कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर देवी तुलसी और भगवान विष्णु (शालीग्राम) का विवाह संपन्न होगा. इस साल तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर 2026 को पड़ रही है.
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By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Tulsi Vivah 2026 Kab Hai: तुलसी पूजन के साथ ही हिंदू धर्म में तुलसी विवाह को भी महत्वपूर्ण माना जाता है. इसमें भगवान विष्णु के शालीग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह कराया जाता है. हर साल यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर मनाया जाता है, जोकि इस वर्ष 21 नवंबर को पड़ रही है. कुछ लोग देवउठनी एकादशी 20 नवंबर के दिन भी तुलसी विवाह करते हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि 21 नवंबर को तुलसी विवाह का आयोजन सबसे उत्तम है.
पूजन करने का क्या है फल?
तुलसी विवाह पूजन घर के आंगन या बालकनी आदि में किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि तुलसी पूजन करने से घर पर सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. विवाहित महिला यदि यह पूजा करती है तो, उसके वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहती है.
शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ महीने की देवश्यनी एकादशी से ही भगवान विष्णु चार माह के लिए क्षीर सागर में योगनिद्रा के लिए चले जाते हैं और कार्तिक माह की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं. भगवान विष्णु के जागते ही दूसरे दिन यानी द्वादशी तिथि पर तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है.
तुलसी विवाह के संबंध में पौराणिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, असुरों के राजा जलंधर की पत्नी वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी. जलंधर के वध के लिए भगवान विष्णु को वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करना पड़ा. जलंधर की मृत्यु के बाद वृंदा ने शरीर त्याग दिया. वृंदा ने जहां अपना शरीर त्यागा, वहां तुलसी का पौधा उग आया. भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि उसका उनके शालिग्राम (Shaligram) रूप से विवाह होगा और तुलसी के बिना उनकी पूजा अधूरी रहेगी. इसीलिए कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को तुलसी का शालिग्राम से विवाह कराया जाता है.
तुलसी विवाह में इन बातों का रखें ध्यान
- तुलसी विवाह की पूजा शुभ मुहूर्त में ही करनी चाहिए.
- तुलसी विवाह पर तुलसी में जल के साथ ही दूध और पुष्प मिलाकर चढ़ाना शुभ होता है.
- तुलसी विवाह पर महिलाओं को व्रत रखना चाहिए.
- तुलसी विवाह में तुलसी को श्रृंगार के सामान के साथ ही लाल चुनरी भी जरूर चढ़ाएं.
तुलसी विवाह की विशेष पूजा विधि
घर के आंगन या छत पर जहां तुलसी का पौधा है, उस स्थान को अच्छे से साफ करें और वहां रंगोली बनाएं.
तुलसी के गमले के चारों तरफ चार गन्ने खड़े करके एक सुंदर मंडप या शामियाना तैयार करें.
गमले पर गेरू और हल्दी से स्वास्तिक का चिह्न बनाएं.
तुलसी माता को लाल रंग की ओढ़नी या चुनरी उड़ाएं.
उन्हें चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेंहदी, बिछिया जैसी सुहाग की सामग्री अर्पित करें.
एक चौकी पर साफ पीला या लाल कपड़ा बिछाएं.
भगवान शालिग्राम (विष्णु जी का स्वरूप) या उनकी मूर्ति को चौकी पर स्थापित करें. उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं.
शालिग्राम जी को सिंहासन सहित उठाकर तुलसी जी के गमले के दाईं ओर (right side) रखें.
भगवान शालिग्राम और तुलसी जी को तिलक (हल्दी और कुमकुम) लगाएं.
दोनों को फल, फूल, धूप, और दीप अर्पित करें.
एक साफ पीले कपड़े या कलावा (मौली) की मदद से तुलसी माता और शालिग्राम जी का गठबंधन (गांठ) बांधें.
भगवान शालिग्राम की मूर्ति या चौकी को हाथ में लेकर तुलसी जी के पौधे की सात बार परिक्रमा (फेरे) कराएं.
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते रहें.
इस दिन विशेष रूप से पूड़ी, खीर, शकरकंद, सिंघाड़ा, और मौसमी फलों का भोग लगाया जाता है.
पूजा के अंत में कपूर से तुलसी माता और भगवान शालिग्राम की सयुक्त आरती करें और सुख-समृद्धि की कामना करें.
तुलसी विवाह के पारंपरिक लोकगीत
आज तुलसी का ब्याह रचाया है, शालिग्राम दूल्हा बन आए हैं.
सज गई देखो सारी अयोध्या, देवों ने फूल बरसाए हैं.
पहनी है मैया ने लाल चुनरिया, हाथों में रची है हरी मेंहदी.
भोले बाबा भी आए बारात में, गणपति ने मंगल गाए हैं.
आज तुलसी का ब्याह रचाया है…
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