सुबूत के अभाव में आरोपियों को लाभ मिला, 2008 की है बम ब्लास्ट की घटना, घटनास्थल से फिंगरप्रिंट नहीं लिए गए और बाइक का चेसिस नंबर कभी रिकवर नहीं हुआ. साथ ही, वह बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम से थी, यह भी सिद्ध नहीं हो पाया.
Source : MEDIA
By : DB न्यूज अपडेट | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Malegaon Bomb Blast Verdict: मालेगांव बम ब्लास्ट के मामले में एनआईए का फैसला आ गया है. 17 साल के लंबे इंतजार के बाद एनआईए की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया है. सबूत के अभाव में कोर्ट ने सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि एटीएस और एनआईए की चार्जशीट में काफी अंतर है. अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि बम मोटरसाइकिल में था.
पुरोहित के खिलाफ कोई सुबूत नहीं
प्रसाद पुरोहित के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला है. जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्होंने बम बनाया या उसे सप्लाई किया. यह भी साबित नहीं हुआ कि बम किसने लगाया. घटना के बाद विशेषज्ञों ने सबूत इकट्ठा नहीं किए, जिससे सबूतों में गड़बड़ी हुई. कोर्ट ने यह भी कहा कि धमाके के बाद पंचनामा ठीक से नहीं किया गया, घटनास्थल से फिंगरप्रिंट नहीं लिए गए और बाइक का चेसिस नंबर कभी रिकवर नहीं हुआ. साथ ही, वह बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम से थी, यह भी सिद्ध नहीं हो पाया.
प्रज्ञा समेत 7 पर लगे थे आरोप
बता दें कि इस मामले में अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से सुनवाई और अंतिम दलीलें पूरी करने के बाद 19 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रखा गया था. इस मामले में सात लोग, जिनमें लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय शामिल हैं, जिन पर मुकदमा चल रहा था. इन सभी लोगों पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे. सभी आरोपी वर्तमान में जमानत पर रिहा थे.
2008 को हुआ था विस्फोट
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में रमजान के पवित्र महीने में और नवरात्रि से ठीक पहले एक विस्फोट हुआ. इस धमाके में छह लोगों की जान चली गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे. एक दशक तक चले मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 323 गवाहों से पूछताछ की, जिनमें से 34 अपने बयान से पलट गए. शुरुआत में, इस मामले की जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने की थी. हालांकि, 2011 में एनआईए को जांच सौंप दी गई.
अदालत ने देखी जांच प्रक्रिया में कई खामियां
- घटनास्थल से फिंगरप्रिंट नहीं लिए गए।
- मोटरसाइकिल का चेसिस नंबर रिकवर नहीं हुआ, और यह साबित नहीं हुआ कि बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम पर थी।
- धमाके के बाद पंचनामा ठीक से नहीं किया गया, जिसके कारण सबूतों में गड़बड़ी हुई।
- विशेषज्ञों ने घटनास्थल से सबूत इकट्ठा करने में लापरवाही बरती।
मामले का इतिहास
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में रमजान के पवित्र महीने और नवरात्रि से ठीक पहले हुए बम धमाके में छह लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस मामले की शुरुआती जांच महाराष्ट्र ATS ने की थी, लेकिन 2011 में इसे NIA को सौंप दिया गया। एक दशक से अधिक समय तक चले मुकदमे में 323 गवाहों से पूछताछ की गई, जिनमें से 34 अपने बयानों से पलट गए।
कोर्ट ने खारिज किए अभियोजन के दावे
विशेष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बम मोटरसाइकिल में था। प्रसाद पुरोहित के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला कि उन्होंने बम बनाया या उसे सप्लाई किया। यह भी साबित नहीं हुआ कि बम किसने लगाया। घटना के बाद विशेषज्ञों ने सबूत इकट्ठा नहीं किए, जिससे सबूतों में गड़बड़ी हुई।
कोर्ट ने नोट किया कि महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) और NIA की चार्जशीट में कई विसंगतियां थीं। इसके अलावा, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित के खिलाफ बम बनाने या सप्लाई करने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
इन पर लगा आरोप, जिन्हें मिली जमानत
सात आरोपियों—प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी, और समीर कुलकर्णी—पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। सभी आरोपी वर्तमान में जमानत पर रिहा थे। 19 अप्रैल 2025 को अंतिम दलीलें पूरी होने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

