मध्य प्रदेश जबलपुर सहित देश के कोने-कोने पर स्थापित हैं भगवान नृसिंह अवतार, दक्षिण भारत के पुदुचेरी के आश्रम में लक्ष्मी नरसिम्हा देव के महा-अभिषेकम में उमड़ी भीड़ से एक बार फिर चर्चा में है नृसिंह देव का पूजन
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Written By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Lakshmi Narasimha Idol: भक्तवत्सल भगवान नृसिंह के अवतार की चर्चा दक्षिण भारत के पुदुचेरी आश्रम में हुए महा-अभिषेक के बाद एक बार फिर शुरू हो गई है. नृसिंह भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए अवतरित हुए. जिसकी विस्तृत व्याख्या श्रीमद् भागवत महापुराण में की गई है. भक्त प्रहलाद की कथा से यह सिद्ध होता है कि भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए निर्जीव ‘पाषाण खंभे’ में भी हो सकता है. हिंदू धर्म के वेद-महापुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है. जिसकी वैदिक परंपराएं न केवल उत्तर भारत, बल्कि दक्षिण भारत के हिंदू मठ-मंदिरों और आश्रमों में भी देखने को मिल रही हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व दक्षिण भारत के पुदुचेरी के पास स्थित प्रसिद्ध मोरट्टंडी प्रत्यंगरा आश्रम में नृसिंह देव का अलौकिक श्रंगार और महा-अभिषेक मीडिया और सोशल मीडिया में छाया रहा और आश्रम के इस अद्भुत आध्यात्मिक उत्सव के आयोजन की चर्चा के साथ भगवान नृसिंह के पूजन से मिलने वाले अलौकिक फल की जानकारी प्राप्त करने के लिए देश भर के लोग उत्सुक देखे गए. क्योंकि नृसिंह देव का श्रंगार देखने के विशेष अवसर पर आश्रम परिसर में देश भर से लोग पहुंचे. क्योंकि इस धार्मिक कार्यक्रम में अलौकिक ऊर्जा देखने को मिली. जहां भगवान लक्ष्मी नरसिंह देव का पावन और ऐतिहासिक उत्सव देखने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचे थे और लक्ष्मी नृसिंहदेव भगवान का श्रंगार-अभिषेक-पूजन में शामिल हुए. ऐसे धार्मिक आयोजन हमारे उत्तर भारत में भी देखने को मिलते हैं. मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में नृसिंह भगवान के मंदिर और आश्रम हैं, जहां भगवान की पूजा-अर्चना, अभिषेक और श्रंगार करने की परंपरा है. आज हम ऐसे ही नृसिंह भगवान के मंदिर और उनके चमत्कारिक आयोजनों को बताने जा रहे हैं. आपको इस लेख से नृसिंह भगवान की कृपा प्राप्त करने के सूत्र भी बताने का प्रयास करेंगे.
जबलपुर में अष्टधातु के विराजमान हैं भगवान नृसिंह
मध्य प्रदेश जबलपुर जिले में शास्त्रीब्रिज गोरखपुर में करीब 113 वर्ष पुराना भगवान नृसिंह का मंदिर है. यहां की मूर्ति अष्टधातु से निर्मित बताई जा रही है. इस नृसिंह भगवान की मूर्ति को तपस्वी संत द्वारा नेपाल से लाया गया था और उन्हें एक झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में स्थापित कर दिया गया था। उसके बाद यहां उनके उत्तराधिकारी सीताराम दास जी महाराज ने मंदिर को भव्य बनाने का संकल्प लिया और विस्तार करने का प्रयास किया. मंदिर बनकर तैयार हुआ और वहां नृसिंह भगवान की स्थापना करा दी गई. उनके गोलोक गमन के पश्चात स्वामी रामचन्द्र दास शास्त्री ने मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी ली और भगवान नृसिंह का पूजन-अर्चन के साथ-साथ मंदिर को भव्य स्वरूप देने का प्रयास किया. इसी परंपरा को जगद्गुरु डॉ. स्वामी श्यामदेवाचार्य जी महाराज ने आगे बढ़ाया और उन्होंने भी नृसिंह प्राकट्य के शुभ अवसर पर भगवान नृसिंह का अर्चन-अभिषेक, श्रंगार, हवन कराने का प्रण लिया और यह परंपरा आज निर्बाध रूप से जगद्गुरु डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज के सानिध्य में संचालित है. इस भव्य आयोजन के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु-भक्त उपस्थित होते हैं और भगवान नृसिंह की कृपा प्राप्त करने के लिए पूजन-अर्चन कर रहे हैं.
जबलपुर से 40 किमी दूर सिहोरा में भी विराजमान हैं नृसिंह भगवान
मध्य प्रदेश जबलपुर जिले के अंतर्गत सिहोरा तहसील अंतर्गत खितौला में भी वर्षों पुराना भगवान नृसिंह का आश्रम है. जहां भगवान नृसिंह का पूजन-अर्चन, श्रंगार और हवन करने की प्रथा है. यहां के श्रीमहंत द्वारिका दास जी महाराज इस आश्रम को भव्य स्वरूप देने के लिए पूरा जीवन अर्पण कर दिया. उनके उत्तराधिकारी भी इसी क्रम में मंदिर को विस्तार देने में जुटे हुए हैं. यहां नृसिंह भगवान की मूर्ति भी अष्टधातु की बताई जा रही है और इसकी स्थापना भी जबलपुर गोरखपुर नृसिंह भगवान के साथ ही हुई थी. यह मंदिर ग्रामीण क्षेत्र का सबसे पुराना मंदिर है, जो आस्था का केन्द्र बनता जा रहा है.
जबलपुर जिले के शहपुरा तहसील में है प्रचीन नृसिंह देव मंदिर
जबलपुर जिले के अंतर्गत शहपुरा तहसील के अंतर्गत ग्राम कुलोन में प्राचीन नृसिंह देव का आश्रम है. नर्मदा के तट पर स्थापित इस आश्रम में नर्मदा परिक्रमा सेवा के साथ-साथ भगवान नृसिंह का डोल उत्सव बड़े धूम-धाम के साथ हर वर्ष मनाया जाता है. यह भक्तों के आकर्षण का केन्द्र है. यहां नृसिंह जयंती के अवसर पर विशाल भण्डारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र के श्रद्धालु शामिल होते है और प्रसार ग्रहण करते हैं. मंदिर के नीचे नर्मदा नदी के बीच काले रंग के पत्थर भी चमत्कारिक बताए जा रहे हैं. यहां के पत्थर को पकड़ने पर राख की भांति बारीक हो जाते हैं, जिससे भक्तों में नर्मदा नदी के इन पत्थरों का रहस्य जानने के लिए भक्त बड़ी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं.
नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में विराजमान हैं नृसिंह देव
मध्य प्रदेश नरसिंहपुर जिले के अंतर्गत गाडरवारा में भगवान नृसिंह देव विराजमान हैं. जहां हर वर्ष भगवान नृसिंह का पूजन-अर्चन और श्रंगार किया जाता है. यह मंदिर भी शतायु पूर्ण कर चुका है और सन् 1881में इस मंदिर की स्थापना कराने का दावा किया जा रहा है. इस मंदिर में नर्मदा परिक्रमावासियों की सेवा के साथ-साथ भगवान नृसिंह का उत्सव मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. यहां के ट्रस्टी मदिर को भव्य व दिव्य बनाने में जुटे हुए हैं.
दक्षिण भारत में नृसिंह देव की 16 फीट ऊंची प्रतिमा
दक्षिण भारत के पुदुचेरी आश्रम में 16 फीट ऊंची दिव्य प्रतिमा स्थापित है, इस प्रतिमा को भगवान विष्णु के सबसे उग्र और कृपालु अवतार के रूप में पूजने का विधान है. इसे भगवान लक्ष्मी नरसिम्हा देव के नाम से जाना जाता है. आश्रम में स्थापित यह भगवान की दिव्य काले पाषाण की प्रतिमा अत्यंत विशाल और अद्वितीय है, जिसकी कुल ऊँचाई लगभग 16 फीट है. इस विशालकाय और मनमोहक रूप को देखने मात्र से ही भक्तों के मन में अटूट श्रद्धा जागृत हो जाती है.
दूध और हल्दी से महास्नान करने का विधान
भगवान नृसिंह का वैदिक रीति से अभिषेक करने का विधान है. भगवान का महा-अभिषेकम पूरी तरह से पारंपरिक और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया जाता है. दिव्य प्रतिमा का कई चरणों में पवित्र सामग्रियों से स्नान कराने की प्रथा है. सबसे पहले भगवान नृसिंह देव को सैकड़ों लीटर शुद्ध दूध से स्नान कराया जाता है. इसके बाद प्रतिमा पर औषधीय और पवित्र हल्दी का लेप लगाया जाता है. भगवान को गाढ़े दही, सुगंधित चंदन और मीठे गन्ने के रस आदि सुगंधित द्रव्य से अभिषिक्त किया जाता है. तत्पश्चात प्रतिमा का ऐसा अलौकिक श्रृंगार किया जता है, जिसे देख हर भक्त की आँखें नम हो जाती हैं. पुजारियों द्वारा भगवान लक्ष्मी नरसिम्हा देव को पीले रंग के पीतांबर वस्त्र, भारी स्वर्ण आभूषणों और गेंदे के रंग-बिरंगे सुगंधित फूलों की विशाल मालाओं से सजाया जाता है.
महाआरती से प्रसन्न होते हैं भगवान
महाआरती और अखंड दीपज्योति से भगवान प्रसन्न होते हैं. पूजन के पश्चात पुजारियों द्वारा पावन महाआरती का आयोजन किया जाता है. सैकड़ों दीयों की अखंड दीपज्योति, शंखनाद और वैदिक मंत्रों के ऊँचे उच्चारण से पूरा वातावरण को भक्तिमय और पवित्र बनाया जाता है. आरती के बाद सभी भक्तों को आश्रम की रसोई महाप्रसाद वितरित किया जाता है.
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