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छठ में खरना प्रसाद का धार्मिक महत्व क्या है? जानें…

DB News
Last updated: 13/10/2025 8:58 PM
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3 Min Read
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छठ पूजा में खरना का प्रसाद अत्यंत पवित्र माना जाता है. यह सूर्य देव को अर्पित होता है. गुड़, गेहूं, और केले से बनता है, सात व्रतों का प्रतीक है…

By : DB News Update| Edited By: प्रिंस अवस्थी

Contents
छठ पूजा में खरना का प्रसाद अत्यंत पवित्र माना जाता है. यह सूर्य देव को अर्पित होता है. गुड़, गेहूं, और केले से बनता है, सात व्रतों का प्रतीक है…छठी मैय्या का कैसे होता है आगमन?प्रसाद बनाने का नियमखरना पर गुड़ की खीर का महत्व

Chhath Puja Kharna Prasad: हिंदू आस्था के प्रमुख पर्व छठ पूजा के दूसरे दिन खरना मनाने का विधान है. इस दिन चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है. यह दिन छठी मैया के आगमन, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है. खरना के बाद ही व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू करते हैं. इस दिन गुड़ और चावल की खीर, रोटी और केले का प्रसाद बनाया जाता है. रात में व्रती छठी मैया की पूजा करने के बाद उन्हें प्रसाद अर्पित करते हैं और फिर उसे ग्रहण करते हैं. मान्यता है कि इस प्रसाद से घर में छठी मैया का आशीर्वाद मिलता है और पवित्रता बनी रहती है.

छठी मैय्या का कैसे होता है आगमन?

मान्यता है कि खरना के समय शरीर और मन की पूरी शुद्धता का ध्यान रखा जाता है. प्रसाद परिवार और पड़ोसियों में बांटने की परंपरा है. माना जाता है कि खरना के बाद व्रती कठिन निर्जला व्रत के लिए मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार होती हैं. आज के दिन छठी मैया घर में प्रवेश करती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं.

प्रसाद बनाने का नियम

  • खरना के दिन गेहूं पिसवाना बहुत शुभ माना जाता है.
  • सुबह से ही लोग साफ-सुथरा गेहूं लेकर मिल जाते हैं और उसे पिसवाते हैं.
  • आटे से खरना की रोटी और अगले दिन के लिए महाप्रसाद ठेकुआ तैयार किया जाता है.
  • गेहूं के साथ चावल भी पिसवाया जाता है, जिससे कसार का लड्डू बनाया जाता है.
  • शुद्ध अनाज से बना प्रसाद छठी मैया को बहुत प्रिय होता है.

खरना पर गुड़ की खीर का महत्व

गुड़ और चावल से बनी खीर का बहुत विशेष महत्व है. इसे रसिया या रसियाव भी कहा जाता है. यह खीर मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से पकाई जाती है. आम के पेड़ को हिंदू धर्म में पवित्रता का प्रतीक माना गया है. खीर बनने के बाद सूर्य देव की पूजा की जाती है और सबसे पहले प्रसाद उन्हें अर्पित करने का विधान है. इसके बाद व्रती महिलाएं यह प्रसाद ग्रहण करती हैं और फिर इसे सब में बांटती हैं. इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद ही 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है, जो श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक माना गया है.

Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि DBNewsupdate.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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