हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार 56 भोग सिर्फ खाने की थाली नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और आभार का प्रतीक हैं.
By : पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Chhappan Bhog: आज धनतेरस पर भगवान धनवंतरी की पूजा करने का विधान है. धनवंतरी भगवान को पहला दीपक आज 18 अक्टूबर की शाम 5 बजकर 48 मिनट से 7 बजकर 5 मिनट पर जलाएं. इस दीए को घर की पवित्र खिड़की पर रखने से यमराज की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है. इसी तरह धनतेरस खरीदारी के लिए सबसे अच्छा शुभ मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से लेकर 19 अक्टूबर सुबह 06 बजकर 24 मिनट तक है. इसके बाद 20 अक्टूबर को दीपावली का पर्व है. इसके ठीक दूसरे दिन अन्नकूट महोत्सव है. जो न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भक्ति, भोग और परंपराओं का प्रतीक भी है. इस इस साल यह शुभ दिन 22 अक्टूबर को है. इस दिन भगवान को 56 भोग लगाने की परंपरा है. आइए जनते हैं अन्नकूट का महत्व और 56 भोग की परंपरा के बारे में…
कृतज्ञता ज्ञापित करने का प्रतीक है अन्नकूट
भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में छप्पन भोग सिर्फ 56 व्यंजनों की सूची नहीं है. अपितु आस्था, कृतज्ञता ज्ञापित करने और सेवा का भी प्रतीक है. गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव के अवसर पर मंदिरों और घरों में 56 प्रकार के पकवान सजाने का विधान है.
56 भोग का रहस्य
मान्यता है कि छप्पन भोग का रहस्य दो महत्वपूर्ण बातों पर आधारित है. भगवत पुराण के अनुसार जब इंद्रदेव ने व्रज पर प्रलयकारी वर्षा करने लगे, तब श्रीकृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को एक उंगली पर उठाकर गोपालकों और गायों की रक्षा की. इस दौरान उन्होंने न भोजन किया और न विश्राम किया. वैष्णव संप्रदाय की परंपरा में ठाकुरजी की सेवा दिन के आठ खंडों में करने का विधान बतलाया गया है. इन आठ खंडों में नैवेद्य अर्पित किया जाता है. सात दिन यह आठ सेवाएं दी जाती है. यानी कि 56 तरह के व्यंजन के भोग लगते हैं.
‘कूट’ जैसे थाली सजाने की परंपरा
अन्नकूट पूजा में थाली को ‘कूट’ यानी पहाड़ जैसी सजावट करने की परंपरा है. इसमें मुख्य रूप से अनाज, दालें, मिठाइयां, नमकीन, फल और पेय शामिल होते हैं. घी से बने व्यंजन अनिवार्य होते हैं क्योंकि घी शुद्धता और सात्त्विकता का प्रतीक है. थाली का आकार और सजावट क्षेत्रानुसार बदल सकते हैं. लेकिन मूल भावना समान रहती है.
कौन से खाद्यान्न किसके प्रतीक हैं!
छप्पन भोग के प्रत्येक व्यंजन का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. अनाज और दालें धरती के पोषण का आभार दर्शाती हैं. मिठाइयां जीवन में आनंद और मिठास का प्रतीक हैं. फल और मेवे प्रकृति की भेंट माने जाते हैं. दूध, दही तथा घी कृष्ण के ग्वालबाल जीवन की याद दिलाते हैं.
कृतज्ञता का भाव होना जरूरी
ऐसी मान्यता है कि छप्पन भोग सिर्फ स्वाद का आनंद नहीं है. यह सेवा, श्रद्धा और भगवान के प्रति आभार का अनुभव है. हर व्यंजन अर्पित करते समय भक्त अपने मन में प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करता है. यह संदेश देता है कि भोग केवल खाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की हर अनुभूति को स्वीकारने और आभार प्रकट करने के लिए है.
छप्पनभोग प्रसाद की लिस्ट
रसगुल्ला, चन्द्रकला, रबड़ी, शूली, दधी, भात, दाल, चटनी, कढ़ी, साग-कढ़ी, मठरी, बड़ा, कोणिका, पूरी, खजरा, अवलेह, वाटी, सिखरिणी, मुरब्बा, मधुर, कषाय, तिक्त, कदुवा पदार्थ, खट्टे, शक्करपारा, घेवर, चिला, मालपुआ, जलेबी, मेसूब, पापड़, सीरा, मोहनथाल, लौंगपूरी, खुरमा, गेहूं दलिया, पारिखा, सौंफ़लघा, लड़्ड़ू, दुधीरुप, खीर, घी, मक्खन, मलाई, शाक, शहद, मोहनभोग, अचार, सूबत, मंड़का, फल, लस्सी, मठ्ठा, पान, सुपारी, इलायची.
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