Mahashivratri 2025: महाशिवरात्रि पर 149 साल बाद विशिष्ट संयोग बन रहा है, इसमें शिव संग शनि देव की कृपा भी बरसेगी और धन के कारक ग्रह शुक्र का भी साथ मिलेगा.
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By : ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप मिश्रा | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Mahashivratri 2025: इस वर्ष की महाशिवरात्रि बेहद खास मानी जा रही हैं. शिवरात्रि के दिन सूर्य, बुध और शनि एक साथ कुंभ राशि में स्थित रहेंगे. करीबर 149 साल बाद इन तीनों ग्रहों की युति और महाशिवरात्रि का योग का संयोग बन रहा है.
शिव पूजा करने से भक्तों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी हो सकती हैं, ऐसी मान्यता है. ग्रहों के दुर्लभ योग में की गई पूजा-पाठ से कुंडली से जुड़े ग्रह दोष भी शांत हो सकते हैं. महाशिवरात्रि पर कौन से शुभ संयोग बन रहे हैं? और इससे क्या लाभ मिलने वाला है? जानें…
महाशिवरात्रि पर ग्रहों का दुर्लभ संयोग
- महाशिवरात्रि पर शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेगा, इसके साथ राहु भी रहेगा. ये एक शुभ योग है.
- इसके अलावा सूर्य-शनि कुंभ राशि में रहेंगे. सूर्य शनि के पिता हैं और कुंभ शनि की राशि है. ऐसे में सूर्य अपने पुत्र शनि के घर में रहेंगे.
- शुक्र मीन राशि में अपने शिष्य राहु के साथ रहेगा. कुंभ राशि में पिता-पुत्र और मीन राशि में गुरु-शिष्य के योग में शिव पूजा की जाएगी.
- ऐसा योग 149 साल बाद है. 2025 से पहले 1873 में ऐसा योग बना था, उस दिन भी बुधवार को शिवरात्रि मनाई गई थी.
- फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की महाशिवरात्रि 26 फरवरी, धनिष्ठा नक्षत्र, परिघ योग, शकुनी करण और मकर राशि के चंद्रमा की उपस्थिति में आ रही है.
सूर्य, बुध और शनि योग
महाशिवरात्रि पर सूर्य, बुध और शनि एक साथ कुंभ राशि में स्थित रहेंगे. इन तीनों ग्रहों की युति और महाशिवरात्रि का योग 2025 से पहले 1965 में बना था. सूर्य और शनि पिता-पुत्र हैं और सूर्य शनि की राशि कुंभ में रहेंगे. यह एक विशिष्ट संयोग है, जो लगभग एक शताब्दी में एक बार बनता है, जब अन्य ग्रह और नक्षत्र इस प्रकार के योग में विद्यमान होते हैं.
इस प्रबल योग में की गई साधना आध्यात्मिक और धार्मिक उन्नति प्रदान करती है. पराक्रम और प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए सूर्य-बुध के केंद्र त्रिकोण योग का बड़ा लाभ मिलता है. इस योग में विशेष प्रकार से साधना और उपासना की जानी चाहिए.
संसार का उत्थान कोई एक नहीं कर सकता, यह तो केवल परमात्मा ही कर सकते हैं
शिव जयंती के 100 वर्ष बाद नए युग (सतयुग) की शुरुवात होती है. परमपिता परमात्मा ही स्वर्ग की रचना करते है. सम्पूर्ण विश्व और मानवता का परिवर्तन होने में 100 वर्षो का समय लगता हैं. यह सबसे महान कार्य है. अगर हम सभी मुख्य पार्टधारी आत्माओं, जैसे अब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आदि का पार्ट का अवलोकन करें तो ये समझ आता है की वे सभी परमात्मा के संदेश वाहक/ पैगाम देने वाले संदेशी/पैगम्बर थे. उन सभी ने अपना अपना धर्म स्थापित किया और परमात्मा के बारे में अपना-अपना दृष्टिकोण बताया व जीवन जीने की कला सिखाई. बहुत से महापुरुषो ने इतिहास को बदला है. कईयों ने शांति और प्रेम के सन्देश से, कईयों ने अपने ज्ञान से और कईयों ने युद्ध लड़के. परन्तु कोई भी पूरी दुनिया को एक नहीं कर सका. धर्म सत्ता अभी भी है पर दुःख भी है क्योकि संसार पतन की ओर अग्रसर है (आध्यात्मिक दृष्टिकोण से). अलग अलग समय पर अलग अलग व्यक्तियों द्वारा कई प्रयास किये गए, परन्तु सम्पूर्ण संसार का उत्थान कोई कर नहीं सकता. यह तो केवल परमात्मा कर सकते है.
कैसे होता है शिव का अवतरण
ऐसी मान्यता है कि परम पिता का हम बच्चों से यह वायदा है कि जब-जब धर्म की अति ग्लानि होंगी, सृष्टि पर पाप व अन्याय बढ़ जायेगा…. तब वे इस धरा पर अवतरित होंगे… अब हमने जाना है की वो एक साधारण मनुष्य तन का आधार लें, हमें सत्य ज्ञान सुनाकर, सद्गति का रास्ता दिखा, दुःखों से मुक्त कर रहे हैं. कुछ ऐसा ही संदेश देकर हमें अंधकार से प्रकाश का मार्ग बता रहे हैं.
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