भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि काम करें, पर मैंने किया इसका अहंकार ना पालें, वही सही सेवक है.
Source : MEDIA
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
नागपुर : लोकसभा चुनाव परिणामों के तुरंत बाद ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर एक साल से हिंसा की आग में जल रहा है। मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है। इसे प्राथमिकता से करने पर विचार करना चाहिए। भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि काम करें, पर मैंने किया इसका अहंकार ना पालें, वही सही सेवक है। संघ प्रमुख के इस संबोधन को केंद्र की मोदी सरकार के लिए बड़े मैसेज के तौर पर देखा जा रहा है।
चुनाव सहमति बनाने की प्रक्रिया
संघ प्रमुख ने कहा कि चुनाव सहमति बनाने की प्रक्रिया है। चुनाव प्रचार में एक दूसरे को लताड़ना, तकनीक का दुरुपयोग, असत्य प्रसारित करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि विरोधी की जगह प्रतिपक्ष कहना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि चुनाव के आवेश से मुक्त होकर देश के सामने उपस्थित समस्याओं पर विचार करना होगा। चुनाव लोकतंत्र में हर पांच साल होने वाली घटना है। हम अपना कर्तव्य करते रहते हैं लोकमत परिष्कार का। प्रतिवर्ष करते हैं, प्रति चुनाव में करते हैं, इस बार भी किया है।
मैंने सबकुछ किया, यह अहंकार न पालें
नागपुर में भागवत ने कहा कि चुनाव के आवेश से मुक्त होकर देश के सामने उपस्थित समस्याओं पर विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि अभी चुनाव संपन्न हुए, उसके परिणाम भी आए। सरकार भी बन गई, यह सब हो गया। लेकिन उसकी चर्चा अभी तक चलती है। जो हुआ वह क्यों हुआ, कैसे हुआ, क्या हुआ? यह अपने देश के प्रजातांत्रिक तंत्र में हर पांच साल में होने वाली घटना है। उसके अपने नियम हैं। डायनेमिक्स के अनुसार होता है, लेकिन यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है। समाज ने अपना मत दे दिया, उसके अनुसार सब होगा। क्यों, कैसे, इसमें हम लोग नहीं पड़ते। हम लोकमत परिष्कार का अपना कर्तव्य करते रहते हैं। हर चुनाव में करते हैं, इस बार भी किया है। बाकी क्या हुआ इस चर्चा में नहीं पड़ते।
सरकार को दिया बड़ा संदेश
भागवत ने कहा कि मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है। इस पर प्राथमिकता से उसका विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि हजारों सालों के भेदभावपूर्ण बर्ताव ने विभाजन की खाई बनाई और गुस्सा भी पैदा किया। उन्होंने कहा कि भगवान ने सबको बनाया है। भगवान की बनाई कायनात के प्रति अपना भावना क्या होनी चाहिए? ये सोचने का विषय है। संघ प्रमुख ने कहा कि जो मर्यादा का पालन करते हुए काम करता है, गर्व करता है किन्तु लिप्त नहीं होता है, अहंकार नहीं करता है, वही सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी है।
इन बातों पर गौर करने की जरूरत
संघ चुनाव नतीजों के एनालिसिस में नहीं उलझता लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद बाहर का माहौल अलग है। नई सरकार भी बन गई है। ऐसा क्यों हुआ, संघ को इससे मतलब नहीं है। संघ हर चुनाव में जनमत को परिष्कृत करने का काम करता है, इस बार भी किया, लेकिन नतीजों के विश्लेषण में नहीं उलझता।
लोगों ने जनादेश दिया है, सब कुछ उसी के अनुसार होगा। क्यों? कैसे? संघ इसमें नहीं पड़ता। दुनियाभर में समाज में बदलाव आया है, जिससे व्यवस्थागत बदलाव हुए हैं। यही लोकतंत्र का सार है।
चुनावी मुकाबला झूठ पर आधारित न हो जब चुनाव होता है, तो मुकाबला जरूरी होता है, इस दौरान दूसरों को पीछे धकेलना भी होता है, लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है – यह मुकाबला झूठ पर आधारित नहीं होना चाहिए। लोग क्यों चुने जाते हैं – संसद में जाने के लिए, विभिन्न मुद्दों पर आम सहमति बनाने के लिए। हमारी परंपरा आम सहमति बनाने की है।
संसद में सहमति बनाएं, विपक्ष को विरोधी नहीं, प्रतिपक्ष कहें संसद में दो पक्ष क्यों होते हैं? ताकि, किसी भी मुद्दे के दोनों पक्षों को संबोधित किया जा सके। किसी भी सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही हर मुद्दे के दो पहलू होते हैं। संसद में दो पक्ष जरूरी हैं। देश चलाने के लिए सहमति जरूरी है। संसद में सहमति से निर्णय लेने के लिए बहुमत का प्रयास किया जाता है, लेकिन हर स्थिति में दोनों पक्ष को मर्यादा का ध्यान रखना होता है। संसद में किसी प्रश्न के दोनों पहलू सामने आएं, इसलिए ऐसी व्यवस्था है। विपक्ष को विरोधी पक्ष की जगह प्रतिपक्ष कहना चाहिए।

