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DB News Update | Divya Bhumi News > Blog > Religion > नर्मदा के इस तट पर भगवान श्रीराम ने की थी तपस्या! जानें कहां…
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नर्मदा के इस तट पर भगवान श्रीराम ने की थी तपस्या! जानें कहां…

DB News
Last updated: 11/09/2026 10:15 PM
DB News
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12 Min Read
नर्मदा के उत्तर तट पर भगवान राम ने 10 वर्ष व्यतीत किए हैं.
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एमपी जबलपुर के नर्मदा तट पर भगवान राम ने बिताए हैं 10 वर्ष, भृगु क्षेत्र की पवित्र भूमि पर यज्ञ, हवन पूजन और उत्सव मनाने से मिलता है मनोवांछित फल

Source : DB News Update  

Contents
एमपी जबलपुर के नर्मदा तट पर भगवान राम ने बिताए हैं 10 वर्ष, भृगु क्षेत्र की पवित्र भूमि पर यज्ञ, हवन पूजन और उत्सव मनाने से मिलता है मनोवांछित फलनर्मदा पूजन करने का शुभ मुहूर्तपुराणों में ऐसा है नर्मदा तट भृगु क्षेत्र का वर्णन

By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी

Narmada Jayanti 2026 Date and Shubh Muhurat: नर्मदा प्राकट्य उत्सव मनाने वाले भक्तों में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है. क्योंकि जीवनदायनी मां नर्मदा न केवल हमारी भूमि को अभिसिंचित करती हैं. बल्कि हमें धन-धान्य से परिपूर्ण करती हैं. ऐसी कृपामयी मां नर्मदा का सानिध्य प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने भी 10 वर्षों तक भृगु तट पर बिताए हैं. भगवान राम ने जिस क्षेत्र में आश्रय प्राप्त किया और मां नर्मदा के तट पर तपस्या की. ऐसे स्थान पर मां नर्मदा का जन्मोत्सव मनाना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है. नर्मदा की इस क्षेत्र में दान, यज्ञ, हवन, पूजन आदि करने का फल कई गुना बढ़ जाता है. जब बात नर्मदा उत्सव के मनाने की हो तो ऐसी स्थिति में नर्मदा का भृगु क्षेत्र अत्यंत लाभप्रद रहेगा. आइए हम नर्मदा तट के उसी भृगु क्षेत्र के संबंध में विस्तार से बताने जा रहे हैं. जहां नर्मदा जयंती मनाने से मनोवांछित फल का प्राप्ति होगी. इस क्षेत्र का वर्णन न केवल पुराणों में मिलता है, बल्कि तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस की चौपाइयों में भी है.

नर्मदा पूजन करने का शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार नर्मदा जन्मोत्सव 25 जनवरी 2026 को माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को है. अमरंकटक नर्मदा के उद्गुम स्थल से लेकर भरूच गुजरात तक मां नर्मदा का जन्मोत्सव बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाएगा. नर्मदा पूजन के लिए शुभ समय 25 जनवरी को रात 12 बजकर 39 मिनट से 11 बजकर 10 मिनट तक है.

पुराणों में ऐसा है नर्मदा तट भृगु क्षेत्र का वर्णन

जगद्गुरु डॉ स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज ने नर्मदा कुंभ के औचित्य के संबंध में विस्तार से वर्णन किया है और उन्होंने नर्मदा के तट पर भगवान श्रीराम के निवास को लेकर एक पुस्तक “नर्मदा तट पर श्रीराम का वास” में व्याख्या की है। उन्होंने अपनी पुस्तक में जिक्र किया कि “भगवान राम सीता और लक्ष्मण जी के साथ चित्रकूट से चलकर अत्रि अनसुइया जी के आश्रम में निवास करते हैं और वहाँ से विदा होकर घनघोर जंगल में आगे बढ़ते हैं । मार्ग में विराध राक्षस का वध करके शरभंग मुनि के आश्रम में पहुंचकर मुनि से मिलते हैं। मुनि शरभंग जी ने श्री राम जी के सन्मुख ही योगाग्नि के द्वारा शरीर का त्याग कर देते हैं ।

प्रविश्यतु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्। रामो ददर्श दुर्घर्षस्तापसाश्रममण्डलम् ॥ – वा.रा. ३/१/१

हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने । आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह ।। – वा.रा. ३/१/१

भगवान श्री राम ने शरभंग मुनि से अपने निवास के लिये स्थान पूछते है और तब मुनि ने कहा-प्रभो आप मंदाकिनी नदी के उद्गम की ओर जायें वहाँ आपको सुतीक्ष्ण जी का आश्रम मिलेगा। वह आश्रम बहुत ही रमणीय है और आपके रहने के लिये बहुत ही अनुकूल है ।

सुतीक्ष्णोऽभिगच्छ त्वं शुचौ देशे तपास्विनाम् ।

रमणीये वनोद्देश्ये स ते बासं विधास्यति ।।

इमां मंदाकिनीम् राम प्रति स्रोतामनुव्रज । – वा.रा. ३/५/३६-३७

शरभंग जी के आश्रम में समवेत मुनि समुदाय ने भगवान राम का अभिनन्दन किया और राक्षसों के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की तथा प्रभु के साथ-साथ सुतीक्ष्ण जी के आश्रम तक गये ।

शरभंगे दिवं प्राप्ते मुनि संघा समागता । अभ्यगच्छंत काकुत्सं रामं ज्वलित तेजसम् ॥

भगवान राम ने सुतीक्ष्ण जी से रहने के लिए स्थान की इच्छा प्रगट की और सुतीक्ष्ण जी ने बड़ी विनम्रता से निवेदन किया कि प्रभो आप के लिए यह आश्रम सभी प्रकार से अच्छा रहेगा यहाँ मुनियों का संग रहेगा। यहाँ राक्षसों का भय भी नहीं रहेगा। मृगों का झुण्ड जरूर आता रहता हैं ।

अयमेवाश्रमों राम गुणवान् रम्यताम् इति । – वा.रा. ३/७/१७

भगवान राम ने एक रात्रि आश्रम में विश्राम किया और निश्चय किया कि यहाँ ज्यादा समय तक रहना ठीक नही होगा ।

एतास्मिन्नाश्रमे वासं चिरं तु न समर्थये ।। – वा.रा.३/७/२२

प्रातः काल श्री राम ने सुतीक्ष्ण मुनि से मुनियों के साथ जाने के लिए आज्ञा मांगते हैं ये सब वही मुनि हैं जो शरभंग आश्रम से श्रीराम जी के साथ-साथ आये हैं और अपने-अपने आश्रमों में ले जाने के लिये आतुर हैं और भगवान भी –

सकल मुनिन्ह के आश्रमहि जाइ-जाइ सुख दीन्ह । – मानस ३ / ९

सुखोषिताः स्म भगवन्स्त्वया पूज्येन पूजिताः ।

आपृच्छामः प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति नः ।। – वा.रा. ३/८/५

अरिष्टं गच्छ पन्थानं राम सौमित्रिणा सह ।

सीतया चानया सार्थ्य छाययेवानुतृत्तया ।। -वही ३/८/११

पश्याश्रमपदं रम्यं दण्डकारण्य वासिनाम्।। – वही ३/८/११

गम्यतां वत्य सौमित्रे भवानपि च गच्छतु ।

आगन्तव्यं च ते दृष्टवा पुनरेवाश्रमं प्रति ।। – वही ३/८/१६

सुतीक्ष्ण जी ने कहा- राम ! लक्ष्मण और सीता के साथ जाओं । तुम्हारा मार्ग, तुम्हारी यात्रा सभी प्रकार के विघ्न बाधाओं से मुक्त हो । दण्डकारण्य निवासी ऋषियों के आश्रम बहुत ही रमणीय हैं। उन सब आश्रमों का दर्शन करो और फिर मेरे इस आश्रम में लौट के आओ।

निर्मितं तपसा राम मुनिना माण्डकार्णिना ।। – बा.रा. ३/११/१९

वर्तमान का मैहर ही माण्डकर्णि मुनि का आश्रम रहा होगा और आगे चलकर भगवान ने नृसिंह पर्वत के ऊपर माँ शारदा का दर्शन करते है। माता सीता जी ने माँ शारदा की पूजा की और लक्ष्मण समेत प्रभु के लिये कुशल क्षेम की याचना की।

सुतीक्ष्ण आश्रम से जाबालिपुरम् तक ऋषियों मुनियों के अनेक आश्रम बने हुए थे। दण्डकारण्य का यह हिस्सा नर्मदा खण्ड (रेवा खण्ड) के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र राक्षसों के आतंक से रहित रहा होगा तभी तो अनेकों ऋषि-मुनि यहाँ सुरक्षित रूप से तप कर रहे थे। श्री राम चन्द्र जी बारी-बारी से उन सभी तपस्वी मुनियों के आश्रमों पर गये ।

जगामचाश्रमांस्तेषां पर्यायेण तपस्विनाम् । – वा.रा. ३/११/२३

कहीं दश महीने, कहीं साल भर, कहीं चार महीने, कहीं पाँच या छः महीने, कहीं सात महीने, कहीं आठ महीने, कहीं साढ़े आठ महीने, कहीं तीन महीने और कहीं ग्यारह महीने तक श्री रामचन्द्र जी ने सुख पूर्वक निवास किया।

क्वचित् परिदशान् मासानेक संवत्सरं क्वचित् ।

क्वचिच्च चतुरो मासान् पञ्चषट् च परान् क्वाचित् ।।

अपरत्राधिकान् मासानध्यर्धमाधिकं क्वाचित्।

त्रीन् मासानष्टमासाञ्च राघवोन्यवसत सुखम् ।। – वा.रा. ३/११/२४-२६

इस प्रकार भगवान श्री रामचन्द्र जी ने नर्मदा खण्ड के मुनियों के आश्रमों में पाँच वर्ष तक निवास करते रहे ।

एक बात और स्मरणीय है कि भरत जी के साथ जाबालि मुनि भी चित्रकूट आये हुए थे। जाबालि ऋषि चक्रवर्ति महाराज दशरथ के मंत्रि परिषद के सदस्य है। भगवान राम जब धर्म पालन को ही सर्वोपरि मानते हुए श्री अवध न लौटने के प्रति आग्रहवान थे, तब राम के प्रति अत्याधिक मोह और प्रेम के कारण चार्वाक्मत का प्रतिपादन करते हैं और श्री राम जी को धर्म पालन न करने की प्रेरणा देते है तथा अयोध्या जी लौटने का आग्रह करते हैं ।

परन्तु, भगवान राम पर उसका कोई असर नहीं हुआ और उल्टे भगवान राम ने क्रोध पूर्वक महर्षि जाबालि की कटु आलोचना करते हैं।

यद्यपि गुरु वशिष्ठ जी ने महर्षि जाबालि का पक्ष लेते हुए प्रभु राम को शांत किया और कहा कि जाबलि ऋषि नास्तिक नहीं हैं राम ! तुम्हारे प्रेम के कारण मुनि तुम्हें वनवास में दुःखी नही देखना चाहते हैं और तुम धर्म के नाम पर वन जाने के लिये अडिग हो । महर्षि जाबालि तुम्हें लौट चलने के लोभ के कारण नास्तिक बनने का नाटक कर रहे हैं।

दृष्टव्य – वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड

भगवान राम के रुष्ट हो जाने पर महर्षि जाबालि को बहुत पश्चाताप हुआ और वे भरत के साथ अयोध्या वापस नहीं गये। अपितु अपने इस कृत्य का प्रायश्चित करने के लिये नर्मदा जी के तट पर आ गये। रेवा तीरे तपं कुर्यात् । की उक्ति को महर्षि जाबलि ने जहाँ पर चरितार्थ किया उसी का नाम जाबालिपुरम् है ।

अत्यधिक ग्लानि के कारण महर्षि जाबालि माँ रेवा का प्रतिदिन दर्शन और स्नान करते और एकांत में सघन जंगल में जाकर तपस्या करते हैं। महर्षि जहाँ पर तप करते थे भगवान शिव की उपासना-आराधना करते थे आज वही स्थान गुप्तेश्वर शंकर जी के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री राम ने भी कुछ दिनों तक सीता और लक्ष्मण के साथ भगवान श्री गुप्तेश्वर जी का अभिषेक और पूजन किया है।

भगवान राम का मुनियों के आश्रमों में भ्रमण करते हुए नर्मदा तट तक आने का एक प्रयोजन यह भी है -महर्षि जाबलि का पता लगाना।

पाँच वर्षों तक मुनियों के आश्रमों में निवास करते हुए प्रभु नर्मदा तट पर आये जहाँ उनकी भेंट महर्षि जाबालि से होती हैं और भगवान श्री राम ने भी पुण्य सलिसा नर्मदा के पावन तट पर पर्णशाला बनाकर लक्ष्मण और सीता के साथ सुख पूर्वक रहने लगे।

मेरा अनुमान है कि वनवासी श्रीराम की पर्ण कुटी जहाँ बनी रही होगी उसी स्थान पर नर्मदा गौ कुम्भ के रूप में विराट संत सम्मेलन हो रहा हैं। यदि यहाँ श्री राम का वास नहीं हुआ होता तो इतनी अधिक मात्रा में सिद्ध प्रसिद्ध संतों का निवास यहाँ पर कभी नहीं होता ।

बीच विंध्य रेवा सुपास थल वसे है परन गृह छाई । पंथ कथा रघुनाथ पथिक की तुलसिदास सुनि गाई ।। – गीतावली २/८९

महर्षि वाल्मीक के अनुसार रेवा तट पर निवास करते हुए श्री राम के वनवास के दश वर्ष बीत जाने पर भगवान श्री राम पुनः सुतीक्ष्ण जी के आश्रम में लौट आये और यहाँ से श्री नर्मदा जी की अर्ध परिक्रमा करते हुए अगस्त जी के आश्रम की ओर चल दिये।

तत्र संवसतस्तस्य मुनीनामाश्रमेषु च । रमतश्चानुकूल्येन ययुः सम्वत्सरा दश ।। परिसृत्य च धर्मज्ञो राघवः सहसीतया ।

सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं पुनरेवा जगाम ह।। – वा.रा. ३/११/२६-२७

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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