अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 93.53 पर खुला. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 64 पैसे कमजोर हुआ.
Source : DB News Update
By : DB News Update | Edited By: प्रिंस अवस्थी
Rupee vs Dollar: भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है. विदेशी पूंजी की लगातार निकासी और बाजार में अनिश्चितता का माहौल है. इसी कारण भारतीय करंसी में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है. आज यानी 20 मार्च को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 64 पैसे कमजोर हुआ और 93.53 प्रति डॉलर के स्तर पर आ गया. भारतीय बाजार के जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल के कारण भारतीय करेंसी कमजोर पड़ रही है.
भारतीय रुपए में गिरावट सिलसिला कोई अभी से शुरू नहीं हुआ है. बल्कि. इससे पहले बुधवार को रुपया 49 पैसे गिरकर 92.89 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था. गुरुवार को गुड़ी पड़वा के चलते विदेशी मुद्रा बाजार बंद थे, लेकिन शुक्रवार को बाजार खुलते ही इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई. कारोबार की शुरुआत में ही रुपया 92.92 पर खुला था.
इससे पहले भी दिसंबर 2025 में बुधवार को शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 15 पैसे टूटकर 89.90 के स्तर पर पहुंच गया था.
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 89.89 पर खुला और कुछ ही देर में गिरकर 89.90 प्रति डॉलर पर आ गया. इससे पहले मंगलवार को रुपया 89.75 पर बंद हुआ था. विदेशी मुद्रा कारोबारियों के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ओर से भारतीय शेयरों की बिकवाली जारी है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ रहा है.
डॉलर और शेयर बाजार का असर
इस दौरान छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती दिखी और डॉलर इंडेक्स 0.04 फीसदी बढ़कर 98.27 पर पहुंच गया. घरेलू शेयर बाजार में हालांकि हल्की तेजी देखने को मिली. सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 188 अंक चढ़कर 84,863 के स्तर पर पहुंचा, जबकि निफ्टी 80 अंकों की बढ़त के साथ 26,009 पर कारोबार करता दिखा.
एफआईआई ने मंगलवार को 3,844 करोड़ रुपये के शेयर बेचे
विदेशी निवेशकों की बिकवाली, डॉलर की मजबूती और वैश्विक अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. हालांकि आरबीआई की सक्रियता फिलहाल बड़ी गिरावट को रोकने में अहम भूमिका निभा रही है. आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक विदेशी पूंजी प्रवाह और वैश्विक संकेतों पर निर्भर करेगी.
गिरावट की सबसे बड़ी वजह
- – सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है. खाड़ी देशों के एनर्जी ठिकानों पर ईरान के हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई थी.
- – विदेशी निवेशकों (FIIs) ने मार्च महीने में अब तक भारतीय शेयर बाजार से लगभग 8 अरब डॉलर (करीब 83 हजार करोड़ रुपए) निकाल लिए हैं.
- ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के तनाव भी प्रमुख वजह है. होर्मुज वह समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का 20% और भारत का लगभग आधा तेल गुजरता है.
- आरबीआई लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में दखल दे रहा है. बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपए की गिरावट को थामने की कोशिश करता है.
- रुपया कमजोर होने से भारत के लिए आयात महंगा हो जाएगा. क्रूड ऑयल, विदेश से इंपोर्ट किए जाने वाले मोबाइल, लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे होंगे.
- जीडीपी ग्रोथ पर सीधा असर पड़ेगा. एनर्जी की ऊंची कीमतें भारत की विकास दर को कम कर सकती हैं.
- रुपए की गिरावट से निर्यातकों को फायदा होता है. आईटी सेक्टर, फार्मा और कपड़ा उद्योग की कंपनियों को अपनी सेवाओं या उत्पादों के बदले डॉलर में भुगतान मिलता है.
- मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें 110-115 डॉलर के ऊपर बनी रहेंगी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहेगी, रुपया कमजोर बना रहेगा. यदि ग्लोबल सेंटीमेंट में सुधार नहीं हुआ, तो रुपया 94 के स्तर को भी छू सकता है. किसी भी देश की करेंसी की कीमत मुख्य रूप से इंटरनेशनल मार्केट में उसकी ‘डिमांड और सप्लाई’ के आधार पर तय होती है.
जिस करेंसी की दुनिया में मांग ज्यादा, उसकी कीमत उतनी ही ज्यादा
इसके अलावा, देश की महंगाई दर, ब्याज दरें और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी करेंसी की वैल्यू तय करते हैं. अगर भारत में ब्याज दरें अच्छी हैं और अर्थव्यवस्था स्थिर है, तो विदेशी निवेशक यहां डॉलर लेकर आएंगे, जिससे डॉलर की सप्लाई बढ़ेगी और रुपया मजबूत होगा. सरल शब्दों में, जिस करेंसी की दुनिया में मांग ज्यादा और उपलब्धता कम होगी, उसकी कीमत उतनी ही ज्यादा होगी.

