हिंदू धर्म में ज्येष्ठ अमावस्या को एक ऐसा विशेष अवसर माना जाता है, जिसमें आस्था और शुद्ध भाव किए कामों से पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है.
By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By : प्रिंस अवस्थी
Source : DB News Update
Jyeshtha Amavasya 2025: धार्मिक दृष्टिकोण से ज्येष्ठ अमावस्या के दिन का बड़ा महत्व होता है. ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त में हरिद्वार हर की पौड़ी में स्नान करने, मां गंगा के मंत्रों का जाप करने और दान-पुण्य करने से सारे पापों का नाश होता है. वैसे तो हर महीने अमावस्या तिथि पड़ती है, लेकिन ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि इसलिए भी खास होती है, क्योंकि इसमें वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) और शनि जयंती (Shani Jayanti) जैसे त्योहार मनाए जाते हैं.
ज्येष्ठ अमावस्या कब है?
इस साल ज्येष्ठ अमावस्या की दो तिथि बताई जा रही है, जोकि 26 मई और 27 मई है. पंचांग के मुताबिक अमावस्या तिथि की शुरुआत 26 मई दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से हो रही है और 27 मई रात 08 बजकर 31 मिनट पर समाप्त हो जाएगी. ऐसे में उदया तिथि को देखते हुए 27 मई को ज्येष्ठ अमावस्या मान्य होगी.
ज्येष्ठ अमावस्या का धार्मिक महत्व क्या है?
ज्येष्ठ अमावस्या के दिन स्नान, दान, व्रत, पितरों का तर्पण आदि जैसे काम किए जाते हैं. लेकिन यह तिथि पापों से मुक्ति भी दिलाती है. वो भी एक नहीं बल्कि 10 तरह के पापों से. इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ रही है, जिसे भौमवती अमावस्या भी कहा जाएगा.
साथ ही ज्येष्ठ अमावस्या को बड़ अमावस्या भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन वट या बरगद वृक्ष की पूजा होती है. पितरों की आत्मा की शांति के लिए भी इस अमावस्या कई कार्य किए जाते हैं. खासकर इस अमावस्या पर गंगा स्नान करने और दान पुण्य करने से 10 तरह के पापों से मुक्ति मिलती है.
10 तरह के पाप कौन से होते हैं
ज्योतिषाचार्य के अनुसार शास्त्रों में 10 तरह के पापों के बारे में बताया गया है जोकि कायिक, वाचिक और मानसिक होते हैं. कायिक पाप को शारीरिक पाप कहा जाता है जैसे किसी वस्तु की चोरी करना, हिंसा करना और परस्त्री का गमन करना. वाणी द्वारा किए पापों को वाचिक पाप कहते हैं. इसमें झूठ बोलने, अनुचित बोलने, चुगली करने और दूसरों की निंदा करने जैसे पाप शामिल होते हैं. वहीं मानसिक पाप वह होता है जोकि मन से किए जाते हैं. जैसे मन ही मन किसी का अहित सोचना, किसी झूठ में शामिल होना या किसी भी धन संपत्ति हड़पने का विचार मन में लाना.
ऐसे करें पितरों को प्रसन्न
गंगाजल से स्नान- संभव हो तो इस दिन पवित्र नदी में स्नान करें. यदि ऐसा संभव न हो सके तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें. मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है.
तिल और जल से तर्पण- स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम से तिल मिश्रित जल अर्पित करें. यह तर्पण पितरों को तृप्त करता है.
पीपल वृक्ष की पूजा- भौमवती अमावस्या पर पीपल के पेड़ की पूजा विशेष फलदायक मानी जाती है. वृक्ष को जल दें, दूध अर्पित करें और 7 बार परिक्रमा करें. पीपल के नीचे एक दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा मिलती है.
गीता पाठ- भगवान श्रीविष्णु की पूजा करें, उन्हें प्रसन्न करने के लिए गीता के सातवें अध्याय का पाठ करें. यह पितृ शांति के साथ-साथ मानसिक संतुलन और आंतरिक शुद्धि प्रदान करता है.
पितरों के लिए दान- इस दिन का विशेष महत्व है और यह पुण्यदायी माना गया है. पितरों की तृप्ति के लिए अनाज, वस्त्र, तांबे के पात्र, तिल, दक्षिणा और 7 प्रकार के अन्न का दान करें. ब्राह्मणों, जरूरतमंदों और गौसेवा के माध्यम से यह दान किया जा सकता है.
पीपल का पौधा लगाएं- घर के आसपास खाली स्थान है, तो इस दिन पीपल का पौधा अवश्य लगाएं. यह न सिर्फ पर्यावरण हितैषी कार्य है, बल्कि पितृ दोष शांति और आर्थिक बाधाओं से मुक्ति दिलाने वाला उपाय भी है.
गौसेवा और पशु-पक्षियों की सेवा- अमावस्या के दिन गौमाता को रोटी, गुड़ और चारा खिलाना विशेष पुण्य देने वाला होता है. साथ ही पक्षियों को दाना-पानी देना, बेसहारा जानवरों की सेवा करना पितरों को अत्यंत प्रसन्न करता है.
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