कुल 40 सीटों वाले प्रदेश में 12 सीट भाजपा के खाते में तो 12 सीट जदयू के खाते में गईं. 5 लोजपा, 4 राजद, 3 कांग्रेस, 2 सीपीआई एमएल और 1-1 सीट हम व निर्दलीय को मिली.
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By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
बिहार. लोक सभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के वोट शेयर में 9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई तो वहीं भाजपा के वोट शेयर में 2 प्रतिशत की कमी देखने को मिली. इससे साफ जाहिर होता है कि चुनाव से पहले भाजपा ने जदयू के साथ जो गठबंधन किया था, इसके कारण भाजपा बड़े झटके से बच गई. कुल 40 सीटों वाले प्रदेश में 12 सीट भाजपा के खाते में तो 12 सीट जदयू के खाते में गईं. 5 लोजपा, 4 राजद, 3 कांग्रेस, 2 सीपीआई एमएल और 1-1 सीट हम व निर्दलीय को मिली. जबकि 2019 के चुनाव में भाजपा 17, जदयू 16, लोजपा 6 और कांग्रेस पार्टी ने 1 सीट जीती थी.
नेतृत्व की विश्वसनीयता और राष्ट्रीय बनाम स्थानीय मुद्दों का मिश्रण
जदयू की सीटें न बढ़ने का कारण सिर्फ एक नहीं, बल्कि सीमित क्षेत्रीय प्रभाव, गठबंधन की राजनीति, नेतृत्व की विश्वसनीयता और राष्ट्रीय बनाम स्थानीय मुद्दों का मिश्रण है. अगर चाहें तो मैं आपको जदयू और INDIA गठबंधन के सीट आंकड़ों की तुलना भी सरल तरीके से समझा सकता हूँ।
राजनीतिक कारणों से नहीं बढ़ी सीटें
जनता दल (यूनाइटेड) (जदयू) की सीटें लोकसभा चुनाव 2024 में INDIA गठबंधन के मुकाबले ज़्यादा क्यों नहीं बढ़ीं, इसके पीछे कई राजनीतिक और क्षेत्रीय कारण रहे हैं. नेताओं के बीच समन्वय की कभी भी प्रमुख कारण माना जा रहा है.
नेताओं का प्रभाव भी कम हुआ
जदयू का प्रभाव मुख्य रूप से बिहार तक ही सीमित है। दूसरी ओर, INDIA गठबंधन कई राज्यों में फैला हुआ है, जिससे उसका कुल सीटों पर असर ज्यादा दिखा। जदयू के नेताओं का जनाधार भी देखने काे नहीं मिल रहा है. केवल पार्टी लेवल पर चुनाव लड़कर जीतना मकसद नहीं होना चाहिए. बल्कि राजनेता का बर्चस्व भी क्षेत्र में होना बहुत जरूरी है. जो बिहार की राजनीति में बहुत कम देखने को मिल रहा है.
गठबंधन राजनीति में सीट शेयरिंग भी बना मुद्दा
जदयू ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इसमें सीट बंटवारे के कारण जदयू को सीमित सीटों पर ही लड़ने का मौका मिला, जिससे उसकी कुल सीटें बढ़ने की संभावना कम हो गई। जबकि भाजपा बिहार में पैठ बनाने में कामयाब हो गई. जदयू के नेताओं को गठबंधन के दौरान सीटों की वास्तविक स्थिति का आंकलन पहले से कर लेना चाहिए.
नेतृत्व और विश्वसनीयता का मुद्दा
नीतीश कुमार के बार-बार गठबंधन बदलने (कभी NDA, कभी INDIA) से कुछ मतदाताओं में भरोसे का संकट बना, जिसका असर वोटिंग पर पड़ा।
स्थानीय बनाम राष्ट्रीय मुद्दे
जदयू राज्य-स्तरीय मुद्दों पर मजबूत मानी जाती है, लेकिन लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे (जैसे प्रधानमंत्री चेहरा, केंद्र सरकार का काम) ज्यादा प्रभाव डालते हैं, जहाँ NDA का चेहरा ज्यादा मजबूत रहा। इसी कारण एनडीए अपने दम पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। वहीं जदयू की अगर बात करें तो क्षेत्रीय पार्टी होने के कारण वह बर्चस्व नहीं बना पाई, जो पार्टी को अब तक बना लेने थे.
INDIA गठबंधन की संयुक्त रणनीति
INDIA गठबंधन ने कई राज्यों में एकजुट होकर चुनाव लड़ा, जिससे एंटी-इन्कम्बेंसी वोट बंटने के बजाय एक तरफ गए। इसका फायदा उन्हें मिला। बिहार की राजनीति में जनसंख्या सर्वे प्रमुख मुद्दा रहा, जिसके कारण बिहार की राजनीति में परिवर्तन की लहर देखने को मिली। हलांकि अनुमान के मुताबिक बिहार की राजनीति में इंडिया गठबंधन का अच्छा प्रदर्शन नहीं कहा जा सकताा है। लेकिन जिस प्रकार से बिहार में इंडिया गठबंधन ने पैठ बनाई है, उसे देखते हुए इंडिया गठबंधन का भविष्य उज्जवल दिखाई पड़ रहा है।
क्षेत्र में संगठन की कमजोरी खली
जदयू का वोट बैंक बिहार में बड़ी मात्रा में है. पूरे इलाकों में जदयू का ग्राउंड कैडर और संगठन उतना मजबूत नहीं रहा जितना उसके प्रतिद्वंद्वियों काे देख्जने को मिला। सीट शेयहरिंग करके सीटों के बढ़ाने पर जो नहीं दिया गयाख् जिसके कारण बिहार की राजनीति में फेरबदल देखने को मिले। लेकिन इंडिया गठबंधन का प्रदर्शन में कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है। यदि यही हाल रहा तो विधान सभा के चुनाव में फेरबदल के आसार देखने को मिल रहे हैं।

