ब्राह्मण कुल शिरोमणि परशुराम जयंती पर सुख-समृद्धि की कामना के लिए पूजा-व्रत रखने की परंपरा है, प्रदोषकाल में भगवान विष्णु के छठे अवतार का जन्म हुआ था.
Source : DB News Update
By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Parshuram Jayanti 2026 Date : शास्त्र मतानुसार भगवान परशुरामजी का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में प्रदोष काल में हुआ था. इसलिए जिस दिन प्रदोष काल में वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि व्याप्त हो उसी दिन परशुराम जंयती मानई जानी चाहिए. जब भगवान विष्णु के छठे अवतार का जन्म प्रदोष काल में हुआ था. इस दिन पूजा, व्रत और दान का विशेष महत्व है, जो साहस और धर्म की स्थापना का प्रतीक है.
वैशाख सिते पक्षे तृतीयां पुनर्वसौ। निशायाः प्रथमयामे समाख्याः समये हरिः।।
इस श्लोक में उल्लेख के अनुसार इस साल 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन ही परशुराम जयंती मानाने का विधान बन रहा है.
परशुराम जयंती भगवान विष्णु के छठे अवतार को समर्पित है. इस दिन परशुराम भगवान की पूजा अर्चना की जाती है. इस दिन परशुरामजी के भक्त उनकी पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं. भगवान परशुरामजी से सुख समृद्धि की कामना भी करते हैं. वैसे तो परशुराम जी का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था. लेकिन, धर्म की रक्षा करने के लिए उन्होंने शस्त्र उठाएं थे, इसलिए धर्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भी माने जाते हैं और इस संदर्भ में इनके जन्म की एक रोचक कथा भी है.
परशुराम जन्मोत्सव
- तिथि और मुहूर्त- 19 अप्रैल 2026 को सुबह 10:50 बजे तृतीया तिथि शुरू होगी और 20 अप्रैल की सुबह 7:28 बजे समाप्त होगी.
- पूजा विधि- सुबह स्नान कर भगवान परशुराम की प्रतिमा स्थापित करें। चंदन, अक्षत, फूल और तुलसी अर्पित करें. मिठाई व फल का भोग लगाकर आरती करें.
- महत्व – यह दिन असीम पुण्य देने वाला (अक्षय) माना जाता है, जिसमें दान-पुण्य से आत्मबल और नकारात्मकता दूर होती है.
- आयोजन – इस अवसर पर शोभा यात्रा, चल समारोह और विशेष पूजाएं आयोजित की जाती हैं.
परशुराम जयंती का महत्व
- न्याय के प्रतीक: भगवान परशुराम को न्याय और धर्म की रक्षा के लिए जाना जाता है, जिन्होंने अत्याचारी शासकों का विनाश किया।
- अमरता : मान्यता है कि भगवान परशुराम आज भी तपस्या में लीन हैं और चिरंजीवी (अमर) हैं।
- दान : इस दिन किया गया दान कभी समाप्त नहीं होता और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज में यह पर्व उत्साह से मनाया जाता है।
भगवान परशुराम के मंत्र
साहस, शक्ति और ज्ञान प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं. उनके प्रमुख मंत्रों में ‘ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नमः’ (मूल मंत्र) और ‘ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि। तन्नो परशुराम प्रचोदयात्’ (गायत्री मंत्र) सबसे लोकप्रिय हैं. इन मंत्रों का जाप अक्षय तृतीया या नियमित रूप से करने से आत्मबल बढ़ता है.
यह भगवान परशुराम का एक अत्यंत शक्तिशाली और मूल मंत्र है: “ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नमः” यह मंत्र परशुराम जी के पराक्रम और सत्य के प्रति समर्पण का प्रतीक है. अक्षय तृतीया या परशुराम जयंती पर इस मंत्र का जाप मानसिक शांति, साहस और सभी प्रकार की समस्याओं के निवारण के लिए किया जाता है.
पूजा विधि
- स्नान व संकल्प- सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी या घर पर ही गंगाजल मिले जल से स्नान करें.
- स्थापना- भगवान परशुराम की प्रतिमा या तस्वीर को साफ स्थान पर स्थापित करें.
- पूजन- भगवान को चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और तुलसी के पत्ते अर्पित करें.
- भोग- मिठाई या फल का भोग लगाएं.
- आरती व पाठ- परशुराम स्तुति या मंत्रों का पाठ करें और अंत में आरती करें.
- दान- इस दिन दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह अक्षय तृतीया का दिन भी है.
श्री परशुराम स्तोत्र
भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी को समर्पित एक शक्तिशाली स्तुति है, जो साहस, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है. प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करने से भय से मुक्ति, स्वास्थ्य लाभ और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. यह स्तोत्र विशेष रूप से अक्षय तृतीया पर या नियमित पूजा में पढ़ा जाता है.
।। श्री परशुराम स्तोत्रम्।।
कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजम् ।
जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम् ॥1॥
नमामि भार्गवं रामं रेणुकाचित्तनन्दनम् ।
मोचिताम्बार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनम् ॥2॥
भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम् ।
गतगर्वप्रियं शूरंं जमदग्निसुतं मतम् ॥3॥
वशीकृतमहादेवं दृप्तभूपकुलान्तकम् ।
तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम् ॥4॥
परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः ।
रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम् ॥5॥
शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञामण्डितं रणपण्डितम् ।
रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररञ्जनम् ॥6॥
मार्गणाशोषिताब्ध्यंशं पावनं चिरजीवनम् ।
य एतानि जपेद्रामनामानि स कृती भवेत् ॥7॥
॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीपरशुरामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
स्तोत्र के लाभ
- भय मुक्ति: जीवन के सभी प्रकार के डर से मुक्ति दिलाता है.
- स्वास्थ्य : दीर्घकालिक बीमारियों से मुक्ति पाने में सहायक है.
- सकारात्मकता : नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मन में सात्विक भाव जगाता है.
- शत्रु नाश: शत्रुओं और समस्याओं से सुरक्षा प्रदान करता है.
परशुराम का जन्म स्थान
भगवान परशुराम का मुख्य जन्मस्थान मध्यप्रदेश के इंदौर जिले की महू तहसील के पास जानापाव कुटी (Janapav Kuti) माना जाता है. यह स्थान विंध्यांचल पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित है, जहाँ ऋषि जमदग्नि का आश्रम था और यहीं पर परशुराम जी ने जन्म लिया था.
जन्मस्थान के बारे में प्रमुख विवरण
- स्थान : इंदौर से लगभग 45 किलोमीटर दूर जानापाव पर्वत, मानपुर, मध्यप्रदेश.
- महत्व: यहाँ भगवान परशुराम का मंदिर स्थित है और इस स्थान को “परशुराम लोक” के रूप में विकसित किया जा रहा है.
- अन्य मान्यताएँ: कुछ कथाओं के अनुसार, उनका संबंध उत्तर प्रदेश के जौनपुर (जमैथा गाँव) से भी जोड़ा जाता है, जहाँ उनके पिता का आश्रम था.
- पौराणिक विवरण: परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को हुआ था.
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