एमपी जबलपुर में श्वानों की संख्या घटाने के नाम पर ढाई करोड़ से ज्यादा हुए खर्च, नसबंदी अभियान केवल दिखावा, जबलपुर नगर निगम तैयार नहीं कर पाया एक से ज्यादा ABC सेंटर
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
stray dogs : एमपी जबलपुर नगर निगम की लापरवाही का खामियाजा राहगीरों को भुगतना पड़ रहा है. जबलपुर में स्ट्रीट डॉग (Street dogs)की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. जिले में हर दिन 70 से 80 लोग डॉग बाइट का शिकार हो रहे हैं. उधर स्ट्रीट डॉग की संख्या पर कंट्रोल करने के लिए नगर निगम पिछले कई साल से उनकी नसबंदी का अभियान चला रहा है. इस अभियान में करीब ढाई से तीन करोड़ रुपए खर्च भी हो चुके हैं, लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला है. नगर निगम स्वास्थ्य विभाग ने एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है. जिसकी कमी आम आदमी को खल रही है. क्योंकि शहर के स्ट्रीट डॉग की साल भर में 4000 से ज्यादा की नसबंदी ही नहीं हो पा रही है, जबकि इससे कहीं ज्यादा 30000 के आसपास पपीज (नए बच्चे) जन्म ले लेते हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि नसबंदी पर करोड़ों रुपए खर्च करने वाला नगर निगम दूसरा एबीसी सेंटर नहीं बना पाया. इसी वजह से नसबंदी की रफ्तार नहीं बढ़ी. वर्तमान में जो एबीसी सेंटर है, वहां सिर्फ 54 डॉग को रखने की ही जगह है. हालात यही रहे तो कुछ समय में ही स्ट्रीट डॉग की संख्या इतनी हो जाएगी कि उनके कारण सड़कों पर चलना मुश्किल हो सकता है.
एक दिन में 10 की भी नहीं हो पा रही नसबंदी
नगर निगम के सूत्रों की मानें तो आवारा डॉग्स की नसबंदी को लेकर नगर निगम कितना गंभीर है, इसका अंदाजा नसबंदी और टीकाकरण की संख्या का आंकलन कर लगाया जा सकता है. नगर निगम ने जिस समिति को यह काम सौंपा है, वह मात्र दिखावे का काम कर रही है, तभी तो एक दिन में 10 स्ट्रीट डॉग्स की नसबंदी भी नहीं हो पा रही है. इसका कारण एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) सेंटर की कमी भी बताया जा रहा है, क्योंकि नसबंदी और टीकाकरण के बाद डॉग्स को 3 से 5 दिन तक एबीसी में रखा जाता है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन में संशय
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सरकारी और निजी अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और रेलवे स्टेशन जैसी सार्वजनिक जगहों से स्ट्रीट डॉग्स को हटाने के लिए राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं, लेकिन शहर में इन निर्देशों के पालन पर संशय बना हुआ है. दरअसल नगर निगम के पास इसके लिए कोई इंतजाम नहीं हैं. स्ट्रीट डॉग्स को पकड़कर शेल्टर हाउस में रखना है, लेकिन शहर में एक भी शेल्टर हाउस नहीं है. एक मात्र एिनमल बर्थ कंट्रोल सेंटर है, उसकी भी क्षमता बहुत कम है. वहीं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के एक सप्ताह बाद भी निगम ने इसको लेकर कोई तैयारी शुरू नहीं की है. इस कारण भी संशय और गहरा गया है.
20 महीने में 5784 की नसबंदी
पशु कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइन के आधार पर नगर निगम ने डॉग की नसबंदी एवं टीकाकरण का काम फरवरी 2024 में मां बगलामुखी सेवा समिति को दिया था. इस समिति ने मार्च 2024 से लेकर अक्टूबर 2025 तक 20 महीने में 5784 डॉग्स की नसबंदी एवं टीकाकरण किया है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर में आवारा डॉग की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण के लिए किस रफ्तार से काम हो रहा है.
मेल डॉग की नसबंदी करने पर 979 रुपए का भुगतान
नगर निगम ने जिस समिति को डॉग्स की नसबंदी और टीकाकरण का ठेका दिया है, उसे एक मेल डॉग के लिए 979 और फीमेल के लिए 919 रुपए की दर से भुगतान किया जाता है. समिति अब तक 2574 मेल और 3240 फीमेल डॉग की नसबंदी कर चुकी है, यानी निगम को समिति को करीब 65 लाख का भुगतान करना है, जिसमें से करीब आधी से ज्यादा राशि का भुगतान भी हो चुका है.
बढ़ रहा रेबीज का खतरा
स्ट्रीट डॉग्स की बढ़ती संख्या के कारण शहर में रेबीज का खतरा भी बढ़ता जा रहा है. यह स्ट्रीट डॉग्स के काटने से तो होता ही है साथ ही अगर संक्रमित डॉग्स की लार सीधे आंखों, नाक या मुंह की श्लेष्मा झिल्ली के संपर्क में आती है, तो संक्रमण हो सकता है. बावजूद इसके जिम्मेदार लापरवाह बने हुए हैं. जिले में डॉग बाइट के कारण होने वाले रेबीज के केसों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.

