सावन मास में भगवान शिव को प्रसन्न करने का अच्छा मौका है. करियर, विवाह, रोग मुक्ति, सुख-शांति सहित अनेक प्रकार की बाधाओं से मुक्ति पाएं.
Source : DB News Update
Written By : सुप्रिया | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Types of Shivling: भगवान शिव निराकार हैं. उनका कोई आकार नहीं है. इसलिए उनका पूजन प्रतीकात्मक रूप से करने का विधान है. शिव का दो स्वरूपों में दर्शन मिलते हैं. एक स्वयंभू और दूसरे निर्मित. प्राय: हम सभी निर्मित शिवलिंग का पूजन करते हैं. इसलिए निर्मित शिवलिंग का महत्व और पूजन करने से फल प्राप्ति का ज्ञान भी होना बहुत जूरूरी है. क्योंकि सावन मास में अधिकांश लोग पार्थिव शिवलिंग का पूजन-अर्चन करते हैं. पार्थिव का अर्थ है पृथ्वी से निर्मित शिवलिंग जिन्हें मिट्टी से बनाया जाता है. इन्हें मृत्तिका शिवलिंग भी कहा जाता है. पार्थिव शिवलिंग का पूजन करने से आत्मशांति, सद्बुद्धि और पापो का क्षय होता है. लेकिन यहां यह भी बताना जरूरी है कि शैलजा, धातुजा, रत्नजा और दारुजा शिवलिंग का पूजन करने का भी विशेष महत्व है, जिसका फल अत्यंत कई गुना प्राप्त होता है. आइए जानते हैं साधु-संत, ब्राह्मण भगवान शिव के किन स्वरूपों का पूजन करते हैं?
पारद शिवलिंग-
पारद शिवलिंग को रसलिंग भी कहा गया है. इस धातुजा शिवलिंग का पूजन विधि-विधान, श्रद्धा पूर्वक पूजन करने से मनुष्य को शारीरिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक रूप से लाभ प्राप्त होता है. यह प्राकृतिक आपदा, विपत्ति और बाहरी बुरे प्रभावों से रक्षा करता है.
धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि यदि पारे के शिवलिंग को घर या मंदिर में स्थापित करके पूजा जाए, तो इससे समृद्धि और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसी मान्यता है कि देवी लक्ष्मी पीढ़ियों तक उस स्थान पर निवास करती हैं. साथ ही, व्यक्ति शारीरिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक विकारों से मुक्त हो जाता है.
पारद शिवलिंग का महत्व
शिवनिर्णय रत्नाकर में बताया गया है कि सोने के शिवलिंग की पूजा करने से पत्थर के शिवलिंग की पूजा करने की तुलना में दस लाख गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है. इसी प्रकार, मणि (रत्न) से बने शिवलिंग की पूजा करने से सोने के शिवलिंग की तुलना में दस लाख गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है. बाणलिंग नर्मदेश्वर के शिवलिंग की पूजा करने से मणिबद्ध शिवलिंग की पूजा करने की तुलना में दस लाख गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है. शुद्ध किए गए पारद शिवलिंग की पूजा करने से बाणलिंग नर्मदेश्वर के शिवलिंग की तुलना में भी दस लाख गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है.
नर्मदेश्वर शिवलिंग-
नर्मदा नदी से मिलने वाले शिवलिंग को शैलजा शिवलिंग भी कहा जाता है. नर्मदा नदी के पत्थर जब आपस में टकराते हैं, तो वे शिव स्वरूप में परिवर्तित हो जाते हैं. इन्हें नदी के तल से निकाले जाते हैं. क्योंकि मां नर्मदा का हर कंकर शंकर का स्वरूप है. लेकिन नर्मदेश्वर शिवलिंग की पहचान होना भी बहुत जरूरी है. इसलिए जब भी नर्मदेश्वर शिवलिंग की खोज करें तो इसका ध्यान रखें कि शिवलिंग पर कई प्रकार की आकृति उभरी हुई हैं कि नहीं. जैसे ॐ की आकृति, जेनेऊ की आकृति, तिलक की आकृति, गणेश की आकृति ऐसी अनेक प्रकार की आकृतियां उभरी दिखाई देंगी. यही असली नर्मदेश्वर शिवलिंग की पहचान है और इन्हें हाथ में रखने से हमें उर्जा का एहसास होगा. असली नर्मदेश्वर शिवलिंग चिकने और छेद रहित होंगे. नर्मदेश्वर शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है. हलांकि नर्मदेश्वर शिवलिंग को कई कारीगर नर्मदा से पत्थर निकाल कर उन्हें तरासते हैं और चिकने व सुन्दर बनाते हैं. उनकी स्थापना कराने का विधान है.
स्फटिक शिवलिंग –
स्फटिक शिवलिंग को शुद्धता, सात्विकता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक बताया गया है. इन्हें रत्नजा शिवलिंग भी कहा जाता है. स्फटिक शिवलिंग को भगवान शिव का अत्यंत शुभ, शांत और सात्विक स्वरूप माना गया है. घर में इनकी विधि-विधान से स्थापना करने पर सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति, धन-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है. स्फटिक शिवलिंग की घर में स्थापना कराने से पहले सही विधि और नियमों की जानकारी होना बहुत जरूरी है. केवल पूजा की वस्तु समझकर इसे घर पर नहीं रखना चाहिए. शिवलिंग की स्थापना पूरी श्रद्धा, नियम और पवित्रता के साथ कराई जानी चाहिए.
स्फटिक शिवलिंग क्यों है इतना खास?
स्फटिक शिवलिंग पारदर्शी और अत्यंत सुंदर दिखाई देता है, इसे शुद्धता और सात्विक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है. स्फटिक वातावरण की नकारात्मकता को कम करके मानसिक शांति और सकारात्मकता बढ़ाने में सहायक होता है. विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी माना गया है जो अपने जीवन में मानसिक शांति, आर्थिक स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं.
स्फटिक शिवलिंग स्थापना के लिए शुभ दिन और विधि
- सबसे पहले स्वयं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें. सोमवार को भगवान शिव का प्रिय दिन माना गया है, इसलिए स्फटिक शिवलिंग की स्थापना सोमवार को करना श्रेष्ठ है. फिर पूजा के स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें ले.
- स्फटिक शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें: दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और शुद्ध जल. इसके बाद शिवलिंग पर: बेलपत्र, चंदन, पुष्प, धूप, दीप अर्पित करें.
- इस मंत्र का जाप 1 लाख बार करके शिवलिंग सिध्द करें ले और रोजाना 108 बार मंत्र जाप करें
- “ॐ ऐं मानसे हौं ऐं ह्रीं सुखश्चि स्फटिकशिवाय नमः”
- इस मंत्र का नियमित जाप करने से पूजा का प्रभाव बढ़ता है और साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं.
पार्थिव शिवलिंग-
सावन मास में पार्थिव शिवलिंग मिट्टी से बनाकर अस्थायी रूप से पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है. इनका पूजन करने से कालसर्प, पितृदोष, ग्रहदोष और मानसिक तनाव जैसे दोषों का शमन होता है. धन, स्वास्थ्य, संतान, विवाह, करियर-इच्छाओं की पूर्ति के लिए इनकी पूजा लाभकारी है.
पार्थिव शिवलिंग कैसे बनाएं?
स्वच्छ मिट्टी जैसे गंगातट, नर्मदा तट, नदीतट या फिर किसी पवित्र स्थान से मिट्टी लाएं और गंगाजल या शुद्ध जल में भिगो दें. मंदार या बेल वृक्ष के नीचे, घर के मंदिर में या किसी शांत स्थान पर बैठ जाएं. मिट्टी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर उसे हाथों में लेकर शिव का स्मरण करें. दोनों हाथों से धीरे-धीरे शिवलिंग का आकार दें. गोल आधार और ऊपर गोलाकार उभरे हुए भाग में परिवर्तित करें. इसे साफ ताम्बे, पीतल, पत्थर की थाली में स्थापित करें.
पूजा विधि
- शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें.
- दूध, दही, शहद, घी से पंचामृत बनाकर अभिषेक करें.
- बेलपत्र, अक्षत, भांग, धतूरा अर्पित करें.
- शिव मंत्र का जप करें- “ऊँ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र
- अंत में दीपक और धूप से आरती करें.
- पूजा संपन्न होने के बाद पार्थिव शिवलिंग को बहते जल में प्रवाहित करना शुभ माना गया है.
पार्थिव शिवलिंग पूजा के लाभ
- मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा
- रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य में सुधार
- मनोकामना सिद्धि और विशेष इच्छाओं की पूर्ति
- करियर और व्यवसाय में प्रगति
- पारिवारिक सुख-शांति व रिश्तों में सुधार
- ग्रहदोषों का शमन और शुभ फल की प्राप्ति
किसे करनी चाहिए पार्थिव शिवलिंग पूजा?
- जो बाधाओं से परेशान हों
- जिन्हें स्वास्थ्य, धन या करियर में रुकावट महसूस हो रही हो
- जिनके विवाह या संतान संबंधी योग रुके हुए हों
- जो मानसिक तनाव या नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा चाहते हों
- जो शिव के किसी विशेष व्रत या संकल्प को पूरा करना चाहते हों
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