प्रत्येक अखाड़े के अपने नियम, शिक्षा-दीक्षा के आधार पर मिलता है पद और प्रतिष्ठा, कैसे होते हैं अखाड़ों के चुनाव? सबकुछ जानें
By : DB News Update | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Ujjain Simhastha Mela 2028: हिंदू धर्म में जिस जगह साधु-संत एकत्रित होते हैं. साधुओं के उस स्थान को अखाड़े का मठ कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि पहले इन अखाड़ों की संख्या चार हुआ करती थी. लेकिन आपसी मतभेद के चलते एक मत के साधुओं ने अपने अलग-अलग संगठन बना लिए. धीरे-धीरे अखाड़ों की संख्या बढ़कर 13 हो गई. कुंभ, अर्धकुंभ, महाकुंभ मेला के अवसर पर हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार साधु-संत एकत्रित होकर प्रमुख तिथियों पर गंगा, यमुना, क्षिप्रा, गोदावरी, सरस्वती में स्नान करते हैं. जिसे शाही स्नान कहा जाता है.
धर्म ध्वजा अखाड़ा की पहचान
धर्म ध्वजा अखाड़ा की पहचान होती है. कुंभ पर्व पर जहां अखाड़ों का शिविर लगता है, वहीं उनकी धर्मध्वजा भी लहराती रहती है. धर्म ध्वजा में अखाड़ा के आराध्य का चित्र अथवा धार्मिक चिह्न होता है, जबकि अखाड़ा के आराध्य की प्रतिमा शिविर के मुख्य स्थान में स्थापित होती है. फिलहाल देश में कुल 13 अखाड़े हैं, जिसमें 7 शैव, 3 बैरागी और 3 उदासीन अखाड़े हैं. ये अखाड़े देखने में एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनकी परंपराएं और पद्धतियां बिल्कुल भिन्न हैं. शैव अखाड़े जो शिव की भक्ति करते हैं, वैष्णव अखाड़े विष्णु के भक्तों के हैं और तीसरा संप्रदाय उदासीन पंथ कहलाता है. उदासीन पंथ के लोग गुरु नानक की वाणी से बहुत प्रेरित हैं, और पंचतत्व यानी धरती, अग्नि, वायु, जल और आकाश की उपासना करते हैं.
अखाड़ों के अपने अलग-अलग कानून
कुंभ में शामिल होने वाले सभी अखाड़े अपने अलग-अलग नियम और कानून हैं. साधुओं के जुर्म करने पर अखाड़ा परिषद सजा देता है. छोटी चूक के दोषी साधु को अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में 5 से लेकर 108 डुबकी लगाने के लिए भेजा जाता है. डुबकी के बाद वह भीगे कपड़े में ही देवस्थान पर आकर अपनी गलती के लिए क्षमा मांगता है. फिर पुजारी पूजा स्थल पर रखा प्रसाद देकर उसे दोषमुक्त करते हैं. विवाह, हत्या या दुष्कर्म जैसे मामलों में उसे अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है. अखाड़े से निकल जाने के बाद ही दोषी साधुओं पर भारतीय संविधान में वर्णित कानून के अनुसार मामला दर्ज होता है.
इन गलतियों पर अखाड़ा देता है सजा
- अगर अखाड़े के दो सदस्य आपस में लड़ाई-झगड़ा कर ले.
- कोई नागा साधु विवाह कर ले या दुष्कर्म का दोषी हो.
- छावनी के भीतर से किसी का सामान चोरी करते हुए पकड़ा जाए.
- देवस्थान को अपवित्र करे या वर्जित स्थान पर प्रवेश करे.
- कोई साधु किसी यात्री, यजमान से अभद्र व्यवहार करे.
- अखाड़े के मंच पर कोई अपात्र चढ़ जाए तो उसे अखाड़े की अदालत सजा देती है.
- अखाड़ों के कानून को मानने की शपथ नागा बनने की प्रक्रिया के दौरान दिलाई जाती है.
- अखाड़े का जो सदस्य इस कानून का पालन नहीं करता, उसे भी निष्काषित कर दिया जाता है.
कौन बन सकता है अखाड़े का साधु
अखाड़ों के अपने-अपने नियम हैं. यदि हम अटल अखाड़े की बात करें तो इसमें केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दीक्षा ले सकते हैं. कोई भी अन्य इस अखाड़े में नहीं आ सकता है. इसी तरह अवाहन अखाड़ा में अन्य अखाड़ों की तरह महिला साध्वियों को दीक्षा नहीं दी जाती है. निरंजनी अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा माना जाता है. इस अखाड़े में महामंडलेश्वरों की संख्या सैकड़ों में है. अग्नि अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते हैं. महानिर्वाणी अखाड़ा के पास महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा की जिम्मेदारी होती है. वहीं आनंद अखाड़ा, शैव अखाड़ा भी हैं, जिसमें आज तक एक भी महामंडलेश्वर नहीं बनाया गया है. इस अखाड़े में आचार्च का पद ही प्रमुख होता है. दिगंबर अणि अखाड़े को वैष्णव संप्रदाय में राजा कहा जाता है. इस अखाड़े में सबसे ज्यादा खालसा यानी 431 हैं. निर्मोही अनि अखाड़े में वैष्णव संप्रदाय के तीनों अनि अखाड़ों में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं. इनकी संख्या 9 है. निर्वाणी अनि अखाड़े में कुश्ती प्रमुख होती है. इसी वजह से इससे जुड़े कई संत पेशेवर पहलवान रह चुके हैं. उदासीन अखाड़े का उद्देश्य सेवा करना है. इस अखाड़े में केवल 4 मंहत होते हैं जो कभी कामों से निवृत्त नहीं होते है.
अखाड़ों में चुनाव
जूना अखाड़ा : 3 और 6 साल में चुनाव. 3 साल में कार्यकारिणी, न्याय से जुड़े साधुओं का. 6 साल में अध्यक्ष, मंत्री, कोषाध्यक्ष.
पंचायती निरंजनी अखाड़ा : पूर्ण कुंभ, अर्द्धकुंभ इलाहाबाद में छह-छह साल में नई कमेटी चुनते हैं.
पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा : 5 साल में पंच परमेश्वर चुनते हैं.
पंच दशनामी आवाहन अखाड़ा : 3 साल में रमता पंच. बाकी 6 साल में चुनाव.
पंचायती आनंद अखाड़ा : 6 साल में होते हैं चुनाव.
पंच अग्नि अखाड़ा : 3 साल में चुनाव.
पंच रामानंदी निर्मोही अणि अखाड़ा : 6 साल में चुनाव.
यहां नहीं होते चुनाव
पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा: पंच व्यवस्था नहीं. 4 महंत होते हैं, जो आजीवन रहते हैं, रिटायर नहीं होते.
पंचायती उदासीन नया अखाड़ा : एक बार बने तो आजीवन रहते हैं.
पंचायती निर्मल अखाड़ा: चुनाव नहीं होते, स्थाई चुनते हैं.
पंच दिगंबर अनि अखाड़ा: चुनाव नहीं. एक बार चुनते हैं. उन्हें असमर्थता, विरोध होने पर पंच हटाते हैं.
पंच रामानंदी निर्वाणी अनि अखाड़ा: एक बार चुने जाने पर आजीवन या जब तक असमर्थ न हो जाएं.


