-पद्य विधाओं का ज्ञान।

काव्यसमस्यापूरण

काव्य या छन्द के चरण पूरे करना। क्रीड़ा या वाद-विवाद प्रयोजन हो सकता है।

पटि्टकावेत्रवानविकल्प

खाट और आसन की बेंत द्वारा विभिन्न प्रकार की बुनाई।

तक्षकर्म

बर्तनों और गहनों पर मीनाकारी।

तक्षण

लकड़ी की कला हेतु बढ़ई का काम।

वास्तुविद्या

घर बनाना आदि कला।

रूप्यरत्नपरीक्षा

धातु, रत्न के गुण-दोष और मूल्य की परीक्षा।

धातुवाद

मिट्‌टी, पत्थर, रत्न, धातुओं को मिलाना, संशोधन करना आदि।

मणिरागाकरज्ञान

स्फटिक आदि मणियों को धन और आभूषण के लिए रंगने का विज्ञान। पद्मराग (लाल मणि) आदि के उत्पत्ति का (धन के लिए) ज्ञान।

वृज्ञायुर्वेद योग

गृहोधाम के लिए रोपना, पालन-पोषण करना, चिकित्सा में विधित्रता लाने की दक्षता।

मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि

भेड़, मुर्गे, शावकों को खेल या प्रतिस्पर्धा के लिए लड़ना।

शुकसारिका प्रलापन

तोता-मैना को मनुष्य की भाषा में बोलना सिखाना। सुभाषित पढ़ते या संन्देश कहते।

उत्सादन-संवाहन-केशमर्दन कुशलता

पैरों से मालिश, हाथों से शरीर और बालों की मालिश में कुशलता।

अक्षरमुष्टिका कथन

सांकेतिक अक्षरों के अर्थ जान लेना।

म्लेच्छित विकल्प

गुप्त भाषा के विविध रूप।

देशभाषा विज्ञान

गुप्त बात कहने के लिए उस देश से व्यवहार हेतु।

पुष्पशकटिका

फूलों का दकड़ा बनाना।

निमित्तज्ञान

शुभ-अशुभ शकुन का फल बताना।

यंत्रमातृका

यंत्र चलित और अन्य से चलित यंत्रों का ज्ञान, जल शंखाद हेतु बजाने का विज्ञान।

धारणमातृका

सुने हुए ग्रन्थ के स्मरण का शास्त्र।

संपाठ्य

मिलकर खोल या स्पर्धा के लिए एक व्यक्ति ग्रन्थ पढ़ता है और दूसरा उस असुने को भी उसके साथ वैसा ही पढ़ देता है।

मानसी

बिखरे अक्षरों से कमलादि आकृति के श्लोक बनाना। यह खेल और स्पर्धा दोनों के लिए होता है।

अभिधानकोष

शब्दकोष का ज्ञान।

छन्दोज्ञान

पिंगला आदि द्वारा बनाये गये छन्दों का ज्ञान।

क्रयाकल्प

पर काव्य समझने के लिए काव्यशास्त्र का ज्ञान।

छलितयोग

बहुरूपिया बनना। देव या अन्य रूप के रूप बनाकर छलना।

वस्त्रगोपन

छोटे कपड़े इस प्रकार से पहनना कि वे बड़े दिखें और बड़े छोटे दिखें।

द्यूतविशेष

विभिन्न प्रकार की द्यूतक्रीड़ाओं की कला।

आकर्षक्रीड़ा

पाँसे खेलना।

बालक्रीड़नक

बच्चों के लिए खेलने के लिए गुड़िया आदि का निर्माण।

वैनायिकी विद्या

विनय अथवा आचार की विद्या। हाथी आदि को वश में करना।

वैजयिकी विद्या

विजय दिलाने वाली विद्याएं। ये अपराजित आदि दैव्य और शास्त्रविद्या संग्राम की होती हैं।

व्यायामिकी

व्यायाम विद्या। ये तीन प्रकार की होती है- स्वयं की उन्नति, अन्य की रक्षा अथवा जीव के लिए (कामसूत्र से).

 

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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