Authored by-ज्योतिषाचार्य प्रदीप मिश्रा | Edited by-सुप्रिया
Source : DB News Update
Guru Pooja: गुरु बताते हैं, कि बिना पूर्ण निष्ठा के अगर व्यक्ति सभी देवी-देवताओं की पूजा करता है, तो कुछ भी होने वाला नहीं है, परन्तु निष्ठा के साथ केवल एक ही देवता की पूजा करने से सारे काम बन जाते हैं. इसी प्रकार निष्ठा पूर्ण एक गुरु से गुरु मंत्र प्राप्त कर उसी का निरन्तर जाप करने से कल्याण संभव है.
धर्मशास्त्र में स्वयं के कल्याण हेतु कुछ बातों को गोपनीय रखने को कहा गया है, जिसमें गुरु से प्राप्त गुरु मंत्र दीक्षा परम गोपनीय है। इसलिए शिष्य को चेतावनी दी जाती है कि, वह ध्यान रखे कि गुरु मंत्र कभी भी किसी को भी नहीं बताना चाहिए. श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में 165वें दोहे की प्रथम चौपाई में वर्णित है…
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।।
श्रीमचरितमानस में उल्लेख आया है, हे राजन्! मैं तुमको इसलिए मना करता हूँ कि इस प्रसंग को कहने से तुम्हारी बड़ी हानि होगी. छठे कान में यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जाएगा, मेरा यह वचन सत्य जानना.
गुरु मंत्र है गोपनीय
- जिस पर आपकी पूर्ण निष्ठा हो, उन्हें गुरु बनाना चाहिए.
- एक बार गुरु बनाने पर एवं गुरु मंत्र आदि ग्रहण करने पर गुरु को नहीं छोड़ना चाहिए.
- गुरु कृपा से प्राप्त गुरु मंत्र को अत्यन्त गोपनीय रखना चाहिए.
- धर्मानुसार गुरु के प्रति व गुरु मंत्र के प्रति पूर्ण सम्मान, श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास रखते हुए गुरु एवं गुरु मंत्र की प्राणों के समान रक्षा करनी चाहिए.
- गुरु कृपा से प्राप्त दीक्षा रूपी मंत्र को सार्वजनिक स्थान, परिवार या मित्र समुदाय में भी प्रकट नहीं करना चाहिए.
- जानकारों के मुताबिक अगर पति ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है, तो वह अपनी पत्नी को भी गुरु मंत्र न बताए, इस प्रकार केवल पत्नी ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है, तो वह भी पति को न बताए, इसलिए प्रायः पति-पत्नी संग-संग मंत्र दीक्षा प्राप्त करते हैं.
उजागर नहीं करना चाहिए मंत्र
जिस गुरु ने शिष्य को दीक्षित कर प्रदान की है, उसे कहीं किसी के सामने किसी भी परिस्थिति में उजागर नहीं करनी चाहिए. पूर्ण सदाचारी व ईश्वर में आस्था रखने वाला बनकर प्रत्येक बिगड़े कार्य में भी ईश्वर की अच्छाई मानते हुए गुरु के आदेशों का पालन करना चाहिए. इस प्रकार धर्मशास्त्रों में वर्णित नीति एवं नियमों का पालन करते हुए जो शिष्य गुरु के आदेश के अनुसार सुख-दुःख को एक समान मानकर अपना जीवन-यापन करता है, वही जीवन में पूर्ण रूप से सफल होता है.
गुरुमंत्र कान में ही क्यों दिया जाता है?
गुरू मंत्र शिष्य के कान में क्यों दिया जाता है और शिष्य को गुप्त रखने के लिए क्यों कहा जाता है? पहले तो जान ले कि गुरु मंत्र सभी शिष्यों के लिए एक जैसा नही होता, हर व्यक्ति के लिए अलग अलग होता है. जैसे बच्चे के जन्म के समय बच्चे का नाम रखने के लिए ज्योतिषियों से जन्म ध्वनि पता करते है, उसी तरह शिष्य की स्तिथि और अवस्था के अनुसार मूल ध्वनि (बीज ध्वनियों) ये युक्त मन्त्र दिया जाता है.
मान ले किसी शिष्य को गुरु ने उसकी स्तिथि और अवस्था के अनुसार मन्त्र दे दिया और शिष्य ने उस पर काम करना सुरुकर दिया और परिणाम आने लगे. तो दूसरे लोग या शिष्य उससे उसका तरीका पूछेगे, मगर वो तरीका या मन्त्र उसी के लिए उसकी स्तिथि के अनुसार दिया गया है. दूसरे के लिए वो काम नही करेगा. कोई भी व्यक्ति दूसरे लोगो पर हो रहे परिणाम को जल्दी पकड़ लेते है और भेड़ चाल से उसी का अनुसरण करते है. मगर अध्यात्म में हर व्यक्ति की मनोस्तिथि, ग्रह स्तिथि, आध्यात्मिक अवस्था ओर यात्रा अलग अलग होती है. इस लिए इसे गुप्त व किसी दूसरे को न बताने के लिए कहा जाता है.
हर एक व्यक्ति की अपना आध्यात्मिक स्तर
वर्तमान में हम देखते है कि कितने ही गुरू है जो दीक्षा में एक ही मन्त्र या शब्द को, अपने हर शिष्य को देते है और उसको गुप्त रखने को बोलते है. वास्तव में ये मंत्र-दीक्षा सही नही है. आप लोग देखना उन शिष्यों में काफी बडी भीड़ ऐसी होगी जिनकी जिंदगी में कोई मंत्र का प्रभाव दिखाई ही नही देगा. इसके पीछे यही कारण है. आध्यत्म की यात्रा एक जीवन की नही बल्कि अनेक जन्मों की है. हर एक व्यक्ति की अपना आध्यात्मिक स्तर होता है जो जन्मों जन्मों की यात्रा से हासिल किया होता है और ये यात्रा आगे इसी क्रम से जन्मों के बढ़ती है. इसको ऐसे समझे जैसे किसी स्कूल में 3 नए विद्यार्थी आये. पहला विद्यार्थी पहली कक्षा का, दूसरा 5वी कक्षा का और तीसरा 10वी कक्षा का. अब स्कूल का मुख्याध्यापक उन तीनों को एक ही कक्षा में एडमिशन देगा या उनकी शिक्षा के स्तर के आधार पर एडमिशन देगा. ऐसे ही आध्यात्मिक यात्रा भी अनेक जीवनों (अलग-अलग जीवन अलग अलग कक्षाओं की तरह है) की यात्रा है. मगर वर्तमान में गुरुओं की परम्परा ऐसी है जैसे स्कूल में कोई भी विधार्थी आये (चाहे वो पहली बार आया हो, चाहे वो किसी दूसरे स्कूल से 5, 8 10 या ओर ऊंची क्लास पड़ कर आया हो)और उन सभी को एक ही कक्षा में ही बैठा दे.

