7 जिलों के विकास का बजट भी खत्म कर दिया गया, 2019 से नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हुई, प्रदेश सरकार ध्यान देना बंद कर दिया
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Mahakoshal Vikas Pradhikaran: मध्य प्रदेश में गठन किए गए महाकोशल, बुन्देलखण्ड और विन्ध्य विकास प्राधिकरण वेंटिलेटर पर पहुंच गए हैं. महाकोशल विकास प्राधिकरण (मविप्रा) सहित इन दोनों प्राधिकरण का अस्तित्व खत्म करने की साजिश रची जा रही है. यहां अब न तो अधिकारी बचे हैं और न ही कर्मचारी, कार्यालय में वर्षों पुरानी टूटी कुर्सियां, कपड़े ढके कम्प्यूटर और बंद चेंबर के दरवाजे इस बात की खुद गवाही दे रहे हैं. जबलपुर सिविक सेंटर मढ़ाताल स्थित महाकोशल प्राधिकरण के सीईओ भी अब झांकने नहीं आते हैं. केवल एक प्रोजेक्ट प्रभारी मैडम के हवाले पूरा दफ्तर है. इतना ही नहीं 2025-26 का बजट भी खत्म कर दिया गया है. इससे पहले पूरे महाकोशल के लिए 50 लाख रुपए के बजट का प्रावधान था, लेकिन अब उस बजट का निर्धारण भी खत्म कर दिया गया है. ऊंट के मुहं में जीरा के समान दिया जाने वाला बजट को खत्म किए जाने के साथ ही इस प्राधिकरण इसकी अस्मिता भी खत्म करने की प्लॉनिंग की जा रही है. जिससे न केवल जबलपुर जिले के विकास प्रभावित होंगे, बल्कि मंडला, बालाघाट, सिवनी, छिंदवाड़ा, कटनी, नरसिंहपुर जिले भी विकास के मामले में प्रभावित होंगे.
डेढ़ करोड़ से 50 लाख में सिमटा बजट
महाकोशल विकास प्राधिकरण को बहुत पहले करीब डेढ़ करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया जाता था. वित्तीय वर्ष 2024-25 में 7 जिलों के बीच 50 लाख रुपए के बजट का प्रावधान कर दिया गया, यह बजट ऊंट के मुंह में जीरे की तरह सभी जिलों के लिए आवंटित हुआ. अब तो प्राधिकरण को 50 लाख रुपए भी मिलना बंद हो गए हैं. इससे आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि महाकोशल प्राधिकरण को सरकार आगे चलाने की मंशा रखती भी है या फिर नहीं.
2019 से नहीं हुई अध्यक्ष की नियुक्ति
महाकोशल विकास प्राधिकरण सहित बुंदेलखण्ड और विंध्य विकास प्राधिकरण में 2019 से अध्यक्ष पद पर नियुक्ति नहीं हुई है. इन प्राधिकरण के कार्य का दायित्व संभागायुक्त के जिम्मे है. लिहाजा क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों का किसी प्रकार का इन प्रॉधिकरण में हस्तक्षेप नहीं है. इसी कारण महाकोशल विकास प्राधिकरण की हालत दयनीय है.
क्यों किया जाता था बजट का आवंटन?
- > महाकोशलविकास प्राधिकरण के अंतर्गत शिक्षा विभाग के भवनों का निर्माण.
- > विश्वविद्यालयोंमें बाउंड्रीवॉल व शौचालय का निर्माण कार्य.
- > शिक्षण संस्थाओं के लिए फर्नीचर सप्लाई का कार्य.
- > सार्वजनिक वाचनालय का निर्माण कार्य.
- > शिक्षण संस्थाओं में टाट-पट्टी क्रय करने का कार्य.
- > अध्ययन कक्ष का निर्माण कार्य.
- > गांव-कस्बेऔर नगरीय क्षेत्र में नलकूप, प्याऊ और कुआं का निर्माण कार्य.
- > गर्मी के दिनों में पानी के टैंकर उपलब्ध कराना.
- > जेल, शासकीय कन्या आश्रम-अनाथालय और अस्पताल में पेयजल की व्यवस्था करना.
2007 में हुआ था विकास प्राधिकरण का गठन
यहां हम बतादें कि मध्य प्रदेश सरकार ने महाकोशल सहित बुंदेलखण्ड और विंध्य विकास प्राधिकरण का गठन 2007 में किया था. प्रदेश के इन प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले जिलों का आर्थिक पिछड़ापन दूर करने के उद्देश्य से इनका गठन किया गया था, ताकि निर्माण और विकास कार्य को गति दी जा सके, लेकिन ये संस्थान दम तोड़ रहे हैं, जबकि क्षेत्र को बुनियादी सुविधा मुहैया कराने के ये प्रमुख विभाग हैं.
जबलपुर सहित आसपास के जिले भी हो रहे प्रभावित
महाकोशल प्राधिकरण का बजट आवंटित नहीं होने के कारण जबलपुर सहित आसपास के कई जिले विकास के लिए मोहताज हैं. उन्हें विधायक-सांसद के बजट के भरोसे रहना पड़ता है. सड़क -नाली, फुटपाथ के अलावा स्कूल-कॉलेज का विकास भी महाकोशल विकास प्राधिकरण के माध्यम से हो जाया करता था. लेकिन अब बजट का अड़ंगा होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र में विकास कराने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. जिम्मेदार अधिकारी भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं.
विंध्य विकास प्राधिकरण को भी समाप्त करने की तैयारी
अभी हाल में जिस प्रकार से महाकोशल के साथ बुंदेलखण्ड और विंध्य विकास प्रॉधिकरण का बजट धीरे-धीरे खत्म किया गया है. उससे तो यही आभास हो रहा है कि शासन स्तर पर इन सभी प्रॉधिकरण को खत्म कर दिया जाए और इसका अस्तित्व भी मिटा दिया जाए. क्योंकि शासन की नजरों में इन प्राधिकरण का कोई खास काम नजर नहीं आता है और न ही इस प्रॉधिकरण से ज्यादा विकास की उम्मीद नजर आ रही है.

