नगर निगम जबलपुर द्वारा सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रुपए खर्च किए गए, तालाब के आसपास कचरे का अंबार
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Imarti Talab Jabalpur: इमरती तालाब के अतिक्रमणों को तोड़कर नगर निगम ने संवारने का काम तो किया है, लाखों रुपए खर्च भी किए, लेकिन सौंदर्यीकरण के काम की देखभाल नहीं हो पाई. इस कारण तालाब की स्थिति ऐसी हो गई है कि तालाब में आसपास की गंदगी समा रही है और चारों तरफ कचरे के ढेर लग गए हैं. तालाब का पानी इतना गंदा हो चुका है कि लोग छूने से भी परहेज करने लगे हैं. इतना ही नहीं सौन्दर्यीकरण के नाम पर जहां जालियां लगाई गईं थी, फुटपाथ बनाए थे, वे सब टूटकर बिखर चुके हैं. हालात यही रहे तो इमरती तालाब का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. उधर तालाब को सहेजने का दावा करने वाले नगर निगम के अधिकारियों को इससे कोई सरोकार नहीं रहा. अब तो तालाब के किनारे दुकानें भी सजने लगी हैं, जिनसे निकलने वाली गंदगी और कचरा भी तालाब में समा रहा है.
तालाब मे मिल रहा गंदा पानी
नगर निगम ने तालाब को संरक्षित करने के नाम पर सिर्फ सौंदर्यीकरण कर इसे अपने हाल पर छोड़ दिया. आसपास रहने वाले लोगों के घरों से निकलने वाले गंदे पानी को तालाब में मिलने से रोकने के कोई उपाय नहीं किए गए हैं. इसी वजह से घरों का सीवेज तालाब में मिलकर पानी को गंदा कर रहा है.
किनारे पर गंदगी ही गंदगी
कई भू-माफिया तालाब की जमीन को हथियाने में जुटे हैं. मुख्य मार्ग से तालाब लगा होने के कारण यहां किनारे बने घर और दुकानदारों ने तालाब के किनारे गंदगी और कचरा डालकर उसे खत्म करने का प्रयास शुरू कर दिया है. कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा जमीन कचरे से पट जाए, ताकि उसका इस्तेमाल वो अपने परिसर का क्षेत्रफल बढ़ाने में कर सकें. इधर रोजमर्रा की दुकान लगाने वाले सब्जी विक्रेता भी बची हुई खराब सब्जी को तालाब के किनारे ही फेंककर चले जाते हैं. जिस वजह से गंदगी तालाब में पहुंचती है. लोगों ने बताया कि तालाब की सफाई का कोई इंतजाम नहीं है, इस वजह से तालाब में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है.
तालाब का ऐतिहासिक महत्व
जानकारों का कहना है कि पंडा की मढ़िया के पास स्थित इमरती तालाब को 18वीं शताब्दी में रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया था. यह तालाब न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी इसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में, इस तालाब का उपयोग क्रांतिकारियों द्वारा छिपने और अन्य गतिविधियों के लिए किया गया था. यह तालाब जबलपुर के प्रमुख जल निकायों में से एक है और इसका उपयोग सिंचाई और धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता था.
ग्रिल टूटी, पेवर ब्लॉक उखड़ गए
इमरती तालाब के सौंदर्यीकरण पर करीब 50 लाख रुपए खर्च कर पाथ-वे बनाया गया था. इसके तालाब के किनारे ग्रिल भी लगाई गई थी, लेकिन देख-रेख के अभाव में न सिर्फ ग्रिल टूट गईं हैं, बल्कि पेवर ब्लॉक भी उखड़ चुके हैं. स्थिति यह है कि पाथ-वे पर पैदल चलना मुश्किल हो रहा है.
कार्ययोजना बनाकर भूल जाते हैं अधिकारी
शहर की तस्वीर बदलने वाले अधिकारी तालाब, कुआं और बावड़ी का उद्धार करने के लिए कार्ययोजना तैयार कराते हैं और जब उनका उन्नयन कराने की बारी आती है तो वे इन प्रोजेक्टों को अमल में लाने से पहले ही भूल जाते हैं. कोई भी बड़ा अधिकारी इन प्रोजेक्टों को आगे बढ़ाने की दिशा में काम नहीं किया. जबकि शहर का जल स्तर बनाए रखने के लिए इन तालाब, बावड़ी का विशेष महत्व है. इन्हीं के कारण जबलपुर शहर का जल स्तर कभी भी नीचे नहीं जाता है.
52 ताल-तलैया का शहर माना जाता है जबलपुर
जबलपुर शहर की पहचान कभी 52 ताल-तलैया हुआ करते थे. इन्हीं तालाबों की वजह से शहर पहचाना जाता था. लेकिन शहर के अधिकांश तालाब पूर दिए गए और वहां पर विशालकार्य इमारत तैयार हो गई. अब तालाबों का अस्तित्व ही समाप्त होता जा रहा है. इन्हें बचाने की दिशा में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा भी कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है. जिसके कारण शहर के तालाब, बावड़ी पर मकान-दुकान तैयार होते जा रहे हैं और शहर अपनी पहचान खोता जा रहा है.

