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Religion

मंदिर की परिक्रमा और शिवलिंग की अर्धचंद्राकार प्रदक्षिणा का जानें रहस्य!

DB News
Last updated: 05/04/2026 10:11 PM
DB News
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7 Min Read
मंदिर परिक्रमा करने भगवान की कृपा प्राप्त होती है.
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भगवान शिव की आधी परिक्रमा करने का महत्व है, जबकि मंदिर की पूरी प्रदक्षिणा की जाती है. इसके पीछे केवल एक धार्मिक महत्व नहीं है, बल्कि भक्ति, ध्यान और कॉस्मिक संतुलन से जुड़ा गहरा आध्यात्मिक रहस्य है.

Source : DB News Update  

Contents
भगवान शिव की आधी परिक्रमा करने का महत्व है, जबकि मंदिर की पूरी प्रदक्षिणा की जाती है. इसके पीछे केवल एक धार्मिक महत्व नहीं है, बल्कि भक्ति, ध्यान और कॉस्मिक संतुलन से जुड़ा गहरा आध्यात्मिक रहस्य है.घड़ी की सुई की दिशा में करनी चाहिए परिक्रमासूर्य, चांद सहित सभी ग्रह घड़ी की दिशा में घूमते हैंभगवान की भक्ति और आदर को दर्शाता है चक्कर लगानाप्रदक्षिणा केवल रस्म नहींकितनी करनी चाहिए परिक्रमा –शिवलिंग की परिक्रमा आधी क्यों की जाती है?

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Mandir Mein Parikrama Ka Mehatv: परिक्रमा और प्रदक्षिणा का एक ही अर्थ है. देवता और मंदिर के चारों ओर घूमने की प्रक्रिया को परिक्रमा कहते हैं. ये श्रद्धा, समर्पण और आस्था प्रकट करने का प्रतीक है. मंदिरों या पवित्र वस्तुओं की परिक्रमा करना केवल एक परंपरा नहीं है. अपितु यह एक अनुष्ठान है. इस प्रकार की प्रदक्षिणा हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म में भी करने की प्रथा है. यह अपने इष्ट के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है. किसी मंदिर, देवता या पवित्र स्मारक की दक्षिणवर्त दिशा में ही परिक्रमा करना चाहिए. प्रदक्षिणा शरीर की गति को आध्यात्मिक अभ्यास और ईश्वर के निकट आने का एक माध्यम है.

घड़ी की सुई की दिशा में करनी चाहिए परिक्रमा

संस्कृत में प्रदक्षिणा का अर्थ है दाईं ओर घूमना. इससे तात्पर्य यह है कि, किसी पवित्र स्थान को अपने दायी ओर रखकर चारों ओर घूमना. यह प्रक्रिया हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में की जाती है. साधक पारंपरिक रूप से मंत्र पढ़ते या प्रार्थना करते हुए किसी मंदिर, किसी देवता की मूर्ति या किसी पवित्र पेड़ या पत्थर की परिक्रमा करते हैं. शास्त्रों के मुताबिक मंदिर की परिक्रमा करते समय भगवान व्यक्ति के दाएं हाथ की ओर होने चाहिए. परिक्रमा घड़ी की सुई की दिशा में करनी चाहिए.

सूर्य, चांद सहित सभी ग्रह घड़ी की दिशा में घूमते हैं

सूर्य, चांद और ग्रह आसमान में घड़ी की दिशा में घूमते हैं, जो समय की कुदरती लय और बहाव को दर्शाता है. इस कारण जब भी किसी पवित्र जगह पर जाएं, उसके सामने घड़ी की दिशा में घूमें. उनकी चाल और एनर्जी को कुदरती बहाव और कॉस्मिक ऑर्डर के साथ सिंक्रोनाइज करें. माना जाता है कि, यूनिवर्स के साथ यह तालमेल फायदेमंद एनर्जी, तालमेल और शुभता को प्रदर्शित करता है.

भगवान की भक्ति और आदर को दर्शाता है चक्कर लगाना

भगवान के दाईं ओर चक्कर लगाने का यह तरीका भक्ति और आदर को दर्शाता है. इष्ट के प्रति यह दिखाता है कि, साधक अपने जीवन के सभी चरणों में भगवान की मौजूदगी और मार्गदर्शन को मानता है. भगवान के साथ दाईं ओर जाने का मतलब है कि पवित्र चीज हमेशा पास है, यह मानने वाले की जिंदगी की यात्रा की रक्षा और मार्गदर्शन करती है.

प्रदक्षिणा केवल रस्म नहीं

  • प्रदक्षिणा केवल एक रस्म नहीं है, यह आध्यात्मिक और मानसिक रूप मजबूती देती है.
  • घड़ी की दिशा में गोल आकार में घूमने से ध्यान और मेडिटेशन की स्थिति उत्पन्न होती है.
  • भक्तों के मन को शांत करती है और उन्हें आध्यात्मिक मूल्यों पर ध्यान लगाने में मदद करती है.
  • यह प्रक्रिया जीवन के चक्र की भी याद दिलाती है.
  • एक चक्र में घूमने की शारीरिक गतिविधि के जरिए प्रतीकात्मक रूप से अमर चक्र और आध्यात्मिक मार्ग पर अपने जीवन को जोड़ते हैं, जिससे ज्यादा आत्म जागरुकता और चेतना प्राप्त होती है.
  • प्रदक्षिणा करने से शारीरिक समर्पण और कमिटमेंट को मानने वाले खुद को खुद से परे चीज से करीब से जुड़ा हुआ पाते हैं.
  • प्रदक्षिणा एक इमोशनल प्रार्थना है, जो खुद को यूनिवर्सल और क्लेक्टिव से जोड़ती है और शांति और धार्मिक संतुष्टि का एहसास कराती है.

कितनी करनी चाहिए परिक्रमा –

  • श्रीकृष्ण की 3 परिक्रमा करनी चाहिए.
  • देवी भगवती की 1 परिक्रमा करनी चाहिए.
  • भगवान विष्णुजी एवं उनके सभी अवतारों की 4 परिक्रमा करनी चाहिए.
  • श्रीगणेशजी और हनुमानजी की 3 परिक्रमा करने का विधान है.
  • शिवजी की आधी परिक्रमा करनी चाहिए, क्योंकि शिवजी के अभिषेक की धारा को लाघंना अशुभ माना जाता है.
  • वट सावित्री में पति की दीर्घायु और बेहतर स्वास्थ के लिए महिलाएं व्रत रखती हैं. इस दिन वट के पेड़ की तीन से एक सौ आठ परिक्रमा लगती है. जो महिलाओं की खुशी और स्वास्थ के लिए भी फायदेमंद होती है.
  • माता लक्ष्मी, भगवान विष्णु और पित्रों को खुश करने और इनकी छाया प्राप्त करने के लिए इनकी कम से कम 3 परिक्रमा करनी चाहिए.
  • गायत्री मंत्र का जप करने वाला कोई भी इंसान, श्राद्ध लेने वाला पंड़ित और मार्जन के जानकर इंसान को खाना खिलाकर इनकी 4 परिक्रमा करनी चाहिए.
  • पीपल के पेड़ की एक, तीन, एक सौ आठ और एक सौ एक परिक्रमा करने का प्रावधान है.

शिवलिंग की परिक्रमा आधी क्यों की जाती है?

शिवलिंग का निचला भाग “ब्रह्मा भाग”, मध्य भाग “विष्णु भाग” और ऊपरी गोल भाग “रुद्र भाग” कहलाता है. लिंग के पिछले भाग को (जहां से जल निकलता है) ‘यम दिशा’ कहा जाता है और वह गौमुख कहलाता है. शास्त्रों में वर्णित है कि गौमुख के पीछे से जाना मृत्यु को आमंत्रण देने जैसा है, इसलिए शिव भक्त उस भाग की परिक्रमा नहीं करते.

वहीं, शिव महापुराण के रुद्र संहिता, अध्याय 11 में बताया गया है कि शिव की परिक्रमा करते समय गौमुख से दूर रहना चाहिए, क्योंकि यह मृत्यु मार्ग का प्रतीक है.

शिव महापुराण के अनुसार शिवलिंग के चारों ओर घूमना वर्जित है. गौमुख को पारकर परिक्रमा करने से दोष लगता है और पूजा निष्फल हो जाती है.

पद्म पुराण के अनुसार, शिवलिंग की परिक्रमा बाएं से शुरू कर अर्धचंद्राकार (आधे चक्र) में दाहिनी ओर समाप्त करनी चाहिए.यह आस्था, सुरक्षा और मर्यादा का प्रतीक है.

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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