हाईकोर्ट ने मंत्री विजय शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए विवादित बयान पर लिया स्वतः संज्ञान लिया है.
Source : MEDIA
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
MP High Court On Vijay Shah: कर्नल सोफिया पर विवादित बयान देने पर कैबिनेट मंत्री विजय शाह पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट सख्त हो गया है. अदालत ने विजय शाह पर चार घंटे में एफआईआर दर्ज करने को लेकर डीजीपी को निर्देश दिए हैं. हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि हर हाल इस मामले पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए.
हाईकोर्ट में जस्टिस अतुल श्रीधरन की डिवीजन बेंच ने कहा है कि विजय शाह पर एफआईआर तत्काल दर्ज होनी चाहिए. बेंच ने कहा कि कल सुबह सबसे पहले इस मामले पर अगली सुनवाई करेंगे.
‘विजय शाह पर देशद्रोह का मामला दर्ज हो’
बता दें कि मंत्री विजय शाह के बयान से बवाल मचा हुआ है. बुधवार (14 मई) को पीसीसी चीफ जीतू पटवारी समेत कांग्रेस का प्रतिनिधि मंडल श्यामला हिल्स थाने पहुंचा. कांग्रेस ने उठाई विजय शाह के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने की मांग की है. कांग्रेस गुरुवार (15 मई) को मध्य प्रदेश के सभी थानों में कल शिकायती आवेदन भी देगी.
एक मिनट भी पद रहने का हक नहीं- कांग्रेस
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मंत्री विजय शाह के बयान पर मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि विजय शाह ने सेना का अपमान किया है और उन्हें एक मिनट भी मंत्री पद पर रहने का अधिकार नहीं है. उनके बयान से देश के लोग खुश नहीं हैं. हमने श्यामला हिल्स थाने में इसको लेकर आवेदन दिया है साथ ही हमने प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री मोहन यादव को भी पत्र लिखा है.
संदेश देने का छिपा है उद्देश्य
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा 15 मई 2025 को दिए गए आदेश को हालिया समय की सबसे कड़ी न्यायिक दखल में से एक माना जा सकता है, जो संस्थागत हेरफेर और राजनीतिक दंडमुक्ति (इम्प्युनिटी) के खिलाफ साफ और तीखा संदेश देता है. यह आदेश उस दिन के ठीक बाद आया जब कोर्ट ने बीजेपी मंत्री कुंवर विजय शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था. शाह ने सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणी करते हुए उन्हें “आतंकवादियों की बहन” बताया था. हालांकि, कोर्ट ने पाया कि राज्य पुलिस ने एफआईआर को जानबूझकर इतना अपूर्ण और अस्पष्ट तरीके से दर्ज किया कि वह खुद रद्द होने योग्य हो गई. पीठ ने इसे “गंभीर धोखाधड़ी” (gross subterfuge) बताते हुए स्पष्ट किया कि यह न्यायिक निगरानी को निष्क्रिय करने का एक प्रयास लगता है.
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए टिप्पणी की कि दर्ज की गई एफआईआर अभियोजन के लिए नहीं, बल्कि संरक्षण के उद्देश्य से बनाई गई लगती है. न्यायालय ने खास तौर से इस ओर ध्यान दिलाया कि एफआईआर के पैरा 12 जहां मंत्री के कथित कृत्यों और उनके अपराध स्वरूप को स्पष्ट किया जाना था वहां केवल न्यायालय के पिछले दिन के आदेश के अंतिम पैरा को ही यथावत् दोहरा दिया गया और सभी तथ्यात्मक व कानूनी तर्कों को जानबूझकर हटा दिया गया. न्यायालय ने चेतावनी दी कि यह चूक एफआईआर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (जो अब धारा 482 सीआरपीसी का स्थान ले चुकी है) के अंतर्गत रद्द कराए जाने का रास्ता तैयार करती है, जिससे पूरी न्यायिक प्रक्रिया निष्प्रभावी हो सकती है.
15 मई की सुनवाई से यह साफ हो गया कि न्यायालय को राज्य पुलिस पर शक है कि वह मौजूदा कैबिनेट मंत्री के खिलाफ स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करेगी या नहीं. कोर्ट ने बिना किसी संकोच के यह कहा कि ऐसा लगता है कि पूरा मामला पुलिस जानबूझकर प्रक्रिया को कमजोर कर रही है और कहीं न कहीं सरकार की तरफ से किसी तरह का संरक्षण भी दिया जा रहा है. हालांकि, कोर्ट ने किसी भी अधिकारी का नाम नहीं लिया जो इस “लापरवाही” के लिए जिम्मेदार था, लेकिन यह जरूर कहा कि अब आगे की कार्रवाई में यह देखा जाएगा कि एफआईआर तैयार करने में किसकी भूमिका रही.
जांच में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए हाईकोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि 14 मई को जो आदेश दिया गया था उसे अब एफआईआर का हिस्सा माना जाएगा. साथ ही कोर्ट ने ये भी साफ किया कि अब वो खुद इस मामले की निगरानी करेगा ताकि यह केस फाइलों में न दबाया जाए या किसी राजनीतिक दबाव में गायब न हो जाए. कोर्ट ने साफ कहा कि ये फैसला सिर्फ प्रक्रियात्मक सुधार नहीं है. यह एक मजबूत संदेश है कि जब किसी बड़े ओहदे पर बैठा इंसान नफरत फैलाने वाली बातें करता है या सांप्रदायिक जहर घोलता है, तो अदालत ऐसे मामलों में चुप नहीं बैठेगी.
