हमारे हिंदू सनातन धर्म में मृत्यु के बाद शरीर को जलने का विधान है. धार्मिक दृष्टि से अंतिम संस्कार का उतना ही महत्व होता है. जितना की अन्य 16 संस्कारों का है.
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Hindu Parampara: हिंदू धर्म की अपनी परंपराए हैं और उसको मानने वाालों की संख्या भी बहुतायत में है. कई ऐसी परंपराएं समाज में विद्यमान हैं, जो हर किसी को आश्चर्यचकित कर रही हैं. उन्हीं परंपराओं में एक साधु-सन्यासी और शिशुओं के दाह संस्कार की भी है. क्या आप जानते हैं कि हिंदू धर्म में शिशु या सन्यासी की मृत्यु होने के बाद उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता है. बल्कि उन्हें मिट्टी में दफनाया जाता है या फिर बहते हुए जल में विसर्जित किया जाता है.ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा ने बताया कि हमारे हिंदू धर्म में शरीर को जलाने के बाद ही अग्नि द्वारा मृत व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है. लेकिन, शिशु और सन्यासी को क्यों दफनाया यया विसर्जित किया जाता है. इसके बारे में गरुड़ पुराण में विस्तार से बताया गया है.
आईए जानते हैं गरुड़ पुराण के अनुसार शिशु और सन्यासी का दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता है.
क्यों किया जाता है दाह संस्कार
गरुण पुराण के अनुसार अंतिम संस्कार के बाद ही आत्मा को मुक्ति मिलती है.क्योंकि, जैसे-जैसे व्यक्ति का शरीर उम्र के हिसाब से बड़ा होता है. वह शरीर के मोह माया में बंधता चला जाता है. ऐसी स्थिति में मृत्यु के बाद मृतक व्यक्ति की आत्मा शरीर में दोबारा प्रवेश करने की कोशिश करती है. लेकिन, मृतक व्यक्ति का दाह संस्कार होने के बाद ही आत्मा को मुक्ति मिलती है. इसलिए गरुड़ पुराण के अनुसार दाह संस्कार किया जाता है.
शिशु और सन्यासी मोह माया से होते है मुक्त
गरुण पुराण के अनुसार यदि किसी महिला के बच्चे की गर्भ में मृत्यु हो जाती है, या फिर 2 साल से कम बच्चे की मृत्यु होती है, तो उसे जलाया नहीं जाता. गरुड़ पुराण मैं बताया गया कि कोई भी शिशु जन्म लेता है तो उसे मोह माया नहीं होती. आत्मा का शरीर को लेकर कोई लाभ नहीं होता है. ऐसी स्थिति में अगर शिशु की मृत्यु होती है, तो आत्मा शरीर आसानी से छोड़ देती है. इसलिए शिशु को जलने की जगह दफनाया जाता है या फिर किसी बहती नदी में विसर्जित किया जाता है.
संत पुरुषों को क्यों नहीं जलाया जाता
गरुण पुराण के अनुसार संत पुरुषों और भिक्षुओं को भी दफनाया जाता है. उन्हें जलाने की परंपरा नहीं है. क्योंकि, संत पुरुष और भिक्षु कठोर तप के कारण अपनी इंद्रियों को काबू कर लेते हैं. इसलिए संत पुरुषों को सांसारिक मोह माया और क्रोध आदि पर विजय प्राप्त कर लेते हैं. ऐसे में उसे शरीर में उपस्थित आत्मा को शरीर से कोई लगाव नहीं रहता है. इसके साथ ही ऐसे लोगों को मृत्यु होने के बाद सीधा बैकुंठ धाम चले जाते हैं.
क्यों दफनाया जाता है साधु-संतों को
शास्त्रों के अनुसार गरुण पुराण मे हर किसी के जीवन से लेके मृत्यु तक की कही अहम बाते लिखी गयी है. ऐसे ही गरुण पुराण के अनुसार, साधु-संतों को भी नहीं जलाया जाता है, क्योंकि संत पुरुषों की आत्मा शरीर में रहते हुए भी सांसारिक सुखों का त्याग कर देती है. साथ ही मोह-माया से दूर रहती है. इसके अलावा तप और पूजा-पाठ करके अपनी इंद्रियों पर विजय भी प्राप्त कर लेती है.इसी वजह से उनके शरीर को दफनाने की परंपरा है.
क्यों दफनाया जाता है शिशुओं को
गरुण पुराण के अनुसार, गर्भ में पल रहे शिशु या फिर 2 साल से कम उम्र के बच्चे की मृत्यु होती है, तो उसे जलाने की अनुमति नहीं है. ऐसा माना जाता कि छोटी उम्र में मृत्यु होने पर आत्मा को शरीर से लगाव नहीं रहता है, नाही उसे शरीर से कोई लाभ होता है. इस वजह से आत्मा उस शरीर को तुरंत छोड़ देती है. यही कारण है कि नवजात शिशु को जलाने की जगह दफनाया जाता है.या फिर किसी नदी में विसर्जित कर दिया जाता है.
Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

