पुराणों के अनुसार गया जी असुर की देह पर स्थित है. गया जी में पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करना क्यों खास है?
By : डीबी न्यूज अपडेट | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Pitru Paksha Pindaan in Gaya ji: गया जी को देव, पितृतीर्थ स्थल माना गया है. भाद्रपद पूर्णिमा पर 7 सितंबर से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है. 16 दिन के इस पखवाड़े में पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है. इस दौरान देश-विदेश से लोग गया में श्राद्ध करने पहुंचेगें.
क्योंकि दिवंगत माता-पिता या अन्य परिजन के प्रति श्रद्धापूर्वक किया गया कर्म ही श्राद्ध है, पिंडदान, तर्पण और दान इसकी विधि हैं. वैसे तो श्राद्ध क्रिया किसी भी तीर्थ स्थल या घर पर भी किया जा सकता है लेकिन फल्गू नदी के तट पर स्थित गया श्राद्ध की भूमि है, आइए जानते हैं शास्त्र अनुसार गया जी में पिंडदान का इतना महत्व क्यों है?
गया जी में पिंडदान करने का महत्व
देवभूमि भारत में असंख्य तीर्थ हैं लेकिन बिहार राज्य का फल्गू नदी के तट पर स्थित गया जी तीर्थ श्राद्ध कर्म का एकमात्र पर्याय है. यह वास्तव में गया नामक असुर की देह ही है जहां पिंडदान करने से मातृ और पितृ पक्ष की सात पीढ़ियों का उद्धार होता है. पुराणों में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति गया जी में अपने पितरों का पिंडदान करता है वह स्वयं और उसके पूर्वज जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं.
‘श्राद्धारंभे गयां ध्यात्वा ध्यात्वा देवं गदाधरम्। स्वपितृन् मनसा ध्यात्वा तत: श्राद्धं समाचरेत्।।’
अर्थात – श्राद्ध चाहे घर में हो या प्रयाग, काशी, पुष्कर, नैमिषारण्य या गंगा किनारे ही क्यों न किया जाए, श्राद्ध का आरंभ ही गयाधाम और गया के प्रधान देवता भगवान गदाधर का स्मरण कर किया जाता है.
गया जी से जुड़ी कथा
कथा के अनुसार, एक समय में गयासुर नामक एक अत्यंत धार्मिक और पराक्रमी असुर था, एक बार उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु जी प्रकट हुए और वरदान में गयासुर ने मांगा कि मैं देवताओं, ऋषियों व मुनियों से भी अधिक पवित्र हो जाऊं।’ भगवान ने तथास्तु कह दिया.
इसके साथ ही गयासुर की देह इतनी पवित्र हो गई कि उसे देखने व स्पर्श करने वाले स्वर्ग जाने लगे. इससे चिंतित ब्रह्मा गयासुर के पास आए और यज्ञ के लिए उसकी पवित्र देह को भूमि के रूप में मांगा, यज्ञ के समय उसकी देह हिलने लगी, ब्रह्मा जी उसे स्थिर करने में विपल रहे तो विष्णु जी ने आकर अपने चरणकमलों औ गदा से उसे स्थिर कर दिया
यज्ञ समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु ने गयासुर को मोक्ष प्रदान करने का वचन दिया और उसे यह आशीर्वाद भी दिया कि उसकी देह जहाँ-जहाँ फैलेगी वो जगह पवित्र होगी और उस स्थान पर जो पिंडदान करेगा उसे मोक्ष मिलेगा. तभी से यह क्षेत्र गयातीर्थ, देवतीर्थ और पितृतीर्थ के नामों से प्रसिद्ध है.
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