सावन के महीने में पवित्र कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है, कांवड़ यात्रा करने से क्या लाभ मिलता है, इसको लेकर शास्त्रों में क्या मत है? आइए जनते हैं..
Source : DB News Update
By – DBNEWSUPDATE | Edited By- Supriya
Kanwar Yatra: सावन के महीने में पवित्र कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है, बांस या लकड़ी का एक ढांचा, जिसे शिव भक्त (कांवरिया) अपने कंधों पर उठाकर गंगाजल (पवित्र जल) ले जाते हैं और शिवालय में अभिषेक करते हैं. यह भक्ति, समर्पण और तपस्या का प्रतीक है. इस यात्रा पर जाने वालों को शिव जी का आशीर्वाद और अनेक तरह के लाभ मिलते है. जानें कांवड़ यात्रा से जुड़ी जानकारी.
सावन भोलेनाथ के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए कई तरह के जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, पूजा, मंत्र जाप, दान, धार्मिक अनुष्ठान आदि कई तरह के जतन करते हैं.
इन्हीं में से एक है कांवड़ यात्रा, जिसमें महादेव के भक्त मीलों पैदल चलकर गंगा किनारे जाते हैं और कांवड़ में जल भरकर लाते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं. धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो कांवड़ यात्रा का हिन्दू धर्म में खासा महत्व है.. आइए जानते हैं कावंड़ यात्रा कब शुरू हो रही है, इसका क्या महत्व व लाभ है.
कांवड़ का जल कब चढ़ता है?
पवित्र कांवड़ यात्रा की शुरुआत सावन के आरंभ से ही हो जाती है. इस साल कांवड़ यात्रा जुलाई से शुरू होगी. कई दिनों तक कांवड़िए नियम का पालन करते हुए पैदल चलते हैं और कांवड़ में गंगाजल, नर्मदा जल लाकर सावन शिवरात्रि पर भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं.
कांवड़ यात्रा करने से क्या लाभ मिलता है
कांवड़ यात्रा भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने का एक अचूक उपाय है. मान्यता है सावन के पावन महीने में कांवड़ उठाने वाले भक्त के सभी पाप शाप नष्ट हो जाते हैं. कांवड में जलभकर शिवलिंग का अभिषेक करने वालों पर सालभर भोलेनाथ की कृपा बरसती है. दुख, दोष, दरिद्रता से मुक्ति मिलती है. व्यक्ति हर पल सुख प्राप्त करता है.
कांवड़ का अर्थ
कांवड़ का मूल शब्द ‘कावर’ है जिसका सीधा अर्थ कंधे से है. शिव भक्त अपने कंधे पर पवित्र जल का कलश लेकर पैदल यात्रा करते हुए गंगा नदी तक जाते हैं. ज्यादातर कांवड़िए इस दौरान गंगाजल लेने हरिद्वार आते हैं.
कांवड़ यात्रा का इतिहास
हिंदू शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम जो भगवान शिव के एक महान भक्त के रूप में जाने जाते हैं उन्होंने पहली बार इस कांवड़ यात्रा को श्रावण महीने के दौरान किया था. तभी से कांवड़ यात्रा निकाली जा रही है. हालांकि कावंड़ यात्रा की शुरुआत किसने की इसको लेकर कई मत है.
कांवड़ यात्रा अनन्त फलदायी
कांवड़ यात्रा शिव भक्ति का एक रास्ता तो है ही साथ ही व्यक्तिगत विकास में भी सहायक है. यही वजह है कि श्रावण में लाखों श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल लेकर एक स्थान से लेकर दूसरे स्थान जाकर शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं. ‘कांवड़’ उठाने वाला, कांवड़िया, शिवयोगी के समान रहता है जो मन, वाणी, कर्म से किसी भी प्राणी का अहित नहीं करते, सब में एकमात्र सदाशिव का ही दर्शन करता है.
मनोवांछित फल पाने के लिए कई उपायों में एक
ऐसी मान्यता है कि महादेव को प्रसन्न कर मनोवांछित फल पाने के लिए कई उपायों में एक उपाय कांवर यात्रा है, जिसे शिव को प्रसन्न करने का सहज मार्ग माना गया है. सावन के महीने में भगवान शिव पर जलाभिषेक का विशेष महत्व है. जलाभिषेक से प्रसन्न होकर शिव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. भक्त जिह्वा से ‘हर हर महादेव बोल बम’ का जयकारा लगाते हुए कांवड़ उठाकर शिव को जल अर्पित करने के लिए बेताब रहते हैं क्योंकि शिव का अर्थ है कल्याण, अतः भक्त भगवान शिव को जल अर्पित कर न सिर्फ अपना कल्याण बल्कि घर-परिवार के लिए सुख-शांति का आशीर्वाद लेकर आते हैं.
शिवालय में जल चढ़ाने का महत्व
कांवड़ यात्रा का जल ज्योतिर्लिंगों के अलावा किसी भी शिव मंदिर में चढ़ाने का महत्व बताया गया है. शिवालय में जल चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्त को आशिर्वाद प्रदान करते हैं.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNEWSUPDATE.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

