3 हजार कैदियों पर सिर्फ एक डॉक्टर तैनात है. जेल के अंदर ओपीडी से लेकर उपचार करना तक उन्हीं के जिम्मे में शामिल है.
By : DB News Update| Edited By : प्रिंस अवस्थी
MP News, jail doctor. जेल में कैदी गंभीर रूप से बीमार हो जाए तो उसके उपचार का एक मात्र साधन यही है कि उसे रेफर कर दिया जाए। रेफर करके उसे मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है, ताकि समुचित उपचार मिल पाए और उसकी जान बचाई जा सके, लेकिन इलाज व्यवस्था पर नजर दौड़ाएँ तो जेल के अंदर स्थिति बेहद खराब है, क्योंकि यहाँ 3 हजार कैदियों पर सिर्फ एक डॉक्टर तैनात है. जेल के अंदर ओपीडी से लेकर उपचार करना तक उन्हीं के जिम्मे में शामिल है.
हर दिन तकरीबन 250 से अधिक कैदियों की ओपीडी चलती है, जिसमें 4 से अधिक घंटे लग जाते हैं. रिपोर्ट आने पर उनको दवाइयाँ लिखी जाती हैं. इससे समझ आता है कि एक डॉक्टर आखिर कितने कैदियों का उपचार कर पाएगा, क्योंकि डॉक्टर के काम करने के घंटे तय हैं. उसी समय सीमा में उपचार किया जा रहा है. ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी है कि कैदियों की संख्या को देखते हुए सेंट्रल जेल में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई जाए, ताकि कैदियों को समुचित उपचार मिल पाए.
जेल के अंदर भी अस्पताल
जेल में अस्पताल वार्ड बना है. यहाँ उन मरीजों को ऑब्जरवेशन में रखते हैं, जिनको ज्यादा तकलीफ होती है. खासतौर पर जो शुगर, बीपी, कैंसर, किडनी, लीवर के मरीज होते हैं। यहाँ डॉक्टर ऐसे बंदियों की रोजाना जाँच करते हैं. उनको दवाइयों से लेकर ड्रॉप तक लगाई जाती है. कुछ दिन भर्ती रखने के बाद उनको वार्ड में रेफर कर दिया जाता है.
गंभीर मरीज मेडिकल रेफर
जेल के अस्पताल वार्ड में भर्ती जिन कैदियों को आराम नहीं लगता, उनको तुरंत ही मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया जाता है. जहाँ उनका इलाज किया जाता है, क्योंकि मेडिकल कॉलेज से लेकर सुपर स्पेशएलिटी में तमाम सुविधाएँ होती हैं. जहाँ पर मरीज का पूर्ण उपचार हो जाता है और वह स्वस्थ्य होकर वापस जेल आ जाता है. बस समस्या कैदियों की सुरक्षा की होती है, क्योंकि पुलिस गार्ड इनकी तैनाती के लिए नहीं मिल पाते हैं. गंभीर अवस्था में जेल प्रहरियों को ही इनकी सुरक्षा में मेडिकल कॉलेज में तैनात किया जाता है.
कैदियों की 38 प्रकार की जाँच
सेंट्रल जेल में जैसे ही किसी नए कैदी की आमद होती है वैसे ही उसकी 38 प्रकार की जाँच की जाती है. जाँच रिपोर्ट आने पर पता चलता है कि कैदी स्वस्थ्य है या फिर बीमार. उसके आधार पर उसकी जाँच की जाती है. अधिकांश लोग ऐसे होते हैं, जिनको पता ही नहीं होता है कि वह शुगर या बीपी के मरीज हैं. जाँच के बाद वह हकीकत से रूबरू होते हैं. इतना ही नहीं एचआईवी सहित अन्य संक्रमण से ग्रसित मरीजों को भी जाँच के बाद पता चलता है कि वह किस तरह की बीमारियों से पीड़ित हैं.
कैदियों की मौत भी हुई
उपचार के दौरान मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कैदियों की मौत भी हो रही है। कुछ मामलों में मरीजों के परिजन समय पर उपचार न मिल पाने का भी आरोप लगा चुके हैं. दरसअल कैदी के अचानक बीमार होने पर उसे तुरंत ही एंबुलेंस के द्वारा जेल स्टाफ मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचता है और जाँच कर भर्ती करवाता है ताकि मरीज को बचाया जा सके. यदि जेल के अंदर एक डॉक्टर की जगह 5 से 6 डॉक्टर तैनात हो जाएं तो मरीजों को राहत मिल सकती है, क्योंकि मरीज अलग अलग बीमारियों से पीड़ित होते हैं. ऐसे में हर बीमारी के एक्सपर्ट डॉक्टर तैनात हो जाएँगे तो कैदियों को सबसे ज्यादा राहत मिलेगी.

